सोमवार, 28 दिसंबर 2009

नेहरु से जिन्ना तक सब की रूचि इस मामले में एक

मेरी २७ दिसम्बर की पोस्ट पर श्री आईबी रस्तोगी ने टिप्पणी भेजी है यहाँ ज्यों की त्यों प्रस्तुत है

विकास पुरुष नारायण दत्त तिवारी को महिलाओं के विकास में विशेष रुचि लेने का खामियाजा भुगतना पड़ा। संजय गांधी के दौर में लखनऊ-दिल्ली के बीच अपनी भाग-दौड़ की वजह से वे नयी दिल्ली तिवारी त• • के नाम से पुकारे गये। एक समारोह में तत्कालीन राज कुमार संजय गांधी की चरण पादुकाएं खोज लाने में भी वे काफी मशहूर हुए। वैसे तो अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है। यह बात अभिनेता राज कुमार अपने खास अंदाज में फिल्म में कह गये हैं। अगर हम ठीक से देखें तो आचार्य वात्स्यायन और के देश में जहों कोकशास्त्र को एक ललित कला के तौर पर स्थापित किया गया और खजुराहो में चंदेल राजाओं ने मशहूर मंदिर बनवाये और जहां संभोग से समाधि का नारा देकर पश्चिमी जीवन की धारा पलट देने वाले आचार्य रजनीश ओशो ने अपने कम्यून स्थापित किये । उस देश में जब उम्र के चौथेपन में एक बुजुर्ग समाधि लगाने की प्रैक्टिस कर रहा हो तो उसे छिनरा कहना अपराध है। एन डी तिवारी से सभी को ईष्र्या है क्यों की उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में हर गली में उन्हें डैडी कहने वाले दो-चार लोग मिल ही जाएंगे। तो उनसे ईष्र्या होनी स्वाभाविक ही है की जो काम आज के जवानजहान लडक़े बिना हकीम अर्जुन सिंह उप्पल या डाक्टर एडवर्ड की दवाओं के बिना चल नहीं सकते। वही काम 86 साल के इस बूढ़े जवान ने कर दिखाया। कांग्रेस तो तेलंगाना मुद्दे पर फंस चुकी थी। ऐसे में उसे पब्लिक ध्यान हटाने कोई शिगूफा चाहिए था। एन डी तिवारी की बलि तेलंगाना मुद्दे पर अपनी मिस हैंडलिंग के लिए कांग्रेस ने ली है। वो तो सिर्फ संभोग से समाधि में जाने का अभ्यास कर रहे थे। जो उन्हें इस उम्र में भी चाहिए था। सारा बवाल सिर्फ इस बात का है की हाय उन की जगह हम क्यों नहीं हुए और बकोल हरिशं कर परसाईं हमने और हमारे समाज ने सारी नैतिकता समेटकर टांगों के बीच में रख दी है। जहां तक सवाल पद का है तो अमरीकी राष्ट्रपति के नेडी और हीरोइन मार्लिन मुनरो के संबंध विश्वविख्यात हैं और हाल ही के बिल क्लिंटन-मोनि का लेवेंस्की की कहानियां सभी को याद ही होंगी। फिर और अपने ही यहां साउथ में एमजी रामचंद्रन और जय ललिता के संबंधों पर क्या कीसी ने अंगुली उठाई। दोनों ही मुख्यमंत्री बने। ऐसे में अब सुचिता की बात हास्यास्पद ही लगती है। खास तौर पर तब जब आप जवाहरलाल नेहरू और लेडी एडविना माउंटबैटन के रिश्तों पर आंखें बंद कर लेते हों। क्या किसी को याद है की हिंदुस्तान का बंटवारा जिन्ना की रुट्टी दिनशाव पेटिट से आशनाई और नेहरू-एडविना आशनाई के कमपटीशन में हुआ था। रुट्टी जिन्ना को भले ही 24 घंटे के लिए हो लेकिन प्रधानमंत्री देखना चाहती था और एडविना नेहरू को । लिहाजा दो मुलक बने। हम कुछ नहीं बोलेगा। चोप्प रहेगा।
-आईबी रस्तोगी एलियाजी का ब्लॉग पर टिप्पणी में

रविवार, 27 दिसंबर 2009

इस हमाम में अकेले नहीं है एनडी

उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद पर रहे और आंध्र के राज्यपाल पद पर रहे एनडी तिवारी जिस वजह से बेआबरू होकर निकले हैं, न तो वह और न नही उनका जाना किसी को चौकाता है । एनडी जब केंद्र में मंत्री थे और कांग्रेस के प्रभावशाली ओहदेदार थे, तो मप्र की राजधानी भोपाल में उनका आना जाना लगा रहता था। आंध्र का मामला तो अब सामने आया है, यहां भोपाल में तो उनकी रसिया वृत्ति को इतने किस्से विख्यात हैं की सियासत, प्रशासन और पत्रकारिता से जुड़े हर शख्स के पास एक किस्सा मौजूद है, जो एनडी के शौक और मिजाज को कल्पना की परवाज पर चढक़र नवाबों, बादशाहों के जमाने सा लगने लगता है। जब सीडी खबरों में आई तो भोपाल में पहली प्रतिक्रिया सामने आई की कहीं लोकेशन भोपाल की तो नहीं? लेकिन जिस हमाम में एनडी सराबोर दिखाए गए उस हमाम में तो सेकड़ों नहीं तो दर्जनों बड़े बड़े नेता स्नानरत और निर्वस्त्र हैं। भोपाल में भी राजभवन के किस्से चर्चा में रहे हैं, एक लाट साब के तो इतने किस्से मशहूर हैं की शरीफ आदमी किस्सों से ही शरमा जाए। हालाँकि यह किस्से जुबानों पर ही हैं। एक मुख्यमंत्री के किस्से भी खासे मशहूर हैं। कई नामी पार्टियों के नामी नेताओं के अलग अलग किस्से मशहर हैं। एक दशक पहले एक युवा नेत्री की संदिगध हालात में मौत को लेकर भी कई चर्चाएं आज तक भोपाल और मप्र की फिजाओं में व्याप्त हैं। एक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे एक नेता, एक पूर्व मंत्री और कुछ अफसरों, पत्रकारों की भी ऐसी गजब की ही ख्याति है। सत्ता के केन्द्रों के इर्द गिर्द लाभातुर जमा होते ही हैं, काम्नियों का इस्तेमाल बतौर सीडी होता है, इसकी फिल्म सीडी धमाका करती है। भले एंडी तिवारी हों या संजय जोशी मकसद रस्ते के रोड़े हटाना इनका लक्ष्य होता है, समाज और नेतिकता से इसका वास्ता नही होता.
यह केवल एनडी तिवारी या किसी एक पार्टी या एक शहर या राजधानी का मामला नहीं है, दरअसल सत्ता का यही चरित्र है, भले वह राजनितिक , प्रशासनिक , पूंजी या किसी और तरह की सत्ता हो। इसमें अमूमन संघर्ष के बल पर हुआ उत्थान अंतत: धन, सुरा और सुंदरी गमन के रास्ते पतन की तरफ जाता है। लुब्बे लुआब ये कि इस हमाम में एनडी अकेले नहीं हैं।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

एक और मकबूल फ़िदा हुसैन

देवी और सरस्वती के अश्शील चित्र बनाने वाले हुसैन के नक्शे कदम पर चल पड़े अनाम से चित्रकार फैयाज ने मंगलवार को भोपाल के भारत भवन में एक चित्र प्रदर्शनी में हनुमानजी का अपमान करने चित्र लगा डाला। हिंदुओं ke वोटों से सत्ता में आने वाली भाजपा की मप्र में सरकार है और इस सरकारी कला भवन में हनुमानजी को पेंट शर्ट पहने और कला चश्मा लगाए भारत भवन को पर्वत की तरह उठाए हुए चित्रित किया गया है। खास बात ये है की हुसैन मप्र के इंदौर के हैं और फैयाज का चित्र मप्र की राजधानी में प्रदर्शित हुआ। इतना ही नहीं बात फैलते ही चित्र तो हटा लिया गया लेकिन मीडिया में इसकी खबर रुकवाने सरकार का जनसंपर्क विभाग जुट गया और सफल ही रहा। जन्संप्रक आयुक्त मनोज श्रीवास्तव भारत भवन के ट्रस्टी भी हैं, हालाँकि जबसे उन्हे संस्कृति सचिव पद से हटाया गया है, वे भारत भवन से खुद को दूर ही रख रहे हैं। ट्रस्टी पद से खुद हटाने के लिए उन्होंने शासन को दो महीने पहले लिखित में आवेदन भी दिया था, लेकिन सरकार ने उसे अब तक मंजूर नहीं किया है। मनोज हनुमानजी के अनन्य भक्त हैं और उनके चरित्र माहात्म्य पर किताब लिख चुके हैं। दुर्गा सरस्वती के अश्श्लिल चित्र बनाने वाले मकबूल फिदा हुसैन को कसाई बताकर हंगामा मचाती रही भाजपा के राज में हनुमानजी के फूहड़ चित्र सरकारी संस्थान में प्रदर्शित होने पर कोई सख्त कार्रवाई के बजाय मामले को दबाने से भाजपा की कथनी करनी अलग बताने वालों के आरोप में और दम पैदा हो जाता है। देखना ये है की हनुमानजी के नाम पर चल रहे संगठन बजरंग दल क लोग इस मामले पर क्या करते हैं। हो सकता है वे कुच्छ न करें और वेलेंटाइन डे पर प्रेमियों को पीटने क अपने सालाना आयोजन की तैयारी में व्यस्त हों। बहरहाल मारूतिनंदन हनुमान जी महाराज फैयाज को निश्चित ही क्षमा कर देंगे क्योंकि वे जानते हैं की फैयाज नासमझ है, तभी तो उसने ऐसा किया । लेकिन भाजपा और उसकी सरकार का की होगा. अगर बजरंग बली नाराज हुए तो फैयाज को और भाजपा को भला कौन बचा सकता है, सिवाय हनुमान जी के। जय बजरंगवली की

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

सर हरिसिंह गौर के नगर का पार्टियों और नेताओं के गाल पर झन्नाटेदार झापड

मध्यप्रदेश में नगर निगम चुनाव में महान शिक्षाविद, कानूनविद सर डा. हरिसिंह गौर के नगर सागर के मतदाताओं ने प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा और केंद्र की सत्ताधीश पार्टी कांग्रेस को झन्नाटेदार झापड सा सबक सिखाया है। प्रदेश में मंगलवार की देर रात आए 12 नगर निगमों के चुनाव में 7 भाजपा, 2 कांग्रेस, 2 बसपा के मेयर चुने गए। लेकिन सबसे ज्यादा 43 हजार वोटों से सागर शहर के लोगों ने निर्दलीय किन्नर कमला भुआ को महापौर पद पर जिताया। सागर से विधायक, सांसद भाजपा के हैं, चुनाव तक महापौर भी भाजपा का ही था। लेकिन जनता ने तय कर लिया था, कि शहर के विकास के मामले में नंपुसक साबित होते नजर आ रहे राजनीतिक दलों के नेताओं के बजाय सबके भले के लिए दुआएं मांगते और अपना दर्द शिव के गरल की तरह पी जाने वाले किन्नर कमला बुआ को चुनना है। कमला बुआ की जीत सागर की दीवालों पर लिखी ऐसी इबारत है जो वोटों की गिनती तो छोडिए मतदान के पहले ही साफ पढने में आ रही थी। मतदान 11 दिसंबर को था और 12 दिसंबर को भोपाल में सागर के एक परिवार के विवाह समारोह में जाने का मुझे मौका मिला। वहां सागर से आए लोगों में सर हरिसिंह गौर विवि के प्राध्यापक, विद्यार्थी, वकील, पत्रकार, दुकानदार, किसान सभी वर्गों के लोग शामिल थे। मैंने बतौर पत्रकार उनसे माहौल जानना चाहा तो सबका एकसुर से कहना था सागर इस बार राजनीतिक किन्नरों को नहीं चुनेगा, लोग तय कर चुके हैं कमला बुआ ही मेयर होंगी। वहां नारा चल रहा था, कमल नहीं कमला चाहिए, हाथ नहीं किन्नर चाहिए। मध्यप्रदेश ने दस साल पहले किन्नर विधायक शबनम मौसी को, पहली किन्नर महापौर कटनी से कमलाजान को चुना था। अब सागर से कमला बुआ प्रथम नागरिक बनी हैं। किन्नर कमला बाई ने दो टूक शब्दों में कहा है कि वे सागर में पैदा हुई हैं, धोखा नहीं देंगी जनता को बल्कि नमक का हक अदा करेंगी। दरअसल राजनीतिक दलों के आधार वाले क्षेत्रों में इस तरह की जन अभिव्यक्ति को राजनीतिक दलों को सबक के तौर पर लेना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से पहले भी ऐसा नहीं हुआ और अब भी ऐसा होगा इसकी उम्मीद न के बराबर ही है। राजनीतिक दल और उनके नेता जो वादे करके जीतते है, उन्हें पूरा नहीं करते। राजनीतिक प्रतिबद्धता के बजाय पद को अपना और रिश्तेदारों का भ्रष्ट तरीकों से कल्याण करने का माध्यम बना लेते हैं। जनता के पास पांच साल टापते रहने के अलावा कोइ्र्र चारा नहीं बचता। पार्षद के चुनाव में दो तीन लाख तक और मेयर के चुनाव में एक करोड रूपए तक बेजा खर्च कर चुके नेता जीतने के बाद सूद समेत वसूलने में जुट जाते हैं। नाराज जनता किन्नर को जिताकर जता रही है कि दल और उनके घर भरू नेता सुधर जाओ, वर्ना भविष्य में और भी तरीके हैं सबक सिखाने के। भ्रष्ट नेताओं के तरफदार पत्रकार, वकील और अफसरों को चेत जाना चाहिए, अन्यथा आने वाला वक्त उन्हंे भी जनता के जरिए न जाने किन किन तरीकों से सबक सिखा सकता है।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

फिर घर में कभी रामायण का पाठ नहीं हुआ

हमारे घर में परंपरा थी कि बड़े भैया के जन्मदिन (1 दिसंबर) को अखंड रामायण का पाठ होता था। 1984 में भी एक दिसंबर को रामायण शुरू हुई और 2 दिसंबर की रात को समापन के बाद पूरा परिवार गहरी नींद में सोया था। सुबह-सुबह कुछ पड़ोसियों ने तेज दरवाजा खटखटा कर उठाया कि गैस रिस रही है। कोई कह रहा था कि घर का गैस सिलेंडर बंद कर लो। कमरे की खिड़की खोल कर देखा तो मेन रोड पर दौैड़ते लोग नजर आए। फिर हम छत पर पहुंच गए, तो देखा एमएसीटी की पहाड़ी पर लोगों का हुजूम लगा हुआ है। इतनी देर में माजरा समझ में आया कि बंटी के पापा की फैक्टरी से कोई जहरीली गैस निकली है, जिससे पुराने शहर में काफी लोग मर गए हैं। इस गैस से बचने के लिए ही लोग नए शहर की तरफ बदहवास दौड़ते चले आ रहे हैं। (बंटी, मेरा हम उम्र था और उसके पापा ने कुछ साल इस मौत की फेक्टरी में नौकरी की थी। जब यह हादसा हुआ, तब तक वे यहां की नौकरी छोड़ चुके थे। उनके बारे में मुझे बस इतना याद है कि वे एक काला ब्रीफकेस लेकर उस जमाने में ऑटो से ऑफिस तक जाते थे।) मेरे बड़े भैया और मोहल्ले के दूसरे लोग पीडि़तों की सहायता के लिए पहुंच गए। कई दिन तक शिविर में रहने वाले लोगों के लिए हमारे व पड़ोसियों के घर से रोटियां गईं। ओढऩे- बिछाने और पहनने के कपड़े भी हम लोगों ने शिविरों में पहुंचाए। हम, नए शहर में रहते थे और हमारा वार्ड गैस पीडि़त नहीं माना गया। इसका मुझे गम नहीं, लेकिन उसके बाद घर में कभी रामायण का पाठ नहीं हुआ। जब भी रामायण की बात आती है, गैस त्रासदी का खौफनाक मंजर और उस दौरान भोगा गया मानसिक संताप पूरे परिवार जेहन में और जुबान पर आ जाता है। फिर हिम्मत ही नहीं होती कि रामायण पाठ का आयोजन करें। 1984 में पहले आरक्षण आंदोलन, फिर इंदिरा गांधी की हत्या और सिक्ख विरोधी दंगे और उसके बाद गैस त्रासदी। इस सबके कारण जनरल प्रमोशन तो मिल गया, लेकिन आज भी लगता है कि उस साल हुए नुकसान की भरपाई आज तक नहीं हो पाई।- मनोज जोशी, भोपाल

