सोमवार, 14 सितंबर 2009

आज हिंदी डे है

आज हिंदी डे है न

उन्हें सुबह से शाम तक,

धारा-प्रवाह हिंदी में बोलते-बतियाते,

देखकर अद्र्धांगिनी घबराईं,

चिंता की लकीरें माथें पर आईं,

एक युक्ति मस्तिक्क में आई,

फौरन पारिवारिक चिकित्सक को लगाया फोन,

साहब की भंगिमाओं और भाषण शैली का बताया एक-एक कोण,

डॉक्टर महोदय तनिक मुस्कराए, लक्षणों पर गौर फरमाया,

बोले- मैडम, घबराइए मत,

कल सुबह तक साहब हो जाएंगे ठीक,

बोलने लगेंगे फर्राटेदार अंग्रेजी या अपनी प्यारी भाषा हिंगिलिश,

एक ही दिन का है यह रोग, दरअसल आज हिंदी डे है न॥

-सतीश एलिया

6 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

हिन्दी हमे बचाना है, हम सबको बढते जाना है। हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई।

http://hindisahityamanch.blogspot.com

http://mithileshdubey.blogspot.com

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छा लिखा है .. अभी तो ऐसी हालत नहीं आयी .. पर कुछ दिनों में लगातार हिन्‍दी बोलनेवालों को पागल ही समझा जा सकता है .. ब्‍लाग जगत में आज हिन्‍दी के प्रति सबो की जागरूकता को देखकर अच्‍छा लग रहा है .. हिन्‍दी दिवस की बधाई और शुभकामनाएं !!

drmaheshparimal ने कहा…

ऐलिया जी,
श्राद्ध पक्ष और हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा या हिंदी सप्‍ताह का ऐसा क्‍या नाता है कि हर साल इनमें से कोई न कोई इस दिन टकरा ही जाता है। यह केवल एक ही दिन का रोग है भैया निकल लो नहीं तो हिंदी के नाम पर पागल हो जाओगे। पागल खाने में भी पागल हिंदी नहीं अंगरेजी में बोलते हैं। पहले तो वे हिंदी ही बोलते थे, पागल होने के बाद उन्‍होंने अपनी भाषा बदल ली।
डॉ महेश परिमल

राज भाटिय़ा ने कहा…

मेरा तो हर दिन हिन्दी दिन होता है, अब कोन सा दिन मनाऊं
एक अति सुंदर कविता के लिये आप का धन्यवाद

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

ऐलिया जी,
बहुत ही सुन्दर लिखा है
आप को हिदी दिवस पर हार्दीक शुभकामनाऍ।

पहेली - 7 का हल, श्री रतन सिंहजी शेखावतजी का परिचय
हॉ मै हिदी हू भारत माता की बिन्दी हू
हिंदी दिवस है मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा

truefeelings ने कहा…

Maine ye mahsoos kiya hai ki jab bhi kisi seminar me ya goshthi me hindi ki baat hoti hai to log hindi ko kaise samridh banaye ye chhodkar English ko gali dene lagte hain. Mere mat me Hindi ko samridh banane me aur janpriya banane me kabhi gambhir koshish hoti hi nahi hai. Ye main adhunik sandarbh me bol raha hoon. Agar English doosre bhasha ke sabdo ko apne me samahit karke apne varchasva ko banaye rakh sakti hai to aisa hindi ke saath kyon nahi ho sakta hai. Ye baat hamare samaj ke buddhijivion ko samjhana padega ki Hindi ko badhava dene ke liye English ko marna jaroori nahi hai. Kya hum Science ki parhai ki kalpna sirf Hindi me kar sakte hain? Vastutah, Hindi ko badhava dene ki liye hum sirf hindi ke baat karen aur kuchh bhi nahi. Hum science, art, literature sabhi kuchh hindi ki puri paridhi me laane ki koshish karen to Hindi bhi English jaisi hi samridh hogi.
Ranjan