मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

मक्का एक लाख रुपए क्विंटल ......

शीर्षक चौंकाने वाला लग सकता है। जी हां मक्का के फूटे हुए दाने दस रुपए तोले के भाव बिक रहे हैं। जिन्हें किसी जमाने में फुटाने कहा जाता था और अब जो पॉप कॉर्न के नाम से विख्यात हैं, ट्रेनों में आम आदमी की बोगी अर्थात जनरल कोच में अंग्रेजी के देसी नाम पप्पन से जाने जाते हैं। ट्रेनों में दो रुपए तौला और माल्स, थिएटर और बड़े लोगों के शॉपिंग मेलों में दस रुपए तौले के भाव में मिल रहे हें। कल में ऐसे ही एक मेले में गया था, शौक से कतई नहीं बल्कि कर्तव्य परायणता की वजह से । पति धर्म निभाने अर्थात पत्नी की मंशा पूरी करने में इस शॉपिंग मेले में गया था, वहां जो चीज सबसे सस्ती थी, यही थी। देश भर के किसान और गरीब मुझ गरीब को माफ करें मैंने इस मेले में 20 रुपए के 10 ग्राम पॉपकार्न न केवल खरीदे बल्कि पत्नी के साथ खाए भी। अर्थात मक्का के दाने उर्फ पॉप कार्न बीस रुपए में 10 ग्राम। जरा सोचिए मक्का का सरकारी समर्थन मूल्य 840 रुपए प्रति क्ंिवटल है और बाजार में अधिकतम भाव 890 रुपए प्रति सौ किलो है। यही मक्का जब पॉप कार्न के नाम से बिकती है तो उसका भाव एक लाख रुपए क्विंटल हो जाता है। जो किसान बोता है, सींचता है और काटकर, साफ कर दुकान पर बेचता है, उसके दाम और पॉप कार्न के दाम में हजारों गुना फर्क। सरकारें किसानों के कर्ज माफ कर अहसान जताने, उन्हें मिलने वाली सब्सिडी लगातार घटाने में लगी रहती हैं लेकिन 840 रुपए क्विंटल की मक्का को एक लाख रुपए क्विंटल के भाव में बेचकर मुनाफा कमाने पर कोई नियंत्रण नहीं है। दलितों के नल पर नहाने, उनके यहां टेबिल लगवाकर खाना खाते हुए फोटो खिंचवाने और दलितों के घर में रात बिताकर लोगों की समस्याएं सीखने में लगे राहुल बाबा अगर किसानों, गरीबों की जिंदगी की वास्तविक दिक्कतें समझना चाहते हैं और सही मायने में राजनीति को गरीबी हटाने से जोडना चाहते हैं तो उन्हें किसान की उपज और बाजार में उसके उत्पादों की कीमतों में हजारों गुने अंतर को पाटने पर काम करना होगा। राहुल से कांग्रेस के विरोध ी दलों के नेताओं को भी उम्मीद जगी हैं, लेकिन उम्मीद ये की जाना चाहिए कि उनकी यह दलित घरों में जाने की प्रायोजित किस्म की मुहिम वाकई बदलाव की वजह बन पाए। अन्यथा कलावती के यहां भी वे गए थे और कलावती खुश तो कम से कम नहीं ं ही है।

11 टिप्‍पणियां:

ashishdeolia ने कहा…

बहुत बारीक विश्‍लेषण किया है आपने । साधुवाद । गरीब किसान को कभी उसकी उपज का उचित मूल्‍य नहीं मिल पाता । गांव के साहूकार से लेकर शहरों के दुकानदार तक उसकी उपज पर मुनाफा कमाकर धंधा कर रहे हैं।
शीर्षक में प्रति किलो के बजाये प्रति क्विंटल कर लीजिये । मुद्रण की गलती हो गयी है ।

संगीता पुरी ने कहा…

इसी प्रकार , किसानों से खरीदे जानेवाले आलू और बाजार में बिकनेवाले चिप्‍स में तथा किसानों से खरीदे जानेवाले गन्‍ने और बाजार में बिकनेवाले गुड में तथा अन्‍य कई वस्‍तुओं में ऐसा ही अंतर देखा जाता है .. आज की व्‍यवस्‍था में सारा सुख व्‍यवसायियों को ही है .. किसानों को कौन पूछता है .. वो तो सिर्फ वोटों की राजनीति के शिकार होते है !!

chandrashekhar HADA ने कहा…

brand ka jamana hai satish bhai...NAVBHARAT main 3000 rupaye main kaam karne vala ydi NAVBHARATTIMES main 6 mahine kaam kar leta hai to vo 30,000 ka ho jata hai.
BAHARHAAL bahut khoobsurat likha...bahut lambe samay baad aapko padkar bahut achchha laga.

http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/ ने कहा…

एलिया जी,
सटीक टिप्‍पणी, बधाई। कुछ दिनों पहले छत्‍तीसगढ़ के एक गॉंव में जाना हुआ, वहॉं मिर्च ढाई रुपए किलो बिक रही थी, बाजार में उसका भाव करीब 15 रुपए किलो होता है। कई हाथों से गुजरकर चीजें इसीलिए इतनी महँगी हो जाती हैं। सब्जियों के भाव आसमान में होते हैं, तब भी मिर्च उगाने वालों को कोई लाभ नहीं होता। महँगाई इन्‍हीं अनजाने हाथों से गुजरकर बढ़ती जाती है। रही बात नेताओं की, तो वे पुलिस की तरह हैं, जो साइरन बजाती गाड़ी से अपराधियों को पकडने निकलते हैंं। क्‍या वाकई अपराधी इतने मूर्ख हैं।
डॉ महेश परिमल

विजयप्रकाश ने कहा…

यही हाल "पोटेटो चिप्स" का भी है.सच कहा आपने,किसान जब खुशहाल होगा तभी भारत भी खुशहाल होगा

राज भाटिय़ा ने कहा…

पाप कर्न जिसे हम मक्की के फ़ुले कहते है, अगर इसे घर मै बनाओ तो मुफ़त मै पडते है, लेकिन फ़िर दिखावा नही होता.... फ़िर पता नही लगता कि कोई पढा लिखा पाप कार्न खा रहा है( मक्के के फ़ुले नही)
आप ने बहुत सुंदर ढंग से खोज निकाली,किसान जो भी फ़सल बोता है फ़िर भी गरीब ओर लाला जो शहर मे बडे बडे गोदाम बना कर रहता है, कुछ किये बगेरा फ़िर भी अमीर... ओर महगई की जड यह आडती ही है कोपी ओर नही, यही से सब को हिस्सा जाता है.

sanjeev persai ने कहा…

जगह का नाम और बता देते सर हम भी देख ही आते मेला.......................

Udan Tashtari ने कहा…

यही धंधा किया जाये सर जी...बहुत बारीक नजर डाली है.

विवेक सिंह ने कहा…

पर इसका पूरा लाभ गरीब की जेब में ही जाता है, और अमीर की जेब से ही जाता है !

Praveenaliya ने कहा…

Pop Corn ke Sath Aalu Chips,Aalu Bhujiya, Traino mai jaha Sasti hoti hai wahi Moll mai Mahngi ho jati hai. Share Market se to achchha ye Dhandha hai. Soch Sakte hai.

राज भाटिय़ा ने कहा…

अजी चलिये फ़ायदे का धंधा करते है , मै आप को ५०,००० रुपये मै एक किलो ५०० ग्राम पाप कार्न देता हुं, आप इसे १ लाख ओर ५०,००० मै बेचे सीधा एक लाख का लाभ:)

आप को ओर आप के परिवार को दिपावली की शुभकामनाये