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

उम्र से लंबा हादसा, दुनिया ने नहीं लिया भोपाल से सबक

आज नौ हजार एक सौ पच्चीस दिन हो गए भोपाल में बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कारबाइड से जहरीली गैस रिसने से शुरू हुई सतत त्रासदी को। हादसे के वक्त और तब से अब तक के ढाई दशक में हजारों लोग इस नासूर का शिकार हो चुके हैं। राहत, पुनर्वास और मुआवजे की लंबी त्रासद प्रक्रिया, राजनीति के घटाटोप में पीडि़तों को न्याय और दोषियों को बाजिब सजा मिलने की संभावना कहीं गुम हो गई है। सामूहिक नरसंहार के बदले भारत सरकार ने यूनियन कारबाइड से जो 750 करोड़ रुपए लिए थे, उसका उचित रूप से बंटवारा नहीं हो सका। साढ़े सात लाख मुआवजा दावे थे, उनमें से सबका निपटारा तक नहीं हो सका। समूचे भोपाल को गैस पीडि़त घोषित करने की मांग पर ढाई दशक से राजनीति जारी है। पूर्व में भी और वर्तमान में भी गैस राहत मंत्री बाबूलाल गौर इस बीच एक दफा मुख्यमंत्री भी बन चुके हैं, उनका सबसे बड़ा मुद्दा ही यही रहा है लेकिन यह पूरा नहीं हो सका।
करोड़ों की लागत से बनीं भव्य इमारतें जिन्हें अस्पताल नाम दिया गया है, में करोड़ों रुपए खर्च कर विदेशों से लाई गई मशीनें धूल खा रही हैं। अगर इन अस्पतालों में सब कुछ ठीक से चलने लगे तो भोपाल देश का सर्वाधिक स्वास्थ्य सुविधा संपन्न शहर हो सकता है। लेकिन दो दशक में ऐसा होने के बजाय हालात और बदतर हो गए हैं। दवाएं खरीदने के नाम पर घोटालों के बीच अपने सीने में घातक गैस का असर लिए गैस पीडि़त आज भी तिल तिलकर मर रहे हैं। दवाओं का टोटा न अस्पतालों में नजर आता है और न ही आंकड़ों में। लेकिन लोग दवाओं के लिए भटकते रहते हैं।
विश्व की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी का तमगा हासिल कर चुके इस भोपाल हादसे के मुजरिमों को न केवल तत्कालीन सरकारों ने भाग जाने दिया बल्कि बाद की सरकारों ने नाकाफी हर्जाना लेकर समझौता करने से लेकर आपराधिक मामले में धाराएं कमजोर करने जैसे अक्षम्य अपराध कर कानूनी पक्ष को कमजोर किया। इससे प्राकृतिक न्याय की मूल भावना कमजोर हुई। आर्थिक हर्जाना कभी मौत के मामले में न्याय नहीं हो सकता, फिर यह तो सामूहिक नरसंहार का मामला है। उच्चतम न्यायालय ने 13 सितंबर 1996 के फैसले में यूनियन कारबाइड से जुड़े अभियुक्तों के खिलाफ आईपीसी की दफा 304 के स्थान पर 304- ए के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया। इसके तहत यूका के खिलाफ फैसला होने पर अभियुक्तों को दो वर्ष कैद और पांच हजार रुपए जुर्माने की सजा होगी। इस मामले में यूनियन कारबाइड के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एंडरसन, यूका ईस्टर्न हांगकांग तथा यूका इंडिया लिमिटेड के तत्कालीन अध्यक्ष केशव महिंद्रा समेत 10 अन्य अभियुक्त बनाए गए थे। एंडरसन प्रमुख अभियुक्त होने के बावजूद भारत में अदालत के सामने पेश नहीं हुआ।
भोपाल हादसे से किसी भी तरह का सबक नहीं लिया गया है। आज भी भोपाल में और देश भर में घनी आबादियों के बीच घातक कारखाने धड़ल्ले से चल रहे हैं। हर कहीं हर कभी छोटे छोटे भोपाल घट रहे हैं। ढाई दशक बाद न भोपाल ने न मप्र ने न भारत ने और न ही दुनिया ने भोपाल से कोई सबक लिया है।
क्रमश.. .. जारी

बुधवार, 25 नवंबर 2009

महिला आरक्षण के नाम पर ये क्या हो रहा है

मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव के लिए उम्मीदवारी के घमासान में आज कतल की रात है। अर्थात कल शाम तक ही उम्मीदवारी के पर्चे भरे जाएंगे। दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस में मेयर, नगरपालिका और नगर पंचायत अध्यक्ष और पार्षद पद की उम्मीदवारी को लेकर यूद्ध जैसे हालात हैं। रोचक बात ये है की शिवराज सरकार ने इन चुनाव में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कहैं। लेकिन इस आरक्षण का दोनों ही दलों में खुला मजाक उड़ाया जा रहा है। महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों पर पार्टी के छोटे बड़े नेता पार्टी की महिला कार्यकर्त्ता के बजाय पुरूष नेताओं की पत्नी, मां, बहन, सास ko टिकीट दिलाने ki जुगत में लगे हैं। पार्टी भी ऐसा करने में पीछे नहीं हैं। भोपाल में भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में मंत्री बाबूलाल गौर की पुत्रवधु क्रष्णा गौर को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया है। आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह पत्नी भावना शाह को खंडवा से महापौर पद की प्रत्याशी बनाया गया है। प्रदेश भर में ऐसे सेकड़ों उदाहरण सामने आ रहे हैं जहां पार्टियां नेताओं की पत्नियों को उम्मीदवार बना रही है, या किसीभी उम्मीदवार बनाने को तैयार है। सवाल ये है की राजनीतिक अपने ही भीतर लोकतंत्र क्यों नहीं ला पा रहे हैं। डेढ़ दशक बाद भी महापौर पति, नपाध्यक्ष पति, पार्षद पति सरपंच पति परंपरा क्यों जारी है।

सोमवार, 16 नवंबर 2009

बीमार भाजपा को कुनैन मोदी चाहिए

आदमी ही नहीं संगठन, संस्थाएं, देश और समाज बीमार होते हैं। कम से कम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौजवानवादी मुखिया मोहन भागवत तो यही प्रतिपादित करते दिख रहे हैं। जब संघ के मुखिया कह रहे हैं तो यह डायग्नोस हो चुका है कि संघ पुत्री भाजपा बीमार है। बीमार के इलाज के लिए दो चीजें जरूरी हैं एक कुशल चिकित्सक और दूसरा कारगर औषधि। जैसी कि चर्चा खुलेआम हो रही है कि महाराष्ट के नितिन गडकरी को स्वस्थ्य और ताकतवर भाजपा गढने की जिम्मेदारी मिलने वाली है। अब सवाल ये है कि भारतीय जनता पार्टी की बीमारी का क्या सही डायग्नोस किया गया है, और क्या डा. गडकरी कारगर चिकित्सक साबित हो सकेंगे। मुझे लगता है कि न तो ठीक से डायग्नोस ही किया गया है और न ही गडकरी या अन्य ऐसा कोई राज्य स्तरीय नेता जिसकी राष्टीय छवि न हो सही चिकित्सक साबित होगा। असल में भारतीय जनसंघ और उसके अगले अवतार भारतीय जनता पार्टी की जनता में स्वीकार्यता के लिए दो ही नेता जननेता के बतौर स्थापित हुए थे और आज भी पार्टी उनके दायरे से बाहर नहीं निकल पाई है। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की युति ही भाजपा की असल ताकत थी। ऐसा नहीं है कि इन दोनों नेताओं के अलग अलग खेमे भाजपा में नहीं बने थे। वे बने थे लेकिन इसके बावजूद अटल और आडवाणी एक दूसरे के पूरक थे और दोनों की युति से ही भाजपा को दिल्ली से लेकर अटारी खेजडा, पिपरिया और आमगांव तक में कार्यकर्ताओं का प्राणपण समर्पण हासिल हुआ था। इसमें संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों की साइलेंट सी नजर आने वाली मगर प्रखर भूमिका भी थी। लेकिन भाजपा में अटल-आडवाणी के बाद जो दूसरी पीढी उभरी उसमें दो नहीं एक दर्जन नेता थे, जाहिर है दो के बीच वर्चस्व का संघर्ष होते हुए भी एका दिखता रहा, बना रहा लेकिन एक दर्जन लोगों के बीच वैसा नहीं हो सका। क्योंकि अरूण जेटली, राजनाथ सिंह, उमा भारती, प्रमोद महाजन, नरेंद्र मोदी, कल्याण सिंह, नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज, गोविंदाचार्य, वेंकैया नायडू सरीखे नेताओं की वर्चस्व मंशा के पीछे शहरी, ग्रामीण, सवर्ण, ओबीसी, संघमूल गैर संघमूल, अन्य दलों से आए जैसे कई तंबू और विरोधाभास थे। इस पूरी की पूरी पीढी ने एक दूसरे को निपटाने के लिए दुरभिसंधियों, भितरघातों का सहारा लिया। इसमें मीडिया के इस्तेमाल और अटल आडवाणी खेमों को बकायदा हथियार की तरह प्रयोग किया। गोविंदाचार्य का पलायन, कल्याण सिंह का निष्कासन, उमा भारती का सत्तारोहण और बाद में हटा दिया जाना, निष्कासन इन्हीं संघर्षों के नतीजे रहे। लेकिन इस सबके बीच केवल नरेंद्र मोदी ही ब्रांड बन पाए। उन्होंने अपनी खास शैली, खास पहचान और ताकत न केवल विकसित की बल्कि वे उसका लगातार लोहा भी मनवाते रहे। उन्हें कोई उमा भारती की तरह मैदान से हटा नहीं पाया। बाकी दूसरी पंक्ति के नेताओं का न तो उतना आभामंडल बन पाया और न ही वे भाजपा को राष्टीय स्तर पर अटल आडवाणी की तरह एकजुट रख पाने के योग्य बन पाए। दूसरी पंक्ति के छिन्न भिन्न होने की वजह से आज भाजपा के पास सिवाय नरेंद्र मोदी के कोई नेता ऐसा नहीं है जो निराश कार्यकर्ता को जोश से भर दे और जिसके इशारे पर वे फिर पार्टी में रक्तसंचार कर दें। यह हकीकत भाजपा के दूसरी पीढी के जनरथ विहीन नेताओं को बुरी लग सकती है, लेकिन कार्यकर्ता और भाजपा के समर्थक नरेंद्र मोदी के अलावा कोई और विकल्प पार्टी को वापस ताकतवर बनाने के लिए नहीं देखते हैं। भाजपा के इतर दलों को मसलन एनडीए के घटक दलों को मोदी भले न सुहाएं, कुनैन लगे लेकिन मलेरिया ग्रस्त भाजपा को यही कुनैन मुफीद बैठेगा। भाजपा को राजग बचाने की नही ख़ुद को बचाए रखने की चिंता करना होगी , जहां तक गडकरी को अध्यक्ष बनाने की बात है तो वे मोहन भागवत के जेबी भाजपा अध्यक्ष से ज्यादा साबित नहीं होंगे। अंततः भाजपा को अगर फिर लौटना है तो उसे मोदी का कुनैन लेना ही होगा, अन्यथा आगे हार और भी इंतजार kijiye अगले chunav तक।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

कैसा रहम, ये माफी है नाकाफी. .

भरी विधानसभा में राष्ट्रभाषा का भरपूर अपमान करने वाले महाराष्ट्र विनाश सेना के 13 विधायकों के नेता नांदगांवकर ने अब अपने गिरोह के चार निलंबित सदस्यों की सजा खत्म करने या उसे कम करने की गुहार लगाते हुए घटना पर खेद जताया है। यह तो ठीक वैसा ही है कि जानबूझकर सुनियोजित और बकायदा घोषणा कर अपराध करो और फिर माफी की उम्मीद भी कर डालो। इन चार सदस्यों का निलंबन तो कतई खत्म किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि बाकी नौ से यह लिखित आश्वासन लेना चाहिए कि वे इस किस्म की कोई हरकत नहीं करेंगे, तो न केवल सदस्यता खत्म कर दी जाए बल्कि उन्हें कानूनन जो सजा मुकर्रर हो वो दी जाए। क्योंकि सदन में किए गए किसी भी जुर्म पर अदालत का कानून नहीं सदन के नियम प्रक्रिया और परंपरा चलती है। महाराष्ट्र में हर दल और नेता मराठी भाषा, मराठी माणुस को वोट मिलने और उसकी अवहेलना पर वोट खिसकने का सूचकांक मानता है। असल में महाराष्ट्र सरकार और भारत सरकार को इन विधायकों के कुकृत्य पर बकायदा आपराधिक प्रकरण उनके मुखिया राज ठाकरे के खिलाफ दर्ज कराना चाहिए। राज का सभी विधायकों को खुला पत्र इस बात का सुबूत है कि उसी के उकसावे पर महाराष्ट्र विधानसभा में शर्मनाक वाकया पेश आया। राज के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के अलावा उसकी पार्टी की मान्यता खत्म करने की प्रक्रिया भी शुरू होना चाहिए, तभी न केवल नजीर कायम होगी बल्कि अन्य किसी और राज्य में इस किस्म की गुंडागर्दी राजनीति को प्रश्रय मिल पाएगा। राज ठाकरे को शायद इस बाद का सही ढंग से इल्म भी नहीं होगा कि देश भर में फैले मराठियों की क्या स्थिति बन सकती है। मैंने गुरूवार को भोपाल में एक दफ्तर में एक पढ़े लिखे शख्स को अपने साथियों को परिहास में यह कहते सुना कि अपन लोगों को भी मराठियों को पीटना चाहिए। यह बात मजाक में कही गई थी। लेकिन मजाक में भी ऐसी बात जेहन में आना खतरनाक है, क्योंकि राज ठाकरे एंड कंपनी गैर मराठियों के दिमाग में भी फितूर पैदा करें, यह देश के लिए खतरनाक है। समूचे देश के तमाम राज्यों को भले ही वहां की भाषा, बोली कुछ भी हो, देश की बाकी बोलियां बोलने वाले लोगों की चिंता कर ही लेना चाहिए। यह हम सबका न केवल दायित्व है, बल्कि समय की मांग भी है।

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

बैन करो इस गुंडाराज पार्टी को

संविधान की कसमें खाने वालों, देश के कर्ताधर्ता बने फिर रहे लोगोंं के लिए यह शर्मनाक, डूब मरने लायक और हतवीर्यता की हद है ये। एक आदमी भारतीय संविधान की लगातार धज्जियां उड़ाते हुए न केवल कथित राजनीतिक दल चला रहा है बल्कि उसे चुनाव में उतरने और गुंडागर्दी करने का लगातार मौका दिया जा रहा है। नक्सलवादियों को हवाई हमले कर उड़ा देने के बयान दे रहे चिंदबरम और मनमोहन सिंह इस राज ठाकरे नामक माफिया का कुछ भी क्यों नहीं उखाड़ पा रहे हैं, समझ से परे है। आखिर उसकी महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में मौजूदगी का फायदा तो कांग्रेस और राकांपा गठबंधन की फिर सरकार बनने में उठाया जा चुका है, अब तो उसकी गुंडागर्दी को रोका जाना चाहिए। राष्ट्रभाषा हिंदी में शपथ लेने वाले सपा विधायक अबु कासमी से धक्का मुक्की करने वाले महाराष्ट्र बर्बाद सेना के चार विधायकों को निलंबित करना बेमानी टाइप कार्रवाई ही है। असल में ऐसी पार्टी को चुनाव लडऩे की मान्यता देना ही अपने में बुनियादी गलती है। एक साल पहले मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों का जायजा लेने आए तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी से और इसके बाद लोकसभा चुनाव के सिलसिले में भोपाल वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन बी. चावला से मैंने पूछा था कि गुंडागर्दी करने, राष्ट्रभाषा को अपमानित कर राजनीति करने वाले दल की मान्यता निरस्त क्यों नहीं कर दी जाती? इस पर दोनों ही महानुभावों ने करीब करीब एक जैसा ही जवाब दिया था। उनका कहना था कि कोई शिकायत करे तो फिर आयोग उस शिकायत पर विचार करेगा। इतना ही नहीं गोपालस्वामी ने तो मेरी बात को करीब करीब उपहास के अंदाज में लेने की कोशिश करते हुए कहा था आप तो मप्र के चुनाव से संबंधित कोई प्रश्र हो तो पूछिए। असल में जिन पर कार्रवाई होना चाहिए, उन पर कार्रवाई नहीं करते हुए सरकारें बड़ी बड़ी बातें करने में ही यकीन रखती हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण के नाम पर शिवसेना से अलग होकर पार्टी बनाने वाले राज ठाकरे के दिमागी दिवालिएपन का ही यह नमूना है कि अंग्रेजी में शपथ लेने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं लेकिन राष्ट्रभाषा हिंदी में शपथ लेने पर मारपीट का फरमान, उस पर अमल भी हो गया। अब सुप्रीम कोर्ट की ही तरह निगाह उठती है, कि माननीय न्यायालय इस मामले में स्वमेव संज्ञान लेकर राज ठाकरे से यह पूछे कि क्यों न ऐसीपार्टी की मान्यता समाप्त कर दी जाए जो देश की एकता, अखंडता, राष्ट्रभाषा के लिए खतरे के तौर पर मौजूद है। उम्मीद की जाना चाहिए कि ऐसा होगा, स्वार्थ की राजनीति करने वालों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे राष्ट्र और राष्ट्र भाषा पर हुए इस हमले को गंभीरता से लेंगे भी।

