रविवार, 8 नवंबर 2009

बाबा रामदेव तुमने ये क्या किया

जमीयत के इजलास में बाबा रामदेव की शिरकत से कई सवाल उठे हैं, वे स्वाभाविक भी हैं। लाख टके का सवाल ये है कि उन्होंने वंदेमातरम् की खिलाफत करने वालों के सगागम में शिरकत क्यों की? असल में जिस वजह से चिंदबरम वहां गए थे, उसी वजह से रामदेव भी वहां गए थे। अर्थात सियासत। कांग्रेस तो उप्र में अपनी खोई ताकत पाने मुस्लिम संगठनों को साधने का योग कर रही है जबकि बाबा अपने अंदर जाग गई राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए कुछ भी करने पर आमादा दिख रहे हैं, बतर्ज लव के लिए कुछ भी करेगा, बाबा सियासत के लिए कुछ भी करेगा की मुद्रा में हैं। याद कीजिए कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि वे 50 सांसद लोकसभा में भेजेंगे, ताकि बदलाव लाया जा सके। बिना राजनीतिक दल और बिना राजनीतिक जनाधार के एक पार्षद चुनवा पाना या खुद पार्षद का चुनाव जीतना भी एवरेस्ट पर चढऩे जैसा होता है। प्रवचन के लिए भीड़ जुटना, एक्टर की फिल्म देखने के लिए टिकिट खिड़की पर झगड़े होना सियासी सफलता के लिए वोट में बदलना असल में मुंगेरीलालनुमा सपना ही होता है। तो बाबा बेचारे क्या करें, पतंजलि, योग वशिष्ठ और अन्य महान ऋषि मुनियों के आविष्कृत योग के जरिए बाबा को टीवी चैनलों की लहर पर पापुलरिटी तो खूब मिल चुकी है। उनके अंदर अब राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग गई है, सो वंदेमातरम विरोधियों के साथ मंच साझा करने में कोई झिझक कोई शर्म उन्हें नहीं आई। असल में बाबा की जो भी प्रसिद्धि, धन दौलत है, उसमें उनका खुद का देखा जाए तो कुछ भी नहीं है। वे केवल योग की मार्केटिंग कर रहे हैं, उन्हें आस्था, संस्कार, इंडिया टीवी और अन्य चैनलों को धन्यवाद देना चाहिए कि उन सबने बाबा बो पापुलर बनाने में मदद की। बाबा के पापुलर होने में भारतीय मानस में धर्म, अध्यात्म, योग के प्रति अगाधा श्रद्धा ही है। लेकिन बाबा ये कतई न भूलें कि भारतीय मानस में देश प्रेम भी उतना ही उत्कट है। भले ही तत्कालीन सत्ताधीशों के स्वार्थों के चलते भारत अनेक बार गुलाम हुआ हो लेकिन देश के लोग देश से तब भी प्रेम करते थे, अब भी करते हैं। वंदेमातरम की खिलाफत भारतीय मानस में कभी सर्व स्वीकार्य नहीं हो सकती। खासकर किसी भगवाधारी योग वेदांत की बातें करने वाले की वंदेमातरम की खिलाफत में भागीदारी तो कतई बर्दाश्त नहीं हो सकती। बाबा की कुल जमा दिक्कत ये है कि वे बातें देश प्रेम की, भारत की श्रेष्ठता साबित करने की, योग की, धर्म की, विज्ञान को कमतर आंकने की करते हैं लेकिन असल में बनना राजनेता चाहते हैं। जैसे भाजपा राममंदिर समेत तमाम भावानात्मक मुद्दों को सत्ता की खातिर त्याग देती है, वैसे ही रामदेव ने भी सत्ता की महत्वाकांक्षा में वंदेमातरम विरोधियों के कार्यक्रम में हिस्सा लिया और इसका जवाब देने के बजाय चुप्पी साध ली है। यह भी नेतागिरी का ही लक्षण है कि चुप्पी साध लो। लेकिन बाबा रामदेव को यह समझ ही लेना चाहिए कि जो जनता उन्हें सरमाथे बिठा रही है, वह उन्हें भूलुंठित भी कर ही देगी। अच्छा हो कि बाबा बिना किसी सफाई या नानुकुर के अपनी धृष्टता के लिए माफी मांग ही लें।

