शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

भूल गलती..... को याद करते हुए

भूल-गलती आज बैठी है जिरहबख्तर पहन कर तख्त पर दिल के,..........। मित्रों आज क्रांतिधर्मा कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की पुण्य तिथि है। भूल गलती कविता के अलावा उनकी दर्जनों कविताएं ऐसी हैं जिन्हें मैं सस्वर पाठ कर एकांत में भी अपने भीतर जलता हुआ लावा महसूस करता हूं। पुण्य तिथि पर उन्हें याद करते हुए मैं उनकी दो कविताओं के अंश और एक कथन उनकी- एक साहित्यिक की डायरी- से यहां दे रहा हूं। मुक्तिबोध को पढने वाले और उनको अपना अग्रज मानने वालों और तमाम संघर्षशील लोगों की तरफ से इस क्रांति कवि को श्रद्धांजलि।
और -एक साहित्यिक की डायरी से....

अगर मैं उन्नति के उस जीने पर चढने के लिए ठेलमठेल करने लगूं तो शायद मैं भी सफल हो सकता हूं। लेकिन ऐसी सफलता किस काम की जिसे प्राप्त करने के लिए आदमी को आत्म-गौरव खोना पडे, चतुरता के नाम पर बदमाशी करना पडे। शालीनता के नाम पर बिल्कुल एकदम सफेद झूठी खुशामदी बातें करनी पडें। जिन व्यक्तियों को आप क्षण-भर टालरेट नहीं कर सकते, उनके दरबार का सदस्य बनना पडे। हां, जो लोग यह सब कर लेते हैं, वे अपनी यशः पताकाएं फहराते हुए घर लौटते हैं और कितने आत्मविश्वास से बात करते हैं। मानो उन्हीं का राज्य है। बहुरूपिया शायद पुराना हो गया है, लेकिन उसकी कला दन दिनों अत्यंत परिष्क्रत होकर भभक उठी है।
अब तक क्या किया...


अब तक क्या किया,


जीवन क्या जीयाकिस-किसके लिए तुम दौड गए,


करूणा के द्रश्यों से हाय मुंह मोड गए


बन गए पत्थर।


अरे! मर गया देश जीवित रह गए तुम!!


अब क्या कियाजीवन क्या जीया।



भूल गलती


आज बैठी है जिरहबख्तर पहन करतख्त पर दिल के,


चमकते हैं खडे हथियार उसके दूर तक,


आंखे चिलकती हं नुकीले तेज पत्थर-सी,


खडी हैं सिर झुकाए


सब कतारें


बेजुबां बेबस सलाम में,


अनगिनत खंभों व मेहराबों-थमे


दरबारे-आम में।


सामनेबेचैन घावों की अजब तिरछी लकीरों से कटाचेहराकि


जिस पर कांपदिल की भाफ उठती है


पहने हथकडी वह एक उंचा कद,


समूचे जिस्म पर लत्तर,


झलकते लाल लंबे दागबहते खून के।


वह कैद कर लाया गया ईमानसुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,


बेखौफ नीली बिजलियों को फेंकताखामोश!!


सब खामोशमनसबदार,शायर और सूफी,अलगजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी,आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार


हैं खमोश!!
नामंजूर,


उसको जिंदगी की शर्म की-सी शर्तनामंजूर,


हठ इनकार का सिर तान खुद-मुख्तार।


कोई सोचता उस वक्तछाए जा रहे हैं सलतनत पर घने साए स्याह,


सुल्तानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिटटी का,


वो-रेत का-सा ढेर शंहशाह,


शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा!!;


लेकिन, ना,जमाना सांप का kata


;आलमगीरद्धमेरी आपकी कमजोरियों के सयाहलोहे का जिरहबख्तर पहन,


खूंख्वारहां, खूंख्वार आलीजाह,


वो आंखें सचाई की निकाले डालता,


सब बस्तियां दिल की उजाडे डालता,


करता, हमें वह घेर,


बेबुनियाद, बेसिर-पैरहम सब


कैद हैं उसके चमकते ताम-झाम में


शहरी मुकाम में!!
इतने में,


हमीं में सेअजीब कराह-सा कोई निकल भागा,


भरे दरबारे-आम में मैं भीसंभल जागा!!


कतारों में खडे खुदगर्ज बा-हथियारबख्तरबंद समझौत्ेसहमकर,


रह गए,


दिल में अलग जबडा, अलग दाडी लिए,


दुमुंहेपने के सौ तजुर्बों की बुजुर्गी से भरे,


दढियल सिपहसालार संजीदा सहमकर रह गए!!


लेकिन, उधर उस ओर,कोई, बुर्ज के उस तरफ जा पहुंचा,


अंधेरी घाटियों के गोल टीलों,


घने पेडों मेंकहीं पर खो गया,


महसूस होता है कि वह बेनामबेमालूम दर्रों के इलाके में;


सचाई के सुनहले तेज अक्सों के धुंधलके मेंद्ध मुहैया कर रहा लश्कर,


हमारी हार का बदला चुकाने आएगासंकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,


हमारे ही ह्रदय का गुप्त स्वर्णाक्षरप्रकट होकर विकट हो जाएगा!!


- गजानन माधव मुक्तिबोध


जन्म श्योपुर मप्र 13 नवंबर 1917, निधन दिल्ली11 सितंबर 1964

3 टिप्‍पणियां:

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

मुक्तिबोध की पुण्य-तिथि पर उनके पुण्य-स्मरण का आभार । उनकी रचनायें देकर बड़ा उपकार किया आपने । आभार ।

Udan Tashtari ने कहा…

मुक्तिबोध जी की पुण्य तिथि पर इस प्रस्तुति के लिए आभार.

राज भाटिय़ा ने कहा…

मुक्तिबोध जी की पुण्य तिथि याद दिलाने के लिये, ओर उन कि रचना पढा कर आप ने बहुत अच्छा किया.