रविवार, 8 नवंबर 2009

बाबा रामदेव तुमने ये क्या किया

जमीयत के इजलास में बाबा रामदेव की शिरकत से कई सवाल उठे हैं, वे स्वाभाविक भी हैं। लाख टके का सवाल ये है कि उन्होंने वंदेमातरम् की खिलाफत करने वालों के सगागम में शिरकत क्यों की? असल में जिस वजह से चिंदबरम वहां गए थे, उसी वजह से रामदेव भी वहां गए थे। अर्थात सियासत। कांग्रेस तो उप्र में अपनी खोई ताकत पाने मुस्लिम संगठनों को साधने का योग कर रही है जबकि बाबा अपने अंदर जाग गई राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए कुछ भी करने पर आमादा दिख रहे हैं, बतर्ज लव के लिए कुछ भी करेगा, बाबा सियासत के लिए कुछ भी करेगा की मुद्रा में हैं। याद कीजिए कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि वे 50 सांसद लोकसभा में भेजेंगे, ताकि बदलाव लाया जा सके। बिना राजनीतिक दल और बिना राजनीतिक जनाधार के एक पार्षद चुनवा पाना या खुद पार्षद का चुनाव जीतना भी एवरेस्ट पर चढऩे जैसा होता है। प्रवचन के लिए भीड़ जुटना, एक्टर की फिल्म देखने के लिए टिकिट खिड़की पर झगड़े होना सियासी सफलता के लिए वोट में बदलना असल में मुंगेरीलालनुमा सपना ही होता है। तो बाबा बेचारे क्या करें, पतंजलि, योग वशिष्ठ और अन्य महान ऋषि मुनियों के आविष्कृत योग के जरिए बाबा को टीवी चैनलों की लहर पर पापुलरिटी तो खूब मिल चुकी है। उनके अंदर अब राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग गई है, सो वंदेमातरम विरोधियों के साथ मंच साझा करने में कोई झिझक कोई शर्म उन्हें नहीं आई। असल में बाबा की जो भी प्रसिद्धि, धन दौलत है, उसमें उनका खुद का देखा जाए तो कुछ भी नहीं है। वे केवल योग की मार्केटिंग कर रहे हैं, उन्हें आस्था, संस्कार, इंडिया टीवी और अन्य चैनलों को धन्यवाद देना चाहिए कि उन सबने बाबा बो पापुलर बनाने में मदद की। बाबा के पापुलर होने में भारतीय मानस में धर्म, अध्यात्म, योग के प्रति अगाधा श्रद्धा ही है। लेकिन बाबा ये कतई न भूलें कि भारतीय मानस में देश प्रेम भी उतना ही उत्कट है। भले ही तत्कालीन सत्ताधीशों के स्वार्थों के चलते भारत अनेक बार गुलाम हुआ हो लेकिन देश के लोग देश से तब भी प्रेम करते थे, अब भी करते हैं। वंदेमातरम की खिलाफत भारतीय मानस में कभी सर्व स्वीकार्य नहीं हो सकती। खासकर किसी भगवाधारी योग वेदांत की बातें करने वाले की वंदेमातरम की खिलाफत में भागीदारी तो कतई बर्दाश्त नहीं हो सकती। बाबा की कुल जमा दिक्कत ये है कि वे बातें देश प्रेम की, भारत की श्रेष्ठता साबित करने की, योग की, धर्म की, विज्ञान को कमतर आंकने की करते हैं लेकिन असल में बनना राजनेता चाहते हैं। जैसे भाजपा राममंदिर समेत तमाम भावानात्मक मुद्दों को सत्ता की खातिर त्याग देती है, वैसे ही रामदेव ने भी सत्ता की महत्वाकांक्षा में वंदेमातरम विरोधियों के कार्यक्रम में हिस्सा लिया और इसका जवाब देने के बजाय चुप्पी साध ली है। यह भी नेतागिरी का ही लक्षण है कि चुप्पी साध लो। लेकिन बाबा रामदेव को यह समझ ही लेना चाहिए कि जो जनता उन्हें सरमाथे बिठा रही है, वह उन्हें भूलुंठित भी कर ही देगी। अच्छा हो कि बाबा बिना किसी सफाई या नानुकुर के अपनी धृष्टता के लिए माफी मांग ही लें।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

कंट्रोवर्सी प्रेमी न्यूज चैनलों ने शिवराज को बना दिया राज

मप के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शुक्रवार को अपनी एक कथित विवादास्पद टिप्पणी से विवाद में घिरते नजर आए। उन्होंने सतना में कहा 'ऐसा नहीं होगा कि कारखाना यहां लगे और काम बिहार और उप्र के लोगों को मिले।Ó उनकी इस टिप्पणी को मीडिया चैनलों ने न केवल जमकर उछाला बल्कि शिवराज की तुलना महाराष्टï्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमो राज ठाकरे से करने की कोशिश भी की। श्री चौहान को देर शाम स्पष्टï करना पड़ा कि उनका आशय 50 फीसदी रोजगार स्थानीय लोगों को देने का था, हर भारतवासी का मप्र में स्वागत है। उनकी मंशा मप्र के मूल निवासियों को नौकरी में प्राथमिकता दिलाने की थी न कि अन्य राज्यों के लोग को प्रदेश में आने से रोकने की। मध्यप्रदेश के लोगों और शिवराज सिंह चौहान को जानने वाले शिवराज की तुलना राज ठाकरे से किए जाने को पचा नहीं पा रहे हैं। इस पूरे प्रकरण से एक बात तो साफ है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का काम विवाद पैदा करना और उसे फैलाने में ज्यादा है। दरअसल श्री चौहान ने शुक्रवार को दोपहर में सतना में आयोजित गरीब उत्थान सम्मेलन में कहा कि प्रदेश में स्थापित होने वाले कारखानों मध्यप्रदेश के मूल निवासियों को प्राथमिकता दी जाएगी। ऐसा नहीं होगा कि कारखाना सतना में लगे और पहले काम उप्र-बिहार के लोगों को मिले। जहां कहीं भी कारखाने उद्योग धंधे या कारखाने लगें वहां पचास प्रतिशत रोजगार स्थानीय लोगों को मिलना चाहिए। कारखानों में जिनकी जमीनें जाती हैं, उनकी पीड़ा दूर की जाना चाहिए। यदि स्थानीय लोग प्रशिक्षित नहीं हैं, तो उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। श्री चौहान के बयान को निजी न्यूज चैनलों दिखाने के बाद इस मामले में राष्टï्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जद-यू प्रमुख शरद यादव की प्रतिक्रियाएं दिखार्ईं जाने लगीं। बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू ने बिहारियों की जो स्थिति बनादी उसे न केवल बिहारी बल्कि पूरे देश के लोग जानते हैं। शरद यादव राजनीति भले बिहार की करते हों, लेकिन वे हैं तो मध्यप्रदेश के ही। लेकिन नेता प्रदेश और देश का व्यापक हित बाद में और अपने हित पहले देखते हैँ। न्यूज चैनलों ने श्री चौहान की तुलना उत्तर भारतीयों को मुंबई से खदेडऩे का अभियान चला रहे महाराष्टï्र नवनिर्माण सेना सुप्रीमो राज ठाकरे से करना शुरू कर दी। श्री चौहान को देर शाम इंदौर में बयान जारी कर सतना में की गई टिप्पणी पर स्पष्टïीकरण देना पड़ा। दरअसल केंद्र सरकार की पुनर्वास नीति में ही स्पष्ट प्रावधान है कि कारखाने लगाने में 50 फीसदी रोजगार उन लोगों को दिया जाए, जिनकी जमीनें उस उद्योग में प्रभावित हुई हैं। यही पुनर्वास नीति सभी राज्यों में भी लागू है। लेकिन इस पर अमल नहीं होता। मीडिया को इस विषय पर वास्तविकता उजागर करना चाहिए कि पुनर्वास नीति का राज्य सरकार क्या कर रही हैं। किन उद्योगों में स्थानीय लोगों को रोजगार मिला या किन में नहीं। यह करने के बजाय भड़काने वाले विवाद क्रिएट करना ही मीडिया का काम रह गया लगता है। मप्र में हर भारतवासी का स्वागत- चौहानअपने स्पष्टीकरण में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा है कि- मैंने ऐसा कभी नहीं कहा कि अन्चय प्रदेश के नागरिक मप्र न आएं। बिहार, उप्र, दक्षिण भारत, पंजाब या भारत के किसी भी अंचल के लोग मप्र आएं, उनका हार्दिक स्वागत है। उन्होंने कहा कि मैं भारत को मां मानता हूं और हम सब भारतवासी उसके लाल हैं। मैं ऐसी हर बात का विरोध करता हूं जो देशवासियों में विभेद पैदा करती है। उन्होंने कहा- हम सब भारत मां के लाल, भेद-भाव का कहां सवाल।

भाषण और लेखन में एक सी ताकत थे प्रभाष जी

हिंदी के शीर्षस्थ पत्रकार प्रभाष जोशी जी नहीं रहे। अंग्रेजीदां पत्रकारों के बीच देश की राजधानी में हिंदी पत्रकारिता के ध्वजवाहक प्रभाष जी, सूटेड बूटेड लोगों के बीच धोती कुर्ते में प्रखर भारतीयता की जीवंत पहचान थे। राजेंद्र माथुर के बाद प्रभाष जी है थे जो राष्ट्रीय पत्रकारिता के फलक पर जाज्वल्यमान नक्षत्र की तरह विराजे थे। मध्यप्रदेश और हिंदी पत्रकारिता के गौरव प्रभाषजी से मेरी पहली मुलाकात 1991-92 में उस वक्त हुई थी जब वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में आए थे। मैं तब पत्रकारिता का विद्यार्थी था और उनके लेखन से खासा प्रभावित था। उनका भाषण सुना तो और भी ज्यादा प्रभावित हुआ। क्योंकि ऐसा बहुत ही कम होता है कि कोई व्यक्ति लेखन में जितना श्रेष्ठ हो, उतना ही श्रेष्ठ भाषणकला में भी हो। प्रभाषजी में यह गुण था। उनका मालवी टोन में बोलना और लेखन में भी उसी अंदाज को बनाए रखना उनकी शैली को बिरला बनाता था। विद्यार्थी के नाते मैंने उनसे सवाल किया था कि पत्रकार की लेखन शैली कैसी होना चाहिए? उन्होंने उत्तर दिया था- जो केवल अक्षर ज्ञान रखने वाले रिक्शेवाले को भी समझ में आए और खूब पड़े लिखे विद्वान को भी, ऐसी ही भाषा में पत्रकार को लिखना चाहिए। पत्रकारिता में भाषा का पांडित्य दिखाना सफलता नहीं एक तरह से असफलता की निशानी ही माना जाएगा।प्रभाषजी का क्रिकेट प्रेम तो अदभुत था, और सचिन तेंदुलकर के खेल के तो वे मानो दीवाने ही थे। यह दुखद संयोग है कि सचिन ने जिस रात 17000 का जादुई आंकड़ा पार किया, प्रभाष जी उसी रात इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए। हिंदी के शीर्ष पत्रकार प्रभाष जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

कॉमन वैल्थ नहीं कॉमन गुलामी है ये ...

बीते तीन दिन से एक तस्वीर मेरी आंखों में अटकी है और खटक रही है, फांस सी चुभ रही है। नि:संदेह और भी हजारों लोगों को यह चित्र चुभा होगा। मैं बात कर रहा हूं उस तस्वीर की जिसमें ब्रिटेन की महारानी भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को कॉमनवैल्थ खेलों की मशाल सौंप रही हैं। इन खेलों के लिए दिल्ली में अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं और निर्माण कार्य जारी है। लेकिन कॉमनवैल्थ गेम्स हैं क्या? उन देशों के समूह है कॉमनवैल्थ जो अंग्रेजी साम्राज्यवाद के गुलाम रहे हैं। इनमें से भारत ने लाखों शहीदों की शहादत के बाद इस साम्राज्यवादी जुए को उतार फैंका। बाकी देशों को संघर्ष से या ब्रिटेन के कमजोर करने के कारण आजादी मिली। इन भूतपूर्व गुलाम देशों ने गुलामी को बरकरार रखने के लिए कॉमनवैल्थ बना लिया जो दरअसल कॉमन गुलामी है। गुट निरपेक्ष आंदोलन, आसियान, दक्षेस, सार्क जैसे संगठन तो समझ में आते हैं और उनमें भारत की प्रमुखता भी भली लग सकती है, लेकिन ये कॉमन वैल्थ, उफ। ओलिंपिक, एशियाड समेत अनेक अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन हैं, जिनकी मेजबानी की दावेदारी भारत को करना चाहिए, अगर स्वतंत्र और ताकतवर देश के रूप में दुनिया में स्थापित होना है तो। लेकिन दुनियाभर में लोकतंत्र आने के बाद एक लोकतंात्रिक देश की प्रमुख एक साम्राज्ञी से सगर्व मशाल ग्रहण करें और इस मौके पर सारे खेल सितारे हाजिर हों तो दुख होता है। आखिर 23 साल की उम्र में भगत सिंह क्यों फांसी चढ़ गए, क्यों चंद्रशेखर आजाद खुद को गोली मारकर शहीद हो गए। गांधी जी ने किसलिए संघर्ष किया। क्योंंकि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज खड़ी की और देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए आहूति दे दी। लाखों अनाम शहीदों की कुर्बानी क्या, कॉमनवैल्थ की मशाल लेकर गर्व करने के लिए थी। मेरे प्यारे हमवतनों मुझे लगता है, इस संगठन और इस खेल आयोजन का आधार हमारी गुलामी का अतीत है, हमें उससे उबरने की जरूरत है। मनमोहन सरकार इस बात को समझे न समझे लेकिन देश के लोगों को तो समझना ही होगी। जय हिंद।

सोमवार, 2 नवंबर 2009

डैमेज कंट्रोल में सफल रहे शिवराज

मप के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल विस्तार में उन पूर्व मंत्रियों को दरकिनार रखने में नाकामयाब रहे थे, जिन्हें कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उन्होंने अपनी दूसरी पारी की शुरूआत में शामिल नहीं किया था। अजय विश्रोई, नरोत्तम मिश्रा और विजय शाह अपने पूर्व कार्यकाल में न केवल शिवराज सिंह चौहान के खासमखास थे बल्कि ताकतवर भी थे। करीब एक साल तक बिना मंत्री पद के रहे इन नेताओं में से अकेले नरोत्तम मिश्रा ऐसे थे, जिन्हें श्री चौहान फिर से अपनी टीम में रखने के इच्छुक थे। खैर दिल्ली परिक्रमा और वहां के नेताओं को प्रसन्न करने में कामयाब रहे विजय शाह और अजय विश्रोई भी फिर से मंत्री बन ही गए थे। लेकिन श्री चौहान को विभाग वितरण में पांच दिन लग गए। इसकी वजह यही थी कि कथित दागियों को मंत्री बनाने और प्रबल दावेदार तथा नए चेहरों को शामिल नहीं किए जाने से संगठन में भीषण असंतोष फूट पड़ा था। विंध्य में केदार शुक्ला को मंत्री नहीं बनाए जाने पर सामूहिक इस्तीफे हो गए थे। खैर विस्तार में हुई खामियों और दबावों के नतीजे में हुए नुकसान की भरपाई में शिवराज कामयाब दिख रहे हैं। उन्होंने स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग में अपना करिश्मा दिखा चुके अजय विश्रोई को इस मर्तबा पशुपालन,मछलीपालन और पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण जैसे हलके समझे जाने वाले विभाग दिए तो आदिवासी मंत्री विजय शाह को इस बार आदिम जाति कल्याण एवं अनुसूचित जाति कल्याण महकमा दिया। वे पहले वन विभाग में मंत्री रहकर खासे चर्चित रह चुके हैं। नरोत्तम मिश्रा स्कूल शिक्षा और फिर नगरीय प्रशासन विभाग के ताकतवर मंत्री रहे थे, इस मर्तबा उन्हें संसदीय कार्य और विधि विधायी विभाग मिला है। कुछ महीने केंद्र में मंत्री रहे और होशंगाबाद से कई दफा सांसद रहे सरताज सिंह को एक साल पहले मंत्री नहीं बनाने की गलती दुरूस्त कर उन्हें मंत्री बनाया गया और वन जैसा महत्वपूर्ण विभाग भी दिया गया है। जल संसाधन विभाग फिर से पाने के लिए मचल रहे और नाराजी दिखा रहे अनूप मिश्रा से ऊर्जा महकमा ले लिया गया तो कैलाश विजयवर्गीय से संसदीय कार्य विभाग वापस हुआ। ये दोनों तेजतर्रार यह महकमे छोडऩे के इच्छुक थे। सबसे ज्यादा खराब स्थिति शिक्षा मंत्री के तौर पर उच्च, स्कूल और तकनीकी शिक्षा तीनों महकमे ठीक से नहीं सम्हाल पा रही अर्चना चिटनिस की हुई। वे अब केवल स्कूल शिक्षा मंत्री रह गईं हैं। शिवराज मंत्रिपरिषद की दूसरी महिला मंत्री रंजना बघेल के पास अब केवल महिला एवं बाल विकास विभाग रह गया है। उनके पास अब तक सामाजिक न्याय महकमा भी था। लोकसभा चुनाव में अपने पति को टिकिट दिलाने में कामयाब और जिताने में नाकामयाब रहीं रंजना को इसी वजह से नुकसान उठाना पड़ा है। गृह, जेल, परिवहन महकमों के मंत्री जगदीश देवड़ा से गृह विभाग ले लिया गया है। यह वजनदार विभाग भोपाल के विधायक उमाशंकर गुप्ता को मिला है। पहली बार के विधायक होते हुए भी बाबूलाल गौर मंत्रिमंडल में सबसे ताकतवर मंत्री रहे गुप्ता को शिवराज सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद मंत्री पद नहीं मिला था। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव को सामाजिक न्याय विभाग भी दे दिया गया। लेकिन उनका पसंदीदा विभाग सहकारिता नहीं मिला। पीएचई और सहकारिता विभाग में अपनी कार्यशैली के कारण चर्चित मंत्री गौरीशंकर बिसेन के विभाग बरकरार रहने से यह संकेत गया है कि महकमे की कार्यप्रणाली से मुख्यमंत्री फिलहाल संतुष्ट हैं। लक्ष्मीकांत शर्मा को उच्च और तकनीकी शिक्षा विभाग के महकमे देकर उनका वजन बढ़ा दिया गया है। राज्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल से वन लेकर नए मंत्री सरताज सिंह को दिया गया है। लेकिन श्री शुक्ल को ऊर्जा जैसा महत्वपूर्ण महकमा भी दे दिया गया है। इतने महत्वपूर्ण विभाग का जिम्मा राज्य मंत्री को देना दूरदर्शी फैसला नहीं माना जा सकता। कुल मिलाकर शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल विस्तार में झेले दवाब को विभाग वितरण में परे धकेलने मेें कामयाब नजर आ रहे हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में महिलाओं और नए चेहरों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलने से पनपे असंतोष का क्या असर होता है, इसका लिटमस टेस्ट आसन्न नगरीय निकाय चुनाव में देखने को मिलेगा।