10 टिप्‍पणियां:

Manoj ने कहा…

BAHUT BADHIYA. BABA KO YADI LOKPRIYATA KA MUGALTA HO GAYA HO YO WOH APNE PASAND KE SHAHAR SE PARSHAD KA CHUNAV LADH KAR DEKH LE. KEVAL BHAGWA VASTRA KE AADHAR PAR VOTE MIL RAHE HOTE TO UMA BHARTI DOBARA CM BAN GAI HOTI.

काशिफ़ आरिफ़ ने कहा…

सतीश जी, किन बाबा के बारे में बात कर रहे है जो बडी सफ़ाई से वन्दे मातरम के सवाल का जवाब नही दिया....

रही बात वन्दे मातरम गाने या ना गाने की.... तो वन्दे मातरम गाना देशभक्ति का सर्टिफ़िकेट नही है.... वन्दे मातरम गाने वाले इन्सानों का कत्ल कर रहे है, कालाबाज़ारी कर रहे है, अरबों रुपये के घोटाले कर रहे है तो वो देशभक्त हो गये क्या?????

काशिफ़ आरिफ़ ने कहा…

सतीश जी, किन बाबा के बारे में बात कर रहे है जो बडी सफ़ाई से वन्दे मातरम के सवाल का जवाब नही दिया....

रही बात वन्दे मातरम गाने या ना गाने की.... तो वन्दे मातरम गाना देशभक्ति का सर्टिफ़िकेट नही है.... वन्दे मातरम गाने वाले इन्सानों का कत्ल कर रहे है, कालाबाज़ारी कर रहे है, अरबों रुपये के घोटाले कर रहे है तो वो देशभक्त हो गये क्या?????

काशिफ़ आरिफ़ ने कहा…

एक सलाह

अपने ब्लोग पर बोल्ड में ना लिखें पढने में परेशानी होती है...तथा पैराग्राफ़ बना कर लिखा करें

ashishdeolia ने कहा…

आरिफ जी ।
वंदेमातरम गाना देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं है, मान लिया मगर इसके खिलाफ फतवा देना निसंदेह देश की खिलाफत है क्‍योंकि संविधान में इसे देशगान का दर्जा दिया गया है। कल को कोई संविधान को मानने से इनकार कर दे तब भी आप उसे देशद्रोही कहने से गुरेज करेंगें । कोई भी धर्म देश से उपर नहीं है। न आपका, न मेरा । आपसे और इस मुदद्े पर राजनीति करने वाले तमाम लोगों से गुजारिश है कि वंदेमातरम को धर्म और राजनीति की काली छाया से दूर ही रखें।

राज भाटिय़ा ने कहा…

वंदेमातरम गाना देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं है, हम भी यह मानते है, ओर धर्म बाद मै आता है देश पहले.... अरे जब देश ही नही रहेगा तो... फ़िर यह फ़तवा देने वाले इन आतंकियो के खिलाफ़ अपना फ़तवा क्यो नही देते, मै भी वंदे मातरम नही गाता, लेकिन उस की इज्जत करता हुं, दुसरो को मना नही करता.
बाकी राम देव के बारे मै ज्यादा नही जानता

एस.के.राय ने कहा…

सतीश जी ! आपने सही लिखा हैं कि वन्देमातरम् देश का संगीत हैं जिसे संविधान में लिपिबद्ध किया गया हैं ।
आजादी के दीवाने इस गीत के साथ सब कुछ न्यौछावर कर दिया करते थे ,उस समय इस गीत का विरोध नहीं हुआ ,हिन्द-मुस्लिम.. जैन -इसाई तो आजादी के पहले भी थे आज भी है ,पहले विरोध नहीं होता था ,आजादी के बाद देश कुछ मुस्लिम बन्धुओं को क्या हो गया है कि राश्ट् भक्ति से ओतप्रोत वन्देमातरम् का विरोध करने लग गए ,आखिर विरोध से उन्हें क्या मिल जाएगा ?