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

शिवराज के मंत्रिमंडल में नौ और मंत्री शामिल, दागियों को भी मिली जगह

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपनी दूसरी पारी के पहले मंत्रिमंडल विस्तार में नौ नए मंत्रियों को बुधवार को राजभवन में राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने शपथ ग्रहण कराई। सरताज सिंह,नरोत्तम मिश्रा, उमाशंकर गुप्ता, अजय विश्नोई, विजय शाह, कैबिनेट मंत्री और महेंद्र हार्डिया, नानाभाऊ मोहोड़, मनोहर ऊंटवाल, ब्रजेंद्र प्रताप सिंह राज्य मंत्री बनाए गए हैं। जबकि राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार करण सिंह वर्मा को पदोन्नत कर कैबिनेट दर्जा दिया गया है। आदिवासी विधायक जय सिंह मरावी को भी शपथ लेना थी लेकिन वे नहीं पहुंच सके। अब शिवराज सरकार के मंत्रियों की कुल संख्या 23 से बढ़कर 32 हो गई है। इस तरह एक और विस्तार की गुंजाइश बरकरार रखी गई है। मप्र के मंत्रिमंडल में 35 सदस्य हो सकते हैं। नगरीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देकर महिला शक्तिकरण की वाहवाही लूटने में लगी भाजपा सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार में एक भी महिला को मंत्री बनने लायक नहीं समझा। पहले भी केवल दो ही मंत्री अर्चना चिटनिस और रंजना बघेल शिवराज सरकार में शामिल हैं। मध्यप्रदेश में पहली बार रात में हुए इस शपथ समारोह में भाजपा के मप्र प्रभारी अनंत कुमार, नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी, पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा समेत अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे। रात पौने आठ सात बजे इन मंत्रियों केशपथ लेते ही करीब दो माह से चल रही मंत्रिमंडल विस्तार की कवायद पूरी हो गई। विस्तार में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने नानाभाऊ मोहोड़, मनोहर ऊंटवाल, ब्रजेंद्र प्रताप सिंह को शामिल कर क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। पहले मंत्री रह चुके और फिर से लाल बत्ती पाने के लिए मशक्कत कर रहे अजय विश्नोई, नरोत्तम मिश्रा और विजय शाह भ्रष्टïाचार के आरोपों में घिरे रहने के बावजूद दोबारा मंत्री बनने में कामयाब रहे। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के करीबी होने की वजह से पहली बार के विधायक होने पर भी मंत्री बन चुके उमाशंकर गुप्ता को अब शिवराज ने श्री गौर को ही दरकिनार रखने के लिए मंत्री बना दिया है। जबकि भ्रष्टïाचार के आरोपों और अपने पुत्रों के खिलाफ हत्या जैसे संगीन मामले की सीबीआई जांच के चलते कमल पटेल को निराशा हाथ लगी है। वे फिर मंत्री नहीं बन पाए। दूसरी बार भाजपा की सरकार बनने पर बीते साल दिसंबर में शपथ लेने के लिए बुला लिए जाने के बाद ऐन वक्त पर दरकिनार कर दिए गए पूर्व केंद्रीय मंत्री सरदार सरताज सिंह को मंत्री बनाकर शिवराज सिंह चौहान ने भूल सुधार कर लिया है। हालांकि पिछली बार की तरह इस बार भी पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा सरताज सिंह का पत्ता कटवाने में जुटे रहे बताए गए थे। प्रदेश में नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण लागू कर चुकी सरकार ने मंत्रिमंडल में महिला वर्ग को पर्याप्त महत्व नहीं दिया है। विस्तार में एक भी नई महिला मंत्री नहीं बनाई गई है। अर्चना चिटनिस और रंजना बघेल पहले से ही मंत्री हैं। छह घंटे पहले ही बज उठे नगाड़ेराजभवन में नए मंत्रियों की शपथ से छह घंटे पहले ही उनके आवासों और कार्यालयों पर खुशी के नगाड़े बज उठे थे। दोपहर दो बजे तक तो उमाशंकर गुप्ता, सरताज सिंह, अजय विश्नोई, विजय शाह और नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने पटाखों की लडिय़ों से आतिशबाजी शुरूकर दी थी। सर्वाधिक जश्न सरताज सिंह समर्थकों में था। प्रदेश भाजपा कार्यालय दीनदयाल परिसर के ठीक पीछे स्थित उनके होटल के बाहर तो दीपावली जैसा माहौल हो गया था। पिछली दफा जब वे मंत्री नहीं बन पाए थे, तो उनके समर्थकों ने पार्टी कार्यालय में जमकर तोडफ़ोड़ कर दी थी। होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र से कई दफा सांसद रहे श्री सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को भी इसी क्षेत्र से लोकसभा चुनाव में पटखनी दी थी। उन्हें मंत्री बनाए जाने के आश्वासन के साथ ही विधानसभा चुनाव लड़ाया गया था, उसमें भी उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज और अपराजेय तत्कालीन विधानसभा उपाध्यक्ष हजारीलाल रघुवंशी को परास्त किया था। उन्हें मंत्री नहीं बनाए जाने का खामियाजा भाजपा को हाल ही में लोकसभा चुनाव में होशंगाबाद सीट गंवाकर उठाना पड़ा था।

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

चीन से रोशन हिंदोस्तां हमारा...

शीर्षक अटपटा लग सकता है और चीन की हरकतों से आक्रोशित हर भारतीय को चुभ सकता है। लेकिन मित्रो यह शीर्षक बिल्कुल सच है, पूरे सोलह आना और सौ फीसदी सच। आज पांच दिवसीय दीपोत्सव का पांचवां दिन है और शहरों में जगमगाती रोशनी इस बात की गवाही दे रही है कि इस झिलमिलाहट में चीनी उत्पादों का हिस्सा भारतीय उत्पादों के बनिस्बत ज्यादा है। बीते करीब तीन चार साल से भारतीय बाजारों में दीपावली के एक महीने पहले ही बल्वों की लडिय़ां और तरह तरह के आयटम भर जाते हैं। इनमें जो सस्ते और विविधता भरे आयटम होते हैं वे चीन निर्मित हैं। हालत यह है कि स्थानीय कारोबारियों को खुदरा विक्रेताओं को दो और चार गुने तक दाम आसानी से मिल जाते हैं और खरीददार को फिर भी लगता है कि सस्ता आयटम मिल गया। बेचने वाले खुलेआम बताते हैं कि यह आयटम चीनी है इसकी कोई गारंटी नहीं, चले तो कई साल चल जाए और न चले तो हमारी जिम्मेदारी नहीं। हर दीपावली पर नए नए आयटम चीन भारत में भेजता है और जमकर खपते हैं। मुझे याद है जब हमारे मोहल्ले के कई लड़के बल्ब, डोरी और कईया लाकर बल्बों की लडिय़ां तैयार करते थे और आसपास ही उन्हें बेचकर दीवाली के पटाखों का खर्च निकाल लेते थे। कई स्थानीय छोटे छोटे दुकानदार इस तरह के आयटम तैयार करके बेचते थे। अब यह छोटा मोटा रोजगार पूरी तरह खत्म हो चुका है। क्योंकि उजाले के भारतीय पर्व दीपावली को मनाने के लिए चीन भरपूर आयटम भेज रहा है, भले ही वे खतरनाक हो सकते हों, ऊर्जा की बर्बादी करने वाले हों। अकेले बिजली के नहीं बल्कि खिलौनों से लेकर मोबाइल और दूध तक चीन से भारत में आ रहे हैं। इनकी क्वालिटी की कोई गारंटी नहीं लेकिन महंगाई के इस दौर में सस्ता बिकता है, गारंटी से। चीनी प्रोडक्ट भरोसेमंद नहीं हैं ठीक उसी तरह चीन भी भरोसेमंद नहीं है। नेहरू-चाउ एन लाई का हिंदी चीनी भाई भाई नारा 1962 में चीन के धोखे और भारत की पराजय में तब्दील हुआ था और अब तक वह जख्म नासूर बना हुआ है। सोनिया मनमोहन से लेकर चिंदबरम तक और आनंद शर्मा से लेकर मनीष तिवारी तक भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ पर इंकार की मुद्रा में दिखाई भले दे रहे हों लेकिन मीडिया ने जो सच्चाई उजागर की है, उससे देश हकीकत को जान चुका है। देश के लोग सरकारी सफाई से कतई मुतमईन नहीं हैं।

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

एक दीप धरें मन की देहरी पर

आप सभी को सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। दीप पर्व पर मेरी अपनी एक कविता सुधिजनों को समर्पित है।
एक दीप धरें मन की देहरी पर
धीरे धीरे घिरता है तम,

ग्रस लेता जड़ और चेतन को

निविड़ अंधकार गहन है ऐसासूझ न पड़ता

हाथ को भी हाथ

क्या करें,

कैसे काटें इस तम को

यह यक्ष प्रश्न

विषधर साकर देता किंकर्तव्यविमूढ़

तो जगती है एक किरनउम्मीद की

टिमटिमातीकंपकंपाती दीप शिखा सी

आओ लड़ें तिमिर अंधकार से,

एक दीप धरें मन की देहरी परप्रेम की जोत जगाएं हम

मिटे अंधियारा

बाहर काभीतर का भी,

आओ दीपमालिका सजाएं,

दीपावली बनाएंएक दीप धरें मन की देहरी पर।।

- सतीश एलिया

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

मक्का एक लाख रुपए क्विंटल ......

शीर्षक चौंकाने वाला लग सकता है। जी हां मक्का के फूटे हुए दाने दस रुपए तोले के भाव बिक रहे हैं। जिन्हें किसी जमाने में फुटाने कहा जाता था और अब जो पॉप कॉर्न के नाम से विख्यात हैं, ट्रेनों में आम आदमी की बोगी अर्थात जनरल कोच में अंग्रेजी के देसी नाम पप्पन से जाने जाते हैं। ट्रेनों में दो रुपए तौला और माल्स, थिएटर और बड़े लोगों के शॉपिंग मेलों में दस रुपए तौले के भाव में मिल रहे हें। कल में ऐसे ही एक मेले में गया था, शौक से कतई नहीं बल्कि कर्तव्य परायणता की वजह से । पति धर्म निभाने अर्थात पत्नी की मंशा पूरी करने में इस शॉपिंग मेले में गया था, वहां जो चीज सबसे सस्ती थी, यही थी। देश भर के किसान और गरीब मुझ गरीब को माफ करें मैंने इस मेले में 20 रुपए के 10 ग्राम पॉपकार्न न केवल खरीदे बल्कि पत्नी के साथ खाए भी। अर्थात मक्का के दाने उर्फ पॉप कार्न बीस रुपए में 10 ग्राम। जरा सोचिए मक्का का सरकारी समर्थन मूल्य 840 रुपए प्रति क्ंिवटल है और बाजार में अधिकतम भाव 890 रुपए प्रति सौ किलो है। यही मक्का जब पॉप कार्न के नाम से बिकती है तो उसका भाव एक लाख रुपए क्विंटल हो जाता है। जो किसान बोता है, सींचता है और काटकर, साफ कर दुकान पर बेचता है, उसके दाम और पॉप कार्न के दाम में हजारों गुना फर्क। सरकारें किसानों के कर्ज माफ कर अहसान जताने, उन्हें मिलने वाली सब्सिडी लगातार घटाने में लगी रहती हैं लेकिन 840 रुपए क्विंटल की मक्का को एक लाख रुपए क्विंटल के भाव में बेचकर मुनाफा कमाने पर कोई नियंत्रण नहीं है। दलितों के नल पर नहाने, उनके यहां टेबिल लगवाकर खाना खाते हुए फोटो खिंचवाने और दलितों के घर में रात बिताकर लोगों की समस्याएं सीखने में लगे राहुल बाबा अगर किसानों, गरीबों की जिंदगी की वास्तविक दिक्कतें समझना चाहते हैं और सही मायने में राजनीति को गरीबी हटाने से जोडना चाहते हैं तो उन्हें किसान की उपज और बाजार में उसके उत्पादों की कीमतों में हजारों गुने अंतर को पाटने पर काम करना होगा। राहुल से कांग्रेस के विरोध ी दलों के नेताओं को भी उम्मीद जगी हैं, लेकिन उम्मीद ये की जाना चाहिए कि उनकी यह दलित घरों में जाने की प्रायोजित किस्म की मुहिम वाकई बदलाव की वजह बन पाए। अन्यथा कलावती के यहां भी वे गए थे और कलावती खुश तो कम से कम नहीं ं ही है।

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

आचार्य त्रिखा को गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान

वरिष्ठ पत्रकार प्रो. नंदकिशोर त्रिखा को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से अलंकृत करने निर्णय लिया है। वे नवभारत टाइम्स के संपादक रहे हैं और इस विवि के पहले प्रोफेसर,मैं इस विवि के पहले बैच का विद्यार्थी हूं, अपने आचार्य के सम्मान से मैं अत्यंत हर्षित हूं। अठारह साल पहले जब हम भोपाल में खुले इस विवि में आए थे, तो हमारे लिए पत्रकारिता की पढाई नई चीज थी और उनके लिए अध्यापन। वे तो वर्षों से पत्रकारिता से जुडे थे और मैं कुछ ही सालों से पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के जरिए जुडा था। मैं डा. त्रिखा के बारे में कुछ अनुभव और संस्मरण यहां बांटना चाहता हूं। उनमें दो गुण ऐसे हैं जो किसी भी पत्रकार में होना ही चाहिए। पहला अध्ययन शीलता, दूसरा वक्त की पाबंदी। त्रिखा जी पत्रकारिता विभागाध्यक्ष तो थे ही वे हास्टल में हमारे वार्डन भी थे। वे कक्षाओं के बीच में अध्ययनरत रहते थे और देर रात गए तक उनका अध्यवसाय जारी रहता था। इसके बावजूद वे अलसुबह उठकर सैर कर आते थे और कक्षा में एक सेकंड भी विलंब नहीं होता था। आप उन्हें देखकर घडी मिला सकते थे। जब हम लोग अध्ययन यात्रा पर दिल्ली गए तब भी हमने उनकी वक्त की पाबंदी देखी। हम लोग साउथ ब्लाक मंे रूके थे और दिल्ली में उनका घर साकेत में है। हमारी गणमान्य लोगों से मुलाकात और मीडिया संस्थानों या संसद की कार्यवाही देखने के अपाइंटमेंट डा. त्रिखा ही करते थे, हर दिन जब भी हम लोग पहुंचते वे पहले से वहां हमारा इंतजार कर रहे मिलते थे। पत्रकारिता में उनकी सक्रियता और उनके सम्मान को हमने संसद से लेकर राष्टपति भवन तक देखा। उनकी सह्रदयता और विदयार्थियों से प्रेम खूब याद आता है। वे दिल्ली के हमारे व्यस्त अध्ययन दौरे में समय निकालकर हम सब को अपने घर ले गए और बहुत आत्मीयता से स्वागत किया। अब जबकि पत्रकारिता में मक्कारिता करने वाले कमोबेश सभी जगह हावी दिख रहे हैं, संपादक तक बन रहे हैं, त्रिखा जी को यह सम्मान मन को सुकून देता है, गौरवान्वित करता है।त्रिखाजी से जुडी एक और याद मेेरे मन में है। वो ताजा हो गई है कि वह अवसर शरद पूर्णिमा का था, मेरा जन्म दिन होता है। हम लोग हास्टल में नए थे, नया विवि, नए प्राध्यापक, शिक्षक साथी, भवन सब कुछ नया नया था। हास्टल में बात बात में किसी मित्र ने मेरी डेट आफ बर्थ पूछी तो मैंने कहा था कि तारीख से नहीं हम तो तिथि से याद रखते हैं, तिथि ही ऐसी है शरद पूर्णिमा। सितंबर की यह बात अक्टूबर में शरद पूर्णिमा को मित्रों ने रात हास्टल की छत पर आयोजन कर लिया, छात्राओं ने खीर बनाई, मिठाई मंगाई गई। चांदनी रात में कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ, इसमें डा. त्रिखा, प्रो. कमल दीक्षित, मैडम दविंदर कौर उप्पल, सभी हास्टल निवासी छात्र छात्राएं शामिल हुए। मेरे मन में आज भी वो सुर गूंजते हैं, त्रिखाजी ने भजन सुनाया था- राह दिखा प्रभु...। इस पूरे आयोजन की बात फिर कभी। मुझे यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है कि हास्टल के सबसे दुर्दांत छात्रों मंे मैं शामिल था, त्रिखाजी हमसे बेहद दुखी रहते थे, लेकिन तब भी हम उनका तहे दिल से सम्मान करते थे। हां झूठी जी हुजूरी नहीं करते थे और मस्ती खूब करते थे। अनुशासन प्रिय त्रिखाजी को यह नागवार गुजरता था। खैर एक दिन रात को उन्होंने सन्नाटे में टाइपराइटर की खट-खट सुनी तो वे वहां पहुंच गए, जहां मैं टाइपिंग सीखने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने कहा कि बिना 15 लिखित अभ्यास सीखे टाइपिंग मंे निष्णात नहीं हुआ जा सकता। मैंने इसे चैलंेज बना लिया, रोज रात को टाइपिंग सीखता। कुछ दिन बाद मैंने उनके सामने स्पीड में टाइप करके दिखाया तो वे मुस्कराए और मुझे शाबासी दी। मुझे निबंध प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार मिला तब भी उन्होंने मेरी तारीफ, जब परीक्षा परिणाम आया तो उन्होंने सबसे पहले मुझे इसकी सूचना कि आप प्रथम श्रेणी में उतीर्ण हो गए हैं, प्रायोगिक परीक्षाओं में दूसरों से कम नंबर मिलने से मैं नाराज अवश्य था लेकिन आज सोचता हूं तो लगता है, अच्छे शिक्षक मिलना भी सौभाग्य होता है, मैं इस मामले में सौभाग्यशाली रहा। आखिर में वह वाकया जरूर बताना चाहूंगा, जो अब भी जेहन में ताजा है। त्रिखाजी जब भोपाल से जा रहे थे, हम दो तीन मित्रों को जो स्थानीय अखबारों में काम कर रहे थे, अचानक यह सूचना मिली तो हम भागे भागे रेलवे स्टेशन पहुंचे। शताब्दी एक्सप्रेस दिल्ली रवाना होने ही वाली थी, हम उनके कोच में पहुंचे, चरण स्पर्श किए। पुरानी सभी भूलों, उददंडताओं के लिए क्षमा मांगी, सह्रदय त्रिखाजी की आंखों में आंसू भर आए, हम भी अश्रु विगलित हो उठे। उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया। गुरूओं का आशीष है, पत्रकारिता में 18 वर्षों के दौरान कई तरह के दौर में उनकी शिक्षा और अनुभव साये की तरह काम आए। आचार्य त्रिखा को गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान प्रदान करने के निर्णय पर उन्हें हार्दिक बधाई और नमन।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

प्यारेलाल जी नहीं रहे....

मध्यप्रदेश में जनसंघ और संघपुत्री भाजपा को जिन लोगों ने चना चबेना खाकर शहर शहर कस्बे कस्बे और गांव गांव घूमकर पोषित पल्लवित किया, उन सम्मानीय कार्यकर्ताओं में से एक प्यारेलाल जी नहीं रहे। भाजपा के राष्टीय उपाध्यक्ष, महासचिव, दिग्विजय सिंह को हराकर राजगढ से लोकसभा सदस्य रहे प्यारेलाल खंडेवाल का आज निधन हो गया। शाम पांच बजे भोपाल में उस स्थल के करीब उनकी अंत्येष्टि होगी जहां कुशाभाउ ठाकरे पंचतत्व में विलीन हुए थे। श्री खंडेलवाल वर्तमान में मप्र से राज्यसभा सदस्य थे। कैंसर जैसी घातक बीमारी से सालों से लडते रहे और बार बार उसे चित भी करते रहे प्यारेलाल जी को पिछले महीने ह्रदयाघात के बाद दिल्ली में इलाज के लिए भर्ती किया गया था। करीब चार साल पहले मप्र भाजपा ने उनका अम्रत महोत्सव आयोजित किया था। मप्र मंें भाजपा जिन लोगों के पसीने से लहलहाती फसल बनी उनमें कुशाभाउ ठाकरे के साथ प्यारेलाल खंडेलवाल और नारायण प्रसाद गुप्ता का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वर्ष 2003 में मप्र में भाजपा की सरकार बनने से पहले मैंने उनसे लंबी बातचीत की थी, यह साक्षात्कार 28 सितंबर को प्रकाशित भी हुआ था। उस वक्त नौ साल से जमी दिग्विजय सरकार को उखाडने के लिए भाजपा ने कमर कस ली थी, उमा भारती को सीएम प्रोजेक्ट करने की सुगबुगाहट शुरू ही हुई थी। आडवाणी खेमा इसके लिए माहौल बनाने के प्रयास में था। ऐसे में इस बातचीत में श्री खंडेलवाल ने किसी को भी सीएम प्रोजेक्ट करने की खिलाफत की थी, उनका विरोध व्यक्ति से नहीं था, वे सैद्धांतिक विरोध कर रहे थे। बाद में उनकी कही बातें सच हुईं, उमा भारती मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहीं, बाबूलाल गौर आए फिर शिवराज सिंह चैहान। यह साबित हो गया कि वोट पार्टी का था उमा का नहीं और न ही अब जिस वोट से भाजपा की सरकार बनी है वह शिवराज का वोट है। जाति के मामले में भी यही हुआ। प्रसंगवश यह साक्षात्कार में यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूं।
मैं किसी को सीएम प्रोजेक्ट करने के पक्ष में नहीं: खंडेलवाल

सतीश एलिया


भोपाल, 27 सितंबर २००२


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्यारेलाल खंडेवाल मप्र में विधानसभा चुनाव में किसी भी नेता को सीएम प्रोजेक्ट कने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि चुाव किसी एक नेता के बलबूते नहीं जीता, पार्टी का जनाधार सरकार बनाता है। मप्र में भाजपा का जनाधार किसी व्यक्ति या जातिगत आधार पर नहीं है। इस संवाददाता से खास मुलाकात में श्री खंडेलवाल ने कहा कि मप्र में कोई व्यक्ति या जातीय समीकरण महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि पार्टी का जनाधार ही महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि अब तक के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने प्रदेश में किसी एक नेता को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया। मेरी राय में ऐसा किया भी नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीतने के लिए पार्टी के जनाधार के अलावा यह महत्व रखेगा कि जीतने की क्षमता वाले प्रत्याशियों को टिकिट दिए जाएं। श्री खंडेलवाल ने दावा किया कि माहौल भाजपा के पक्ष में नजर आ रहा है, हालांकि चुनाव में अभी सवा साल बाकी है।पार्टी संगठन में बदलाव के बारे में पूछे जाने पर श्री खंडेवाल ने कहा कि युवाओं को आगे लाना एक प्रयोग है। लीक से हटकर नई व्यवस्था बनाने की कोशिश की गई है। पार्टी की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच यह प्रयोग किया गया है। दो अक्टूबर से सदस्यता अभियान शुरू होगा, इसके बाद संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी। संगठन चुनाव ही कसौटी होंगे कि प्रयोग सफल रहा या असफल।मप्र में युवा नेत्रत्व के बजाय अनुभव को तरजीह दी जाने को उचित ठहाते हुए श्री खंडेलवाल ने कहा कि युवाओं को आगे लाने का मतलब अनुभवी नेताओं को घर बैठा देना नहीं हो सकता। मप्र भाजपा अध्यक्ष कैलाश जोशी की टीम में अपेक्षाक्रत युवा लोगों को जगह मिली है।श्री खंडेलवाल ने सवालों के जवाब में कहा कि गांव चलो अभियान के दौरान उन्होंने पाया कि आतंकवाद के मामले मंे देशवासियों के धैर्य की सीमाएं टूट चुकी हैं और अब वक्त आ गया है कि भारत को पाकिस्तान में चल रहे ट्रेनिंग कैंप तबाह कर देना चाहिए। भाजपा इस बारे में शिव सेना की राय से पूरी तरह सहमत है। पार्टी जनता की इस भावना से केंद्र सरकार को अवगत कराएगी। लोग अब आतंकवाद को मुह तोड जबाव देने के बयान सुनने के बजाय एक्शन चाहते हैं। भारत पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी ट्रेनिंग कैंपों को नष्ट करने जैसा सख्त कदम उठाए तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस कदम का विरोध नहीं करेगा, क्योंकि दुनिया पाकिस्तान की करतूतों को अनदेखा नहीं कर सकती है। शिवसेना सुप्रीमो की एनडीए सरकार से समर्थन वापसी की धमकी पर श्री खंडेलवाल ने कहा कि सरकार में रहना न रहना शिवसेना का अपना मामला है, इसके लिए वह स्वतंत्र है।जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में संघ समर्थित मोर्चा और भाजपा के आमने सामने आने के मामले में भाजपा उपाध्यक्ष ने कहा कि मोर्चा राज्य को दो नए राज्यों तथा एक केंद्र शासित प्रदेश में बांटने का पक्षधर है। जबकि भाजपा इससे सहमत नहीं है। इस असहमति के बावजूद चुनाव में मोर्चे और भाजपा ने मिलकर ही चुनाव लडा है, पार्टी को चुनाव में कोई नुकसान नहीं होगा।राम मंदिर, समान नागरिक कानून और धारा 370 के मुददे पीछे धकेल दिए जाने के सवाल पर श्री खंडेलवाल ने कहा कि प्राथमिक मुददे समय के साथ बदल जाते हैं। एनडीए के एजेंडे से सरकार चल रही है। लेकिन भाजा के एजेंडे में भी अब सबसे उपर सरकार का परफार्मेंस तथा विश्व में भारत की प्रतिष्ठा है। भाजपा ने तीनों मुददे छोडे नहीं हैं लेकिन वे अब प्राथमिक मुददे नहीं हैं। इनके बिना भी 1996 में भाजपा को सर्वाधिक सीटें मिलीं। पार्टी के गांव चलो अभियान के बारे में श्री खंडेलवाल ने बताया कि कार्यकर्ता देश के दो लाख गांवों में पहुंचकर केंद्र सरकार की योजनाओं का जायजा लेंगे। फीड बैक सरकार को दिया जाएगा। पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा आयोजन पहली बार कर रही है, हालांकि मप्र, हरयाणा और उडीसा में अलग अलग नामों से इसी तरह के अभियान चलाए जा चुके हैं। मप्र में 88-89 में ग्राम राज अभियान चलाया गया था। हरयाणा, उडीसा में गांव राज अभियान तथा उप्र में एक रात गांव में अभियान चल चुके हैं। इनसे भाजपा का गांवों में जनाधार बढा है। अर्से तक मप्र में पार्टी की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे खंडेलवाल ने बताया कि संगठन को उनकी जरूरत उन राज्यों में ज्यादा है, जहां पार्टी का फैलाव कम है। वे अभी उडीसा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों के प्रभारी हैं। अगले माह पूर्वोत्तर का दूसरा दौरा शुरू करेंगे।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

बिग बास यानी उतरन......

हर विदेशी टीवी रियलिटी शो को भारतीय चैनल्स में बतौर उतरन पेश करने की श्रंखला मं इन दिनों अपने कौन बनेगा करोडपति प्रथम और द्वितीय वाले बच्चन बाबू उर्फ बिग बी का बिग बॉस त्रतीय शुरू हो गया है। रंगारंग शुरूआत में खुद अमिताभ बच्चन और उनके परम भक्त कामिडियन राजू श्रीवास्तव ही सही मायने में सेलेब्रिटी थे। कलर्स के हर सीरियल के आखिर में इमोशनल ड्रामे पर ब्रेक लगते ही उस सीरियल के सब कलाकार बिग बास को देखने की गुहार कई दिनों से लगा रहे थे। अखबारों में 13 प्रतिभागियों के धुंधले फोटो वाले विज्ञापन में रहस्य दिखाया जा रहा था, मानो लोग इनके नाम जानने के लिए मरे जा रहे हों। खैर जब नाम सामने आए तो कोई अचरज शायद ही किसी को हुआ होगा। क्योंकि यह सभी जानते हैं कि कोई भी व्यस्त और वाकई सेलेब्रिटी 90 दिन इस कार्यक्रम में क्यों उलझेगा भला? तो इस शो में जो 13 लोग आए उनमें चैंकाने वाला कोई नाम नहीं है। बीते जमाने की हीरोइन अरे वही तीस साल पहले त्रिशूल में सचिन, अरे तेंदुलकर नहीं वो प्रमोद महाजन के कुपुत्र के साथ बच्चों के चुटकुलों वाले शो के जज बनकर बैठे रहते हैं, के साथ गपूची गपूची गम गम... वाला गाना गाते हुए बंबईया फिल्मों, राज जिन्ना ठाकरे के लिए मुंबईया फिल्मों में, आई थीं। अर्थात पून ढिल्लो, जो इन दिनों कुकरी शोज तक में आ रही थीं, इक्का दुक्का सीरियल्स में भी दिखीं थीं। खैर इन 13 प्रतिभागियों में राखी सावंत की मां भी हैं, और पर्याप्त कुख्यात हो चुके संगीतकार ईस्माइल दरबार भी हैं। जितने भी लोग इसमें हैं, उनमें राजू श्रीवास्तव ही वास्तव में सेलिब्रिटी कहे जा सकते हैं, वे शायद इस कार्यक्रम को अपनी दम पर चला ले जाएं। लेकिन बच्चन बाबू का यह नया अवतार शायद ही कौन बनेगा करोडपति वाली सफलता हासिल कर पाए। काहे से कि रीयल पर ऐसा ही एक शो पहले से ही चल रहा है अपने गाडरवारा वाले आशुतोष नीखरा अर्थात आशुतोष राणा के सरकारत्व में सरकार की दुनिया। उसकी टीआरपी तो नहीं मालूम लेकिन उसकी चर्चा लोगों की बातचीत में सुनाई नहीं देती। कंपनियां कुछ भी कहें टीआरपी के बारे में लेकिन अपने हिसाब से तो टीआरपी उसकी ज्यादा जिसकी चर्चा घर, आफिस, पार्टी, शादी ब्याह इत्यादि समारोहों में बसों, ट्रेनों में होने लगे। फिलहाल कलर्स के लाडो और बालिका वधू और भाग्य विधाता की चर्चा गाहे बगाहे सुनाई देती हे, अर्थात यही कार्यक्रम ज्यादा सफल हैं। तो हमारे कहने का मतलब ये कि बिग बास द्वितीय के प्रतिभागी बिग बास प्रथम के मुकाबले कमजोर हैं, बस अकेले बच्चन बाबू और गजोधर अर्थात राजू श्रीवास्तव ही इसकी नैया पार लगाने की कोशिश करेंगे। अगली पोस्ट में हम बात करेंगे एकता कपूर की.......

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

शरद के चांद पर बादलों का साया है

शरद के चांद पर आज बादलों का साया है,

दिन खुशगवार था रात पर भी नशा सा छाया है।

ये कौन मेरे दिल पे अपना नक्श गया है छोडकर,

हर सिम्त हर जर्रे में उसका ही सरमाया है।

अब यहां रिश्तों में न रही पहले सी हरारत,

हर शख्स दूसरों से और अपने आप से घबराया है।

चल बेबाक गुम हो जाएं अपनी ही बेखुदी में,

यहां कौन किसके गम को समझ पाया है।

शरद के चांद पर बादलों का सरमाया है।।

- सतीश एलिया बेबाक

भोपाल शरद पूर्णिमा 2009

बुधवार, 30 सितंबर 2009

मौला रूखसाना सी बिटिया ही दीजौ

जम्मू से 180 किलोमीटर दूर एक गांव की बेटी रूखसाना है जुर्म को मजहब मान बैठे पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादियों को उन्हीं की क्लाशिनकोव की गोलियां से ढेर कर पूरे देश का सर गर्व से उंचा कर दिया है। इस घटना से हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के उन लोगों की आंखें खुल जाना चाहिए जो बेटियों को जन्मते ही मार डालने में यकीन रखते हैं और बेटों की चाहत रखते हैं। उनकी आंखें खुल जाना चाहिए जो परवरिश से लेकर शिक्षा दीक्षा तक में बेटों को बेटियों से ज्यादा तरजीह देते हैं। जो पूजा तो दुर्गा की करते हैं लेकिन देवी से कामना पुत्र जन्म की करते हैं, जो बेटी के जन्म पर शोकाकुल तक हो उठते हैं। यहां तक की अपनी बेटी के यहां बेटी पैदा होने पर मातमी मुद्रा में आ जाते हैं। अपने माता पिता को आतंकवादियों के हाथों पिटता देख रणचंडी बनी रूखसाना ने शौर्य का प्रतिमान स्थापित किया है, वह देश की सभी बेटियों के लिए मिसाल बन गया है। जिन हाथों ने कभी घरेलू कामकाज में इस्तेमाल होने वाले छिटपुट हथियारों के सिवाय कभी कोई हथियार न उठाया हो, जिसने कभी एके 47 या कोई और शस्त्र सुना देखा न हो, उस लडकी में इतनी ताकत आखिर कहां से आ गई कि उसने प्रशिक्षित आतंकवादियों को उन्हीं की बंदूक छीनकर ढेर कर दिया? निसंदेह यह अपने माता पिता से असीम प्रेम की ताकत थी जो क्लाशिनोव की ताकत को कुल्हाडी से पछाडने की ताकत बन गई। जम्मू कश्मीर सरकार और केंद्र सरकार को चाहिए कि वह न केवल आतंकवाद के खिलाफ बल्कि बेटियों को लेकर देश के कुछ हिस्सों और समाजों में कमतरी की भावना को खत्म करने के लिए रूखसाना को ब्रांड एंबेसेडर बनाएं। रूखसाना की हिम्मत, माता पिता से प्रेम की खातिर आतंकवादियों से जूझना और जीतना, एक अर्थ में श्रवण कुमार की मात-पिता भक्ति के दर्जे से भी उंची हो गई है। रूखसाना को मेरा सलाम, शाबाश बहन हमें तुम पर नाज है।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