एक बात याद रखना चाहिए कि हिन्दुवादियों को इस तरह की फतवा आदी से मुद्दा मिल जाता हैं और मुस्लिमों के बारे में आग उडेलने का अच्छा बहाना भी मिल जाने से दंगा फसाद भी होता हैं ,मैंने देखा है कि जब कभी दंगा होता है ,सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम बन्धुओं को ही होता हैं ।

मुस्लिम भाई अपने लोगों को शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम बनाने में सेवा भाव से काम करें ,नही तो यह बात जो प्रचार में हैं कि जहॉं कहीं गंदी नालियों के उपर बस्ती नजर आता हैं -- मुस्लिम बस्ती हैं ,यह दाग कभी खत्म नहीं हो सकेगा ।

फतवा शराब खोरी ,अन्धविश्वास ,अराजकता ,देशद्रोही ,भ्रश्टाचार,आदी मुद्दों में निकालना चाहिए ,न कि देश को कोई यदि मॉं के समान माने तो उससे आपका नुकसान क्या है ?आप देश को मॉं के समान न मान कर बहन के समान माने ,दोस्त के समान माने या कुछ भी न माने .... पर मानने वालों का अपमान न करें ।

उम्दा सोच ने कहा…

सतीश जी आप की भावना मै सहृदय महसूस कर रहा हूँ !
आप का इस प्रकार से सोचना बिलकुल उचित है की वन्देमातरम पर फतवे पर ज़बरदस्त प्रतिक्रया दी जाए और हर भारतीय जो जिस तरह से सक्षम हो इस पर कारगर प्रतिक्रया करे! स्वामीजी ने भी ऐसा ही किया है यदि आप गौर से देखे तो ,स्वामी जी योग गुरु है ,वे जो भी प्रतिक्रया देंगे योग के द्बारा क्युकी यदि वे किसी और तरह से प्रतिक्रया दे तो सन्देश गलत जाएगा !

एक बात बताये किसी मुर्ख की मुर्खता पर आप पहले क्या चाहेंगे ??? उससे हुज्जत करना या आप चाहेंगे की भगवान् उसे सदबुद्धि दे ताकी वो क्या भूल कर रहा है पहले स्वयं उसके संज्ञान में आये और उसके बाद ही आप उससे बात करे ताके वो अपना भूल सुधार करे ! देखिये अक्लमंद से बहस होती है और मूर्ख से की जाती है वो हुज्जत ! आप ऐसा क्यों चाहते है की बाबा जी भी हुज्जत कर आते ?

आप बाबा जी के वक्तव्य को देखिए वे अनुलोम विलोम की शिक्षा दे रहे है ये कहते हुए की इसे करो तो तुममे सदबुद्धि आएगी तुम्हारी सोच सही होगी और दिमाग सही काम करेगा !

बाबा ने अपना काम किया है और हां फतवे की घोषणा बाबा के समक्ष नहीं की गई थी !

Meenu Khare ने कहा…

स्वामी जी उन चन्द लोगों में से हैं जिन्हे भारत की जनता ने पलकों पर बिठाया पर अब लगता है विनाशकाले विपरीत बुद्धि.... ऑल द बेस्ट स्वामी जी.

truefeelings ने कहा…

Baba koi nai cheej nahi kar rahe hain. Maharshi Yogi, Baba Gurudev aur jaane kitne baba rajniti ki chamak damak se apne ko door nahi rakh paye. Unhone rajniti ko sudharne ki badi badi baaten ki thi. Rajniti to nahi sudhari wo jaroor hashiye per chale gaye. Isliye mera ye manana hai ki Swami Ramdeo ko bhi rajniti me aana chahiye. Isase pata chal jaayega ki kaun kise sudharta hai.