अपने स्वार्थ के लिए विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लगाने वालों का तंबू उखड़ा

गुरूवार को जब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के माननीय जज एक विद्यार्थी की याचिका पर सुनवाई कर फैसला लिख रहे थे, ठीक उसी वक्त भोपाल के नूतन कॉलेज के बाहर धरने पर बैठे कॉलेज शिक्षकों को एक प्राध्यापक महोदय रोज की तरह संबोधित कर रहे थे। वे कह रहे थे विद्यार्थियों को ठीक उसी तरह हमारा साथ देना चाहिए जैसा महाभारत युद्ध में हनुमानजी ने किया था। महाशय खुद समेत सभी हड़ताली शिक्षकों को पांडव और सरकार को कौरव सेना इंगित कर छात्रों को हनुमानजी बताने की चेष्ठा कर रहे थे। छात्र हनुमानजी के दूत हो सकते हैं, क्योंकि हनुमानजी युवा लहर के प्रतीक हैं, अन्याय और असत्य पर मुष्टिï प्रहार करने वाले हैं। खैर कोर्ट ने प्राध्यापकों की हड़ताल को गलत और उनकी मांग को खारिज कर पढ़ाने का काम बहाल करने का आदेश दे दिया। शाम तक तंबू उखड़ गया। कोर्ट का फैसला सत्य की जीत है, वो इसलिए कि अध्यापन का मूल काम छोड़कर वेतन बढ़वाने के लिए कॉलेज बंद कर देना शिक्षक वृत्ति और गुरू परंपरा के न केवल खिलाफ है बल्कि त्याज्य है। हां अगर उन्हें वेतन मिलना बंद हो जाए तो उनकी जीविका के लिए की जाने वाली हड़ताल को हर हाल में समर्थन मिल सकता है, विद्यार्थियों की तरफ से भी और आम जनता की भी तरफ से भी। शैक्षणिक रूप से अन्य कई प्रदेशों के मुकाबले अपेक्षाकृत पिछड़े मप्र में शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने में जुटने के बजाय वेतन बढ़वाने और सालों साल शहरों में पदस्थ बने रहने वाले प्राध्यापकों के नेतृत्व में हुए इस नाकाम आंदोलन का ऐसा हश्र स्वागत योग्य है। अब सरकार को सख्त कदम उठाते हुए इन प्राध्यापकों से पढ़ाई, प्रैक्टिल और इम्तिहान में हुए विलंब की भरपाई करने का आदेश देना चाहिए। ऐसा होगा तो एक नजीर बनेगी और छात्रों के हित में सरकार की पहल को भी सराहना मिलेगी।
(कृपया इस संबंध में मेरी 10 सितंबर 2009 की पोस्ट भी देखें)

बुधवार, 23 सितंबर 2009

जिंदादिल कौन है?

जो खुद पर हंस सके वही सबसे ज्यादा जिंदादिल हैं। जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दा दिल क्या खाक जीया करते हैं। मित्रों आज में आपसे ऐसे शख्स के बारे में बात कर रहा हूं, जिनका सेंस आफ ह्यूमर गजब का है और जीवट भी उतने ही गजब का। यह बात इसलिए कि वे अक्सर मेरे पास आते हैं, बावजूद इसके कि मैं शायद इक्का दुक्का मर्तबा ही उनसे जाकर मिला हूं। वे जब भी आते हैं, कोई ऐसी बात, जुमला या चुटकुला छोड़ जाते हैं कि देर तक मन गुदगुदाता रहता है। कल जब वे आए तो बोले- मैं संडे को छत पर चला गया था, सोमवार को ईद हो गई। कोई अपने गंजेपन को इस तरह एंजाय कर सकता है भला! यह जिंदादिल इंसान हैं हमारे पत्रकार मित्र डा. महेश परिमल अरे, वही ब्लाग जगत में 'संवदेना के पंखÓ लिखते हैं। इसमें साबुन से लेकर कहानी और कविता से लेकर शोर शराबे तक तमाम विषयों पर शिद्दत से जानकारियां दी जाती हैं और संवेदना जगाई जाती है। मैं डा. परिमल को करीब पौने दो दशक से जानता हूं, जब वे देशबंधु अखबार में भोपाल आए थे, इसके बाद वे नवभारत में रहे और इन दिनों गुजराती अखबार दिव्य भास्कर के लिए काम करते हैं। वे पत्रकारिता में पीएचडी हैं और वह भी शीर्षक अर्थात हेडलाइंस में। इस दौर में जब डा. परिमल और उन सरीखे अन्य कई पढ़े लिखे पत्रकार किन्हीं वजहों से हिंदी पत्रकारिता में हाशिए पर हैं, वे लेखन में पूरी तरह न केवल संलग्न हैं, बल्कि बाल पत्रिकाओं से लेकर रेडियो तक के लिए सतत लेखन करते रहते हैं। वह तब जब उन्हें आंखों की क्षमता प्रभावित हो जाने की वजह से लंबे समय तक इलाज कराना पड़ा था। अब भी उन्हें लिखने और पढऩे में खासी तकलीफ होती है, लेकिन वे सिवाय लिखने और पढऩे के कोई और काम कर ही नहीं सकते। पूरी तरह मसिजीवी इस शख्स के बिंदास अंदाज का एक और नमूना बताना चाहता हूं। एक दिन वे आए और बोले अगर मैं आपको गाली देना चाहूं तो बिना गाली दिए भी गाली दे सकता हूं। हमारे एक साथी ने पूछा तो डा. परिमल बोले- मैं कहूंगा आप विशाल भारद्वाज की ताजा फिल्म के टाइटल हैं।

सोमवार, 21 सितंबर 2009

दिग्विजय उवाच-देवी का भंडार भरा रहे, लोग पी-पी कर पड़े रहें

यह आशीष वचन दस साल मप्र के मुख्यमंत्री रहे (उमा भारती के शब्दों में मिस्टर बंटाढार) और अब कांग्रेस के सबसे ज्यादा प्रभावशाली महासचिव दिग्विजय सिंह ने नवरात्र के दूसरे दिन रविवार को इंदौर के एक मॉल में पब का शुभारंभ करते हुए व्यक्त किए। खुद को महात्मा गांधी की धरोहर और विरासत की झंडाबरदार मानने वाली कांग्रेस के इस चतुर महासचिव ने कांग्रेस के विधायक और अन्य कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में यह भी कहा समय बदल रहा है, पहले मयखाने होते थे, फिर लोग ठेके पर जाकर पीने लगे, अब पब आ गए हैं। अपने चमचों के बीच राजा साब और दिग्गी राजा के नाम से मशहूर दिग्विजय सिंह ने पब के उदघाटन में फीता ही नहीं काटा बल्कि बीयर के जाम सर्व किए। हालांकि दिग्विजय सिंह को करीब से जानने वालों की मानें तो वे खुद पीने वालों की कतार में शामिल नहीं हैं। भाजपा के नेताओं ने दिग्विजय के इस बयान पर उन्हें जमकर कोसा है। लेकिन इंदौर शहर में ही बीते साल भाजपा के महासचिव प्रकाश जावडेकर बकायदा शैंपेन के जाम उड़ाते वीडियो में रिकार्ड किए गए थे। हालांकि दूसरों को कोसने में राजनीतिक दल पीछे नहीं रहते लेकिन अपने मामले में वे चुप्पी साधना बेहतर समझते हैं। राजनीतिक दलों और नेताओं की कथनी, करनी, विचार और अमल में जो फर्क है, उसे लेकर शायद ही किसी को कोई शक हो। दिग्विजय सिंह ने नवरात्र में पब का उदघाटन कर पीने का प्रचार किया तो, हिंदुत्ववादी विचारधारा से ओतप्रोत संगठन आरएसएस के आंगन में बतौर नेता विकसित हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नवरात्र के पहले दिन और रमजान के समापन से दो दिन पूर्व रोजा अफ्तार का आयोजन किया। सरकारी कार्यक्रमों में भूमिपूजन, शिलान्यास, दीप प्रज्ज्वलन, नारियल फोडऩे जैसे कार्र्यों का विरोध करने वाले किसी भी शख्स या संगठन ने सरकारी खर्चे पर रोजा अफ्तारी का विरोध नहीं किया। इस आयोजन में भी चंद लोगों को छोड़कर ज्यादातर वे लोग थे जिनका इबादत से कोई लेना देना नहीं होता। इसमें इस्लाम के अनुआईयों से ज्यादा भाजपा कार्यकर्ता, नेता, अफसर और पत्रकार थे। इस हुजूम में वे लोग भी थे जिनका अपराध की दुनिया में खासा नाम है। इधर नवरात्र पर्व में जगह जगह श्रद्धा भक्ति की गंगा बह रही है, तो कई जगह फिल्मी गानों और धुनों पर देर रात नाचने और हंगामे का भी दौर जारी है। उपवास का अर्थ होता है, ईश्वर की आराधना में शांत चित्त होकर बैठना। अर्थात हम सामान्य दिनों में जिस तरह का भोजन, चिंतन, कामकाज, मनोरंजन आदि करते हैं, उससे अलग केवल आराधना में वह भी शांत और दत्त चित्त होकर लीन हों। राजनीति, धर्म, मनोरंजन और मौजमस्ती के इस घालमेल भरे आयोजनों ने आराधना के पर्र्वों रमजान और नवरात्र की गरिमा को एक अर्थ में कम करने कोशिश की है। लेकिन इस सबसे परे ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो रमजान में और नवरात्र में वाकई ईश आराधना में वक्त लगाते हैं। यह पर्व ऐसे आस्थावान लोगों के कारण ही हजारों सालों से न केवल बरकरार हैं, बल्कि उनका प्रभाव पूरे वातावरण में व्याप्त भी है।

रविवार, 20 सितंबर 2009

सादगी वालों सुनो अरज हमारी......


मादाम सोनिया गांधी, चिरंजीव राहुल गांधी और सादगी के नए प्रणेता प्रणव मुकर्जी से लेकर कैटल क्लास मुहावरे के जनक शशि थरूर तक सब देवियों और सज्जनों से एक गुहार करने का मन हो रहा है। कांग्रेस की पीवी नरसिंहराव सरकार में एक रेल मंत्री थे सीके जाफर शरीफ। उन्हें आज भी लोग याद करते हैं, वह भी किसी भी यात्री गाड़ी के जनरल डिब्बे में। उन्हें लोग जिन विशेषणों से नवाजते हैं, उनका समर्थन नहीं किया जा सकता, क्योंकि शरीफ अब इस दुनिया में नहीं हैं। लोग भी क्या करें, उन्हें यह सब इसलिए कहना पड़ता है क्योंकि जनरल बोगी में सफर करना करीब करीब सजा भुगतने जैसा होता है। लोग शरीफ को कोसते हैं वो इसलिए कि उन्होंने तब तक जारी दिन में स्लीपर कोच में सफर कर सकने की सुविधा को खत्म कर दिया था। गाडिय़ों की संख्या तब से अब तक कई गुना बढ़ चुकी है लेकिन यात्रियों की तादाद से कहीं ज्यादा बढ़ी है। लेकिन जनरल केडिब्बों की संख्या नहीं बढ़ी। कम दूरी की यात्रा में रिजर्वेशन नहीं मिलने पर जो लोग ईमानदारी से जनरल बोगी में पहुंच जाते हैं, उनकी जो दशा इन बोगियों में होती है, वह शशि थरूर के मुहावरे का प्रत्यक्ष उदाहरण है। लंबी दूरियों की गाडिय़ों में लोग सामान रखने की जगह में शरीर को तोड़ मोड़कर सोए रहते हैं, सीटों के बीच में भी लोग सोते हैं। टायलेट मेें भी लोग खड़े और बैठे मिल जाएंगे। करीब करीब 16 साल से यही हालात हैं। हवाई जहाज के इकोनामी क्लास को कैटल क्लास कहनेवाले शशि थरूर को भले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मजाक के बहाने माफ कर दें और थरूर के बयान से वीवीआईपी महाशयों और देवियों को संतोष न हो लेकिन मेरी गुजारिश इन सादगी पसंदों से है, कृपया किसी एक्सप्रेस के खासकर मुंबई जाने वाली और मुंबई से उत्तर भारत की तरफ आने वाली गाडिय़ों के जनरल डिब्बे में एक दफा यात्रा जरूर करें, वह भी किसी पूर्व सूचना या प्रचार के। आपको सादगी का राग बंद करना पड़ेगा या फिर आप में जरा भी मानवीयता होगी तो भारतीय रेलवे में 16 सालों से जारी यह कैटल क्लास बंद कराने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगे।

सोमवार, 14 सितंबर 2009

आज हिंदी डे है

आज हिंदी डे है न

उन्हें सुबह से शाम तक,

धारा-प्रवाह हिंदी में बोलते-बतियाते,

देखकर अद्र्धांगिनी घबराईं,

चिंता की लकीरें माथें पर आईं,

एक युक्ति मस्तिक्क में आई,

फौरन पारिवारिक चिकित्सक को लगाया फोन,

साहब की भंगिमाओं और भाषण शैली का बताया एक-एक कोण,

डॉक्टर महोदय तनिक मुस्कराए, लक्षणों पर गौर फरमाया,

बोले- मैडम, घबराइए मत,

कल सुबह तक साहब हो जाएंगे ठीक,

बोलने लगेंगे फर्राटेदार अंग्रेजी या अपनी प्यारी भाषा हिंगिलिश,

एक ही दिन का है यह रोग, दरअसल आज हिंदी डे है न॥

-सतीश एलिया

रविवार, 13 सितंबर 2009

हिंदी का सर्वाधिक अहित हिंदी पत्रकारिता कर रही है

शायद ही दुनिया की कोई और भाषा का दिन मनाया जाता हो, हम अपनी राष्टï्रभाषा हिंदी का दिवस मनाते हैं। यह महज संयोग ही है कि हिंदी दिवस अमूमन श्राद्ध पक्ष में होता है। यानी हम एक तरह से हिंदी को राष्टï्र भाषा मानने का तर्पण ही करते हैं। हमारे अपने जब दुनिया में नहीं रहते तो हम उनका श्राद्ध पक्ष में तर्पण करते हैं। कल 14 सितंबर को यह मौका फिर सामने है। अपने ही देश में हिंदी को सरकारी मान्यता मिलने के उपलक्ष्य में दिवस मनाने का यह उपक्रम भी सरकारी संस्थानों में महज औपचारिकता के लिए होता है। लगभग सभी केंद्रीय संस्थानों में हिंदी विभाग और हिंदी अधिकारी और उनका अमला है। वे दिवस, पखवाड़ा और सप्ताह मनाकर राष्टï्रभाषा का प्रचार प्रसार करने के दावे करते हैं। देश के 36 करोड़ लोग जिस भाषा में जीते-मरते और पूरा जीवन गुजारते हैं उसके प्रचार प्रसार के लिए इतना तामझाम? यह क्या साबित करता है? अंग्रेजों के जाने के 62 साल बाद आज अंग्रेजी का जो दबदबा है वह अंग्रेजों के शासन में भी भारत में नहीं था। कुतर्क यह दिया जाता है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है, हमें दुनिया में प्रगति के पथ पर चलना है तो अंग्रेजी को अपनाना ही होगा। जापान, चीन, जर्मनी, फ्रांस, कोरिया जैसे देश क्या विकास नहीं कर रहे हैं, बिना अपनी भाषा को दोयम और अंग्रेजी को सर माथे पर बिठाए वे विकास कर रहे हैं न, तो फिर हमीं क्यों शर्म को शान समझते हैं? दुनिया में सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाली भाषा को सीखिए लेकिन क्या यह जरूरी है कि हम दुनिया की सभी महिलाओं का सम्मान करने के लिए अपनी मां को दोयम दर्जे की समझें। जिस भाषा में हम लोरियां सुनते हैं, बोलना सीखते हैं जो हमारे पूर्वजों की भाषा है, जो हमारे देश की पहचान होना चाहिए, उससे परहेज करने वाले कर्ता धर्ता बन बैठते हैं। मेरा मानना है कि राजनीतिज्ञों और अंग्रेजों के अघोषित प्रतिनिधि आईएएस अफसरों ने जितना अहित राष्टï्रभाषा का किया उससे कहीं ज्यादा हिंदी पत्रकारिता ने बीते करीब दो दशकों में कर डाला है। हिंदी अखबारों को हिंदी की अलग ठीक उसी तरह जगाना चाहिए थी जैसी आजादी की लड़ाई के वक्त जगाई थी। लेकिन हिंदी अखबारों ने कुछ अर्से तक इस जिम्मेदारी को निबाह कर अपनी इस भूमिका को भुलाना शुरू कर दिया। अंग्रेजी अखबारों की शैली और रंगरूप की नकल करने वाले हिंदी अखबारोंं ने बाजारबाद के दामन से लिपटकर हिंदी को धकेल कर हिंगलिश को गले लगा लिया। प्रकारांतर से वे अंग्रेजी अखबारों के पिछलगगू सरीखे बनते चले गए। हिंदी अखबारों में अंग्रेजी अखबारों से आयातित पत्रकार संपादक होने लगे और वे हिंदी में पहले से काम कर रहे लोगों से तकरीबन वही व्यवहार करने लगे जो अंग्रेजी बोलने वाले हिंदी बोलने वालों से करते हैं या अंग्रेजी भारतीयों से करते थे। अखबार भाषा शिक्षक का काम करते हैं लेकिन हिंदी अखबारों ने यह भूमिका छोड़ दी, वे अंग्रेजी सिखाने की कोचिंग क्लास बन गए हैं। इसमें वे स्यात गौरव भी महसूस करते हैं। हिंदी के कई अखबारों में प्लानिंग हिंदी जानने वाले नहीं धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वाले लोग करते हैं। मैं खुद 18 सालों से हिंदी पत्रकारिता में हूं और किसी व्यक्ति या संस्थान विशेष के लिए नहीं बल्कि समूचे हिंदी पत्रकारिता जगत के संबंध में कह रहा हूं। व्यक्ति के बजाय समष्टिï का विचार हमेशा देश और समाज और अंतत: व्यक्ति के लिए श्रेयस्कर ही होता है। और मेरा अनुभव यह है कि किसी जमाने में मुझे संपादकों की तारीफ मिलती थी, हिंदी का भाषा ज्ञान और लेखन ठीकठाक होने की वजह से। इस तरह के प्रसंगों को एक दशक से ज्यादा बीत चुका है। अब यह दिवास्वप्र ही लगता है कि किसी हिंदी पत्रकार को उसकी भाषा के कारण तवज्जो मिले। हिंदी अखबारों में अंग्रेजी लेखकों के लिखे हुए का अनुवाद छपता है। हिंदी के नए लेखकों के लिए हिंदी के विख्यात और प्रमुख अखबारों में हाशिए पर भी जगह नहीं है। एक हिंदी अखबार में नियमित कालम लिखकर प्रतिदिन ज्ञान बांटने वाले एक अहिंदी भाषी पत्रकार ने एक बार मेरे और अन्य हिंदी भाषी पत्रकारों के सामने यह कहा था कि हिंदी वाले मोटी चमड़ी के होते हैं, उन्हें हेडलाइन में चमत्कार पैदा करना नहीं आता। तब मेरे एक मित्र ने तमतमाकर उन्हें न केवल डपट दिया था, बल्कि हम लोगों ने संपादक महोदय के पास जाकर अपनी नाराजगी जताई थी। लेकिन इस घटना के बाद हिंदी अखबारों में इस तरह की घटनाएं रोजमर्रा की बात हो चुकी हैं। अंग्रेजी में धाराप्रवाह न होना और अंग्रेजी में पर्याप्त होने के बावजूद उसका प्रदर्शन न करना नाकाबिलियत होने का पैमाना सा बन गया है। सोमवार 14 सितंबर को सरकार के मुताबिक हिंदी दिवस है, इसी बहाने वाकई देश, अपनी भाषा और उनके विकास पर सोचने और मनन करने वाले मेरी बात पर गौर करेंगे तो महती कृपा होगी। - सतीश एलिया, भोपाल 13 सितंबर 2009

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

भूल गलती..... को याद करते हुए

भूल-गलती आज बैठी है जिरहबख्तर पहन कर तख्त पर दिल के,..........। मित्रों आज क्रांतिधर्मा कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की पुण्य तिथि है। भूल गलती कविता के अलावा उनकी दर्जनों कविताएं ऐसी हैं जिन्हें मैं सस्वर पाठ कर एकांत में भी अपने भीतर जलता हुआ लावा महसूस करता हूं। पुण्य तिथि पर उन्हें याद करते हुए मैं उनकी दो कविताओं के अंश और एक कथन उनकी- एक साहित्यिक की डायरी- से यहां दे रहा हूं। मुक्तिबोध को पढने वाले और उनको अपना अग्रज मानने वालों और तमाम संघर्षशील लोगों की तरफ से इस क्रांति कवि को श्रद्धांजलि।
और -एक साहित्यिक की डायरी से....

अगर मैं उन्नति के उस जीने पर चढने के लिए ठेलमठेल करने लगूं तो शायद मैं भी सफल हो सकता हूं। लेकिन ऐसी सफलता किस काम की जिसे प्राप्त करने के लिए आदमी को आत्म-गौरव खोना पडे, चतुरता के नाम पर बदमाशी करना पडे। शालीनता के नाम पर बिल्कुल एकदम सफेद झूठी खुशामदी बातें करनी पडें। जिन व्यक्तियों को आप क्षण-भर टालरेट नहीं कर सकते, उनके दरबार का सदस्य बनना पडे। हां, जो लोग यह सब कर लेते हैं, वे अपनी यशः पताकाएं फहराते हुए घर लौटते हैं और कितने आत्मविश्वास से बात करते हैं। मानो उन्हीं का राज्य है। बहुरूपिया शायद पुराना हो गया है, लेकिन उसकी कला दन दिनों अत्यंत परिष्क्रत होकर भभक उठी है।
अब तक क्या किया...


अब तक क्या किया,


जीवन क्या जीयाकिस-किसके लिए तुम दौड गए,


करूणा के द्रश्यों से हाय मुंह मोड गए


बन गए पत्थर।


अरे! मर गया देश जीवित रह गए तुम!!


अब क्या कियाजीवन क्या जीया।



भूल गलती


आज बैठी है जिरहबख्तर पहन करतख्त पर दिल के,


चमकते हैं खडे हथियार उसके दूर तक,


आंखे चिलकती हं नुकीले तेज पत्थर-सी,


खडी हैं सिर झुकाए


सब कतारें


बेजुबां बेबस सलाम में,


अनगिनत खंभों व मेहराबों-थमे


दरबारे-आम में।


सामनेबेचैन घावों की अजब तिरछी लकीरों से कटाचेहराकि


जिस पर कांपदिल की भाफ उठती है


पहने हथकडी वह एक उंचा कद,


समूचे जिस्म पर लत्तर,


झलकते लाल लंबे दागबहते खून के।


वह कैद कर लाया गया ईमानसुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,


बेखौफ नीली बिजलियों को फेंकताखामोश!!


सब खामोशमनसबदार,शायर और सूफी,अलगजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी,आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार


हैं खमोश!!
नामंजूर,


उसको जिंदगी की शर्म की-सी शर्तनामंजूर,


हठ इनकार का सिर तान खुद-मुख्तार।


कोई सोचता उस वक्तछाए जा रहे हैं सलतनत पर घने साए स्याह,


सुल्तानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिटटी का,


वो-रेत का-सा ढेर शंहशाह,


शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा!!;


लेकिन, ना,जमाना सांप का kata


;आलमगीरद्धमेरी आपकी कमजोरियों के सयाहलोहे का जिरहबख्तर पहन,


खूंख्वारहां, खूंख्वार आलीजाह,


वो आंखें सचाई की निकाले डालता,


सब बस्तियां दिल की उजाडे डालता,


करता, हमें वह घेर,


बेबुनियाद, बेसिर-पैरहम सब


कैद हैं उसके चमकते ताम-झाम में


शहरी मुकाम में!!
इतने में,


हमीं में सेअजीब कराह-सा कोई निकल भागा,


भरे दरबारे-आम में मैं भीसंभल जागा!!


कतारों में खडे खुदगर्ज बा-हथियारबख्तरबंद समझौत्ेसहमकर,


रह गए,


दिल में अलग जबडा, अलग दाडी लिए,


दुमुंहेपने के सौ तजुर्बों की बुजुर्गी से भरे,


दढियल सिपहसालार संजीदा सहमकर रह गए!!


लेकिन, उधर उस ओर,कोई, बुर्ज के उस तरफ जा पहुंचा,


अंधेरी घाटियों के गोल टीलों,


घने पेडों मेंकहीं पर खो गया,


महसूस होता है कि वह बेनामबेमालूम दर्रों के इलाके में;


सचाई के सुनहले तेज अक्सों के धुंधलके मेंद्ध मुहैया कर रहा लश्कर,


हमारी हार का बदला चुकाने आएगासंकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,


हमारे ही ह्रदय का गुप्त स्वर्णाक्षरप्रकट होकर विकट हो जाएगा!!


- गजानन माधव मुक्तिबोध


जन्म श्योपुर मप्र 13 नवंबर 1917, निधन दिल्ली11 सितंबर 1964

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

हडताली कालेज शिक्षकों, सरकार और मीडिया से चंद सवाल.....

बुधवार को भोपाल में मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने जा रहे कालेज शिक्षकों के एसोसिएशन के सदस्यों पर कथित पुलिस लाठी चार्ज के समाचारों से अखबार रंगे हैं और टीवी चैनल वालों ने भी इस कथित भयंकर अत्याचार का जमकर कवरेज किया। जो नहीं दिखाया गया और जो नहीं छप रहा है, उसमें कई सवाल हैं जो इन शिक्षकों से पूछे जाना चाहिए और मीडिया से भी की किसी मामले की तह तक क्यों नहीं जाते, सरकार को कटघरे में खडा कर देने भर से काम की इतिश्री हो जाती है क्या? कई दिनों से यूजीसी वेतनमान के लिए आंदोलन कर काम बंद कर बैठे कालेज शिक्षकों के आंदोलन स्थल पर कारों की तादाद देखकर ऐसा लगता है कि भरे पेट वालों का यह आंदोलन आखिर किनके हिस्से का पैसा अपने वेतन में लेने के लिए है? दो दिन पहले भोपाल के नूतन काॅलेज के बाहर तंबू लगाए बैठे ये शिक्षक अभी तो ये अंगडाई है, आगे और लडाई है जैसे नारे लगा रहे थे तो एकबारगी हंसी आई। जिस देश में 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर हैं वहां के ये शिक्षक तनख्वाह 30 हजार से 60 और 70 हजार रूपए मासिक करवाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। इन शिक्षकों और मीडिया को अगर वक्त हो और उन तक ये सवाल पहुंचे तो क्रपया जरूर दें, सरकार तो खैर देर सबेर वोट का गणित देखकर इनके आंदोलन पर निर्णय करेगी ही, भले ही उच्च शिक्षा और स्टूडेंटस का जो भी हो, चाहे निजी कालेजों में कोई नियम लागू हो रहा हो या नहीं। पेश हैं सवाल
1 वर्तमान में मप्र में उच्च शिक्षा की स्थिति क्या है? आशय नतीजों से और प्रदेश के डिग्रीधारी युवाओं को क्या कॅरियर मिल पा रहा है?
2 प्रदेश में कितने सरकारी और कितने गैर सरकारी कालेज हैं?
3 सरकारी कालेजों में वर्तमान में शिक्षकों के कितने पद खाली और कितने भरे हैं?
5जो पद भरे हैं उनमें से कितने शिक्षक पीएससी के जरिए भर्ती हुए और जो पिछले दरवाजे से भर्ती हुए वे क्या उस वक्त यूजीसी के मापदंडों को पूरा कर रहे थे?
5मापदंड पूरा नहीं कर रहे थे उन्हें कोई भी वेतनमान क्यों दिया जा रहा है? क्या इनसे बाद में पीएससी के जरिए चयन की अनिवार्यता का पालन नहीं कराया जाना चाहिए था?
6 सरकार खाली पद भरने पीएससी की परीक्षा क्यों नहीं करा पा रही है? प्राध्यापक पदों को भरने शुरू की गई प्रक्रिया किसके दवाब में रोक दी गई और क्यों?
7 क्या हडताली शिक्षक और शिक्षा मंत्री को पता है प्रदेश में अब सरकारी कालेजों से ज्यादा संख्या निजी कालेजों की है, जिनमें सरकारी कालेजों के मोटी तनख्वाह पाने वाले शिक्षकों से ज्यादा योग्य शिक्षक उनकी तुलना में एक चैथाई तनख्वाह पर काम कर रहे हैं?
8 सरकारी शिक्षकों को अपने ही इन साथियों को छठवां वेतनमान या यूजीसी वेतनमान न मिलने की कोई फिक्र है? क्या सरकार निजी कालेजों में कागज के बजाय हकीकत में वेतनमान लागू करा पाएगी? 9 सालों से शहरों में ही वह भी एक ही शहर और एक ही कालेज में जमे शिक्षकों के तबादले कर कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों के कालेजों में रिक्त पद भरने के लिए सरकार कोई कदम उठाएगी?
10क्या हडताली शिक्षक रिजल्ट सुधारने और मप्र के स्नातक और स्नातकोत्तरों को अन्य प्रदेशों में इज्जत की नजर से देखने लायक बनाने के लिए भी अपनी तनख्वाह बढवाने की ही तरह गंभीर होंगे?

रविवार, 6 सितंबर 2009

न सरकार कम है और न ही ये शिक्षक .......

भोपाल में शिक्षक दिवस के मौके पर प्रदर्शन कर रहे अध्यापकों पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया। यह घटना सतह पर ऐसी लगती है मानो सरकार शिक्षक दिवस जैसे पावन माने जाने पर्व पर शिक्षकों को पिटवा रही थी। दरअसल शिक्षा, शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था के मामले में सरकारों की स्पष्टï नीति न होने और शिक्षक कर्म से जुड़े लोगों की इस पवित्र काम के प्रति निष्ठïा नहीं होने से यह विचित्र स्थिति करीब करीब हर साल बनती है। सरकार खासकर भाजपा की सरकार गुरू पाद पूजन और राजर्षि घोषित करने जैसे लॉलीपॉप देकर अध्यापकों को शााब्दिक महिमामंडन से नवाज कर चुनावों में उनका फायदा उठाने की कोशिश करती है। दूसरी तरफ जिन शर्तों और नियमों को मंजूर कर शिक्षा कर्मी की नौकरी हासिल की थी, उन्हें नकार कर भरपूर वेतन और फायदे लेने के लिए अध्यापक शिक्षक दिवस को सुनहरे मौके के तौर पर देखते हैं। दिग्विजय सरकार के कार्यकाल में ही स्कूल शिक्षा विभाग के सहायक शिक्षक संवर्ग को डाइंग कैडर घोषित कर दिया गया था। इसके बाद शिक्षा कर्मी भर्ती किए गए जिन्हें गांवों मेंं पंचायत और शहरों में नगरीय निकाय के जिम्मे भर्ती किया गया। भारी भाई भतीजावाद और अयोग्यों को भर्ती करने के अभियान में प्रदेश भर में शिक्षकों की जगह शिक्षा कर्मी भर्ती कर लिए गए। सरकार को स्कूल चलाने के लिए सस्ते दामों पर यह शिक्षा कर्मी मिल गए। लेकिन इनमें से ज्यादातर स्कूलों का रुख नहंीं करते। कम योग्य लेकिन प्रभावशाली लोगों के रिश्तेदार होने की वजह से शिक्षा कर्मी बन गए लोगों को भाजपा की सरकार ने एक बड़े वोट बैंक के रूप में देखा और उन्हेंं सरकार बनने पर शिक्षा कर्मी से शिक्षक बनाने का वादा किया। इस पर अमल जिस तरह किया गया उससे यह शिक्षा कर्मी बनाम अध्यापक नाराज हैं। वे लगातार यह आंदोलन करते हैं कि स्कूल शिक्षा विभाग के सहायक शिक्षकों को जितना वेतन और सुविधाएं मिलती हैं, हमें भी दी जाएं। सरकार की न तो माली हालत इतनी मोटी तनख्वाहें देने की है और न ही मंशा। दूसरी तरफ शिक्षा कर्मी से अध्यापक बने शिक्षक भी अध्यापन में कम ही रूचि लेते हैं। प्रदेश के स्कूलों में उनकी उपस्थिति और बच्चों की शिक्षा का स्तर इसका प्रमाण है। प्रदेश में प्राथमिक, मिडिल से लेकर हाईस्कूल और हायरसेंकेडरी तक के परीक्षा परिणाम इसकी पुष्टिï करते हैं। सरकार गुरू पाद पूजन और राजर्षि कहे जाने जेसी बेवकूफियों के बजाय शिक्षकों की भर्ती में स्तर बढ़ाने, उसी के मुताबिक वेतन भत्ते देने और फिर उनसे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के जमकर काम लेने की नीति पर अमल करे तो मप्र की शिक्षा की स्थिति में सुधार हो सकता है। स्कूल शिक्षा के इस बदहाल दौर में उच्च शिक्षा यानी सरकारी कॉलेजों की हालत भी अत्यंत दयनीय है। सरकार की रूचि सहायक प्राध्यापकों और प्राध्यापकों के खाली पद पीएसएसी के माध्यम से भरने में रूचि नहीं है। बीते करीब दो दशक से हजारों की संख्या में पद खाली पड़े हैं। स्कूलो में सस्ते दामों वाले शिक्षा कर्मियों की ही तरह कॉलेजों में अतिथि विद्वान नाम से सस्ते श्रमिकों से ठेके पर काम लेने की प्रथा को करीब करीब स्थाई सा बना दिया गया है। अब यह अतिथि विद्वान भी कई सालों से काम करने के आधार पर नियमित किए जाने की मांग कर रहे हैँ। वे भी पीएसएसी से भर्ती की मांग नहीं कर रहे हैं क्योंकि तब केवल काबिल लोग ही भर्ती हो पाएंगे। दूसरी तरफ पहले ही तदर्थ इत्यादि कई पिछले दरवारों से सहायक प्राध्यापक और प्राध्यापक बन गए शिक्षक अब राज्य सरकार से केंद्रीय वेतनमान के मुताबिक यूजीसी का छठवां वेतनमान मांग रहे हैं। कालेजों में शिक्षकों की उपस्थिति, उनकी योग्यता और शिक्षा का स्तर देखते हुए अभी मिल रहा उनका वेतन भी इतना अधिक है कि आश्चय्र होता है कि आखिर इतना वेतन क्यों दिया जाता है। यूजीसी का स्केल मिलने पर प्राध्यापकों की तनख्वाह 70 से 80 हजार रुपए तक हो जाएगी। यानी मुख्य सचिव के बराबर वेतन प्राध्यापक का। वह भी कितना अध्यापन और शोध कार्य करते हैं? एक वरिष्ठï प्राध्यापक ने शिक्षक दिवस के मोके पर मुझसे कहा कि हम लोग आज हडताल पर हैं यूजीसी वेतनमान सरकार को देर सबेर देना ही पड़ेगा लेकिन हम लोग ऐसा क्या काम करते हैं कि हमें 70-80 हजार रुपए वेतन मिले। देश में एक तरफ 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों, प्राध्यापकों, इंजीनियरों का वेतन कई कई गुना बढ़ता जा रहा है, ऐसे में जो शिक्षित वर्ग गरीबों के करीब था वह भी उनसे दूर जा रहा है। अमीरों की एक नई श्रेणी छठवें वेतनमान ने बना दी है, जो कम काम कम श्रम के बावजूद खुशहाल हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद संतुष्ठï नही है, दूसरी तरफ लोग दो वक्त की रोटी के लिए जददोजहद में लगे हैं, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। 

बुधवार, 19 अगस्त 2009

जो कर रहे थे, यही चाहते थे जसवंत......

अटल सरकार में विदेश और वित्त मंत्री रहे जसवंत, कंधार कांड के खास पात्र रहे जसवंत हाल ही में दूसरे राज्य से जीते जसवंत, राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत के बाद दूसरे क्रम के नेता रहे जसवंत, जिन्ना की तरफदारी के चलते भाजपा के घर से बाहर धकेल दिए गए। लेकिन क्या वे केवल जिन्ना प्रेम की बलि चढ़ गए, अगर ऐसा है तो फिर आडवाणी क्यों पीएम इन वेटिंग बना दिए गए। जसवंत ने तो किताब लिखी, आडवाणी तो जिन्ना की मजार की जियारत कर आए थे और उन्हें सेक्युलरिज्म का मसीहा बता आए थे। दरअसल जिन्ना पर किताब चिंतन बैठक के ऐन पहले आने की वजह से सतह पर कारण की तरह तैर रही है। किसी भी मुददे को चलताऊ ढंग से मचा देने में माहिर मीडिया भी ऐसा ही प्रचारित कर रहा है। लेकिन असल में जसवंत का निष्कासन जिन्ना पर किताब की वजह से नहीं है बल्कि इसके पहले पार्टी की हार पर बुनियादी सवाल उठाने की हिमाकत की वजह से है। हालांकि यशवंत सिन्हा भी ऐसा ही रुख दिखा चुके हैं। पार्टी विद डिफरेंस का भ्रम पालने भाजपा में भी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कहने को हिमाकत ही माना जाता है। हालांकि भाजपा इसी रवैये को लेकर कांग्रेस की आलोचना करती रही है, करती है और करती भी रहेगी। अन्य दलों में भी कमोबेश यही आलम है, भले धुर दक्षिण पंथी शिवसेना हो धुर वामपंथी भाकपा, माकपा हों या व्यक्तिपंथी डीएमके, एआईडीएमके, तेलगुदेशम हो या फिर बाल्यकाल वाले टीआरएस या प्रजाराज्यम जैसे दल। विरोध के सुर को दबा दिया जाता है। भले कोई नया नेता हो या फिर जसवंत सिंह जैसा वरिष्इ और पुराना नेता हो। लेकिन इतना तय है कि वसुंधरा राजे मामले से ठीक से नहीं निपट पा रहे भाजपा नेतृत्व ने जसवंत को निष्कासित कर फिलहाल दादागिरी भले दिखा दी हो, उसे इसका भी खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा। हाल ही में लोकसभा चुनाव में मुहं की खा चुकी भाजपा ने मप्र में उमा भारती के साथ भी यही किया और गुजरात में नरेंद्र भाई की दादागिरी का समर्थन कर केशुभाई के साथ भी यही किया। नतीजे में भाजपा को राजस्थान में तो पटखनी खाना ही पड़ी, मप्र में भी उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है। भाजपा के लगभी सभी निष्कासन प्रकरणों को देखकर लगता है, भाजपा में एक किस्म का असंतोष नेताओं के लेबल पर पिछले एक दशक में धीरे धीरे पनपता, उभरता और दिखता रहा है। उसका इलाज जिस ढंग से किया गया, वह असल में इलाज नहीं बल्कि मर्ज को बिगाडऩे की ही तरह नतीजे वाला रहा। लोकसभा चुनाव के हार का ठीकरा फोडऩे के लिए भाजपा को सर नहीं मिलने के संकट के चलते अब एक दूसरे के सरों का इस्तेमाल करने की हिकमत अमली आजमाई जा रही है। देखना ये है कि शीर्ष पर चल रहे इस प्रहसन को कार्यकर्ता और समर्थक अर्थात वोटर किस तरह से लेते हैं, क्योंकि लोकसभा, विधानसभा चुनाव के अलावा स्थानीय स्तर के चुनावों मेंं भी बिखराब का रंग दिखता है। गुजरात में जूनागढ़ में मोदी की भद पिटने, लोकसभा चुनाव में मप्र में शिवराज का असर बिखरने और राजस्थान में विपक्ष में बैठने के बाद गृह कलह चरम पर आने का असर इन राज्यों में फिर स्थानीय चुनावों में देखने को मिल सकता है। संघ पुत्री भाजपा को अपने बुजुर्ग नेताओं को निष्कासित करने के बजाय उनके लिए नई भुमिकाएं तलाश कर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम करना चाििहए, संघ प्रमुख मोहन भागवत भी यही कह रहे हें। भाजपा को चिंतन इस पर भी करना चाहिए कि वह डेढ़ दशक पहले जनता की जितनी तेजी से चहेती बन रही थी, उन मुददों को छोडने से उसे कितना नुकसान हुआ और वह नई जनरेशन में वही भाव किन मुद्दों की ताकत पर जगाया जाए।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

अमेरिका में कोई आपको जानता है, पूछना खराब लगा शाहरूख को

फिल्म एक्टर शाहरूख खान को अमेरिकी हवाई अडडे पर डेढ घंटे तक रोके रखा जाना बिल्कुल बुरा नहीं लगा, उन्हें बुरा लगा तो सिर्फ ये कि उनसे यह पूछा गया कि क्या अमेरिका में कोई है जो उनकी शिनाख्त कर सके। शाहरूख ने अमेरिका से लौटने के बाद डेढ घंटे चली प्रेस कान्फरेंस में तीन दिन से से इसी खबर को मचाए हुए और बार बार एक ही तरह के सवाल कर रहे पत्रकारों को बार बार बताया कि अमेरिका ने मुझे बुलाया नहीं था, मुझे काम था इसलिए गया, जब भी काम होगा फिर जाउंगा, कोशिश होगी कम जाउं, यह भी कहा कि पूरे दुनिया में जाति धर्म और रंग के आधार पर भेदभाव होता है यहां तक कि हमारे देश में भी होता है, यह कोई मुददा नहीं है क्योंकि हमने दुनिया ऐसी ही बना ली है तो ऐसी ही दुनिया में रहना होगा। यह भी कहा कि कलाम साहब के साथ जो भी हुआ वह बडा मामला है, न मैं बडा हूं और न ही मेरे साथ जो वह बडा है। उन्होंने बार बार दावा किया कि वे घटिया कमेंट नहीं करते, न करना चाहते हैं और पूरे वाकये को भुलाकर भविष्य की ओर देखते हैं। लेकिन मीडिया के घुमा फिराकर दोहराए गए सवालों से विचलित न होने का अभिनय करने के बावजूद वे विचलित भी हुए और ऐसी टिप्पणियां भी कीं जिसके लिए वे कुख्यात हो चुके हैं। मसलन उन्होंने मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह की टिप्पणियों के बारे में जवाब देते वक्त घटिया, शोहदे और टुच्चे जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह भी कहा कि वे सिली ब्लाॅग्स की भी परवाह नहीं करते। वे खुद को बेहद सामान्य आदमी बता जरूर रहे थे, लेकिन उन्हें अमेरिका में चुभी यही बात की उनसे यह पूछा गया कि कोई अमेरिका में उनकी शिनाख्त कर सकता है क्या? असल में शाहरूख को अमेरिका में अपमान झेलना पडा और उसकी उन्होंने ना ना करते हुए अभिव्यक्ति भी की। लेकिन वे फिर अमेरिका जाएंगे, यह उनकी और उन जैसे कलाकार, नेता, व्यवसायी, एनआरआई बनने के ख्वाहिशमंदों की मजबूरी है। वे भरपूर धन कमाना चाहते हैं, धन के आगे अपमान भला क्या चीज है? शाहरूख खान की जो फिल्में धनवर्षा करने वाली साबित हुई हैं, वे अमेरिका में चलने के कारण ही कमाउ साबित हुई हैं। असल में करण जौहर टाइप सिनेमा भारत में चलेगा यह ध्यान में रखकर नहीं बल्कि ओवरसीज अर्थात अमेरिका में कितना चलेगा, यह सोचकर बनाया जाता है। भारत को भुलाकर अमेरिका की राह पकडने में अपमानित होना पड रहा है, जैसे आस्ट्रेलिया और अन्य मुल्कों में भारतीय मूल के लोगों की पिटाई हो रही, यह उसका बदला हुआ रूप ही है। अपने देश को जुबान से महान कहते जरूर हैं लेकिन मानते महान उन मुल्कों को हैं जिनकी मुद्रा भारतीय मुद्रा से कई गुना कीमती है। कहावत है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, असल में जिसकी मुद्रा ताकतवर भैंस उसी की है। अमेरिका हो, आस्ट्रेलिया हो, इंग्लैंड हो, या कोई और ताकतवर और संपन्न मुल्क, वहां आपके साथ ऐसा ही व्यवहार होगा। भले आप आम भारतीय हों या फिर फिल्म एक्टर। आप वहां दोयम दर्जे के आदमी हैं, वहां रहने लगे हैं तो दोयम दर्जे के नागरिक हैं। वहां जाने, बसने या वहां से लौटने पर यहां के लोगों पर भले रौब गांठिए लेकिन सच्चाई ये है कि आप दोयम दर्जे का व्यवहार पाते हैं। मीडिया शाहरूख के मामले जो चिल्ल पों मचाई, उनके लिए वह उस दिन की नौकरी थी। कोई और मसला आ जाता तो शाहरूख की खबर दब jati .

शनिवार, 15 अगस्त 2009

62 सालों में हमने सर्वाधिक प्रगति भ्रष्टाचार में की...

अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति की 62 वीं सालगिरह पर उन सबको मुबारकवाद जो देश से प्यार करते हैं और किसी भी किस्म का कोई भ्रष्टाचार नहीं करते, जिनकी आबादी देश की आबादी का 95 फीसद है, और जो किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार से पीडित हैं। बिना पैसा दिए अपनी ही जमीन की नपती नहीं होती, नामांतरण नहीं होते, पात्रों को भी योजनाओं का फायदा बिना कमीशन दिए नहीं होते, बिना कमीशन सडक नहीं बनती, कोई निर्माण कार्य नहीं होते। पोस्टिंग में रिश्वत, तबादले में रिश्वत, खबर छपने, रूकने, दिखाने, नहीं दिखाने में लेनदेन, खेलों में घोटाले, टिकिट वितरण में खेल, मंत्री बनने नहीं बनने देने में खेल, दवाओं मंे मिलावट, दूध में मिलावट, किसी कोई चीज नहीं जिसमें मिलावट जमकर न होती हो। कालाबाजारी, बेईमानी, मक्कारी सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में इस कदर समाई है कि ईमानदारी को एक तरह से बेवकूफी की श्रेणी में रखने की हिमाकत अब सामान्य बात है। मैं यह सब इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आप भी देख रहे हैं और मैं भी यह सब देख रहा हूं। मैंने उस सेवा के लोगों को अपने मातहतों के जरिए खुलेआम पैसे लेते देखा है जिनके बारे में कुछ लिखना भी मानहानि के दायरे में आ जाता है। पूरे देश ने देश की सबसे बडी पंचायत में प्रश्न पूछने नहीं पूछने वोट देने नहीं देने में रिश्वत का खुला खेल सीधे प्रसारण के जरिए उजागर होते देखा है। ऐसा नहीं है कि बस यही पक्ष है और देश ने प्रगति नहीं की है। देश ने निःसंदेह 62 सालों मंें बेहतर प्रगति भी की है, आवागमन, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर अन्य सभी जरूरतों में सहूलियतें काफी बढी हैं लेकिन भ्रष्टाचार कैंसर की तरह हर क्षेत्र में समा गया है। हमारा लोकतंत्र परिपक्व हुआ है अब लोग नारों के आधार पर प्रचार से प्रभावित होकर मतदान नहीं करते, वे वादे पूरे नहीं करने वाली सरकारों को बदल डालते हैं। लेकिन अब धर्म और जाति के नाम पर टिकिट तय होना और वोट डाले जाना ज्यादा हो गया है। न जनता भ्रष्टाचार को मुददा मानती है और न ही सरकार की प्राथमिकता उसे खत्म करने की है। बातें जरूर सब पारदर्शिता की करते हैं। डा. मनमोहन सिंह ने आज लाल किले की प्राचीर से यही कहा और भोपाल के लाल परेड मैदान पर मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान भी यही बोले । लेकिन सही मायने में हमारे लोकतंत्र को भ्रष्टाचार से लडने की जरूरत है। सरकारों के स्तर पर भी और जनता के स्तर पर भी इससे लडना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए। अन्यथा शातिर, चालाक, बेईमान और भ्रष्ट लोगों का राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता से लेकर हर सार्वजनिक पेशे में दबदबा कायम होने का सिलसिला थमेगा नहीं और हमारे देश को विश्व शक्ति बनाने का हमारा सपना पूरा हो गा नहीं। आप सबको आजादी की सालगिरह की मुबारकबाद, जय हिंद।

रविवार, 9 अगस्त 2009

मुझको यारो माफ करना मैंने दाल खाई ......

मित्रों आज बरोज रविवार मैंने दोपहर तीन बजे अरहर की दाल खाई। पूरे मुल्क से डा. मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल बाला से लेकर मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वित्त मंत्री राघवजी से लेकर उन तमाम लोगों से क्षमायाचाना करते हुए यह कन्फेस करता हूं कि 90 रुपए किलो होने के बावजूद मैंने दाल खाई है। औकात नहीं होने के बावजूद दाल खाना मेरे तई जुर्म की श्रेणी में आता है। यकीन मानिए दाल खाने के बाद पेट इस कदर भर गया है कि लगता है कई दिन खाना न भी मिले तो चल सकता है। दरअसल मुझे अपने एक निकट रिश्तेदार ने दोपहर करीब एक बजे अचानक फोन किया कि दाल बाफले बन रहे हैं, आप सादर आमंत्रित हैं। तो जनाब मुझे दाल मयस्सर हो गई। मैंने मेजबान के घर पहुंचते ही कहा - धन्य हैं आप जो मुझे दाल खाने के लिए आमंत्रित किया। मेरे तईं आप रईसों की श्रेणी में आ गए हैं। वो जमाने लद चुके हैं जब कहा जाता था दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ। अब तो दाल लग्जरी आयटम है। जैसे एनडीए के जमाने में एक दफा प्याज लग्जरी हो गई थी। वैसे मनमोहनजी के दूसरे कार्यकाल में दाल हो गई है। इन दिनों रिश्ते के लिए आने वालों को खास तौर पर दाल और उससे बने व्यंजन परोसना रईसी की बात हो गई है। इसमें भी जितनी गाढी दाल उतने ज्यादा रईस। हमारे एक ईमानदार पत्रकार मित्र ने बताया कि उनके यहां दाल बनी है तो मैंने उन्हें शक की निगाह से देखा, वे बोले यह तो पुराने रेट की बची हुई दाल थी। उसमें भी पत्नी ने कहा कि एक भी दाना छोड़ा तो तुम जानना, आगे से दाल बनेगी ही नहीं। घरों में चर्चा का विषय है तो दाल। अब तो मुहावरे भी कुछ इस तरह बनने चाहिए , मैं दाल हराम नहीं हूं, सरदार मैंने आपकी दाल खाई है। फिल्मों के नाम भी कुछ इस तरह हो सकते हैं- दाल का कर्ज, दाल हलाल, दाल हराम, दाल की जंग, दाल वाला और दालवाली। मप्र की सरकार दाल पर लायसेंस प्रणाली लागू करने पर प्रारंभिक तौर पर विचार कर रही है। इसका व्व्यापारी वर्ग ने विरोध जताया है। वैसे शक्कर पर कंट्रोल लागू करने से उसके दाम भी नहीं गिरे तो दाल के भला कैसे गिर सकते हैं। तो मित्रों मुझे माफ करना, मैंने दाल खाई है।