बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

शिवराज के मंत्रिमंडल में नौ और मंत्री शामिल, दागियों को भी मिली जगह

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपनी दूसरी पारी के पहले मंत्रिमंडल विस्तार में नौ नए मंत्रियों को बुधवार को राजभवन में राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने शपथ ग्रहण कराई। सरताज सिंह,नरोत्तम मिश्रा, उमाशंकर गुप्ता, अजय विश्नोई, विजय शाह, कैबिनेट मंत्री और महेंद्र हार्डिया, नानाभाऊ मोहोड़, मनोहर ऊंटवाल, ब्रजेंद्र प्रताप सिंह राज्य मंत्री बनाए गए हैं। जबकि राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार करण सिंह वर्मा को पदोन्नत कर कैबिनेट दर्जा दिया गया है। आदिवासी विधायक जय सिंह मरावी को भी शपथ लेना थी लेकिन वे नहीं पहुंच सके। अब शिवराज सरकार के मंत्रियों की कुल संख्या 23 से बढ़कर 32 हो गई है। इस तरह एक और विस्तार की गुंजाइश बरकरार रखी गई है। मप्र के मंत्रिमंडल में 35 सदस्य हो सकते हैं। नगरीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देकर महिला शक्तिकरण की वाहवाही लूटने में लगी भाजपा सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार में एक भी महिला को मंत्री बनने लायक नहीं समझा। पहले भी केवल दो ही मंत्री अर्चना चिटनिस और रंजना बघेल शिवराज सरकार में शामिल हैं। मध्यप्रदेश में पहली बार रात में हुए इस शपथ समारोह में भाजपा के मप्र प्रभारी अनंत कुमार, नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी, पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा समेत अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे। रात पौने आठ सात बजे इन मंत्रियों केशपथ लेते ही करीब दो माह से चल रही मंत्रिमंडल विस्तार की कवायद पूरी हो गई। विस्तार में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने नानाभाऊ मोहोड़, मनोहर ऊंटवाल, ब्रजेंद्र प्रताप सिंह को शामिल कर क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। पहले मंत्री रह चुके और फिर से लाल बत्ती पाने के लिए मशक्कत कर रहे अजय विश्नोई, नरोत्तम मिश्रा और विजय शाह भ्रष्टïाचार के आरोपों में घिरे रहने के बावजूद दोबारा मंत्री बनने में कामयाब रहे। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के करीबी होने की वजह से पहली बार के विधायक होने पर भी मंत्री बन चुके उमाशंकर गुप्ता को अब शिवराज ने श्री गौर को ही दरकिनार रखने के लिए मंत्री बना दिया है। जबकि भ्रष्टïाचार के आरोपों और अपने पुत्रों के खिलाफ हत्या जैसे संगीन मामले की सीबीआई जांच के चलते कमल पटेल को निराशा हाथ लगी है। वे फिर मंत्री नहीं बन पाए। दूसरी बार भाजपा की सरकार बनने पर बीते साल दिसंबर में शपथ लेने के लिए बुला लिए जाने के बाद ऐन वक्त पर दरकिनार कर दिए गए पूर्व केंद्रीय मंत्री सरदार सरताज सिंह को मंत्री बनाकर शिवराज सिंह चौहान ने भूल सुधार कर लिया है। हालांकि पिछली बार की तरह इस बार भी पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा सरताज सिंह का पत्ता कटवाने में जुटे रहे बताए गए थे। प्रदेश में नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण लागू कर चुकी सरकार ने मंत्रिमंडल में महिला वर्ग को पर्याप्त महत्व नहीं दिया है। विस्तार में एक भी नई महिला मंत्री नहीं बनाई गई है। अर्चना चिटनिस और रंजना बघेल पहले से ही मंत्री हैं। छह घंटे पहले ही बज उठे नगाड़ेराजभवन में नए मंत्रियों की शपथ से छह घंटे पहले ही उनके आवासों और कार्यालयों पर खुशी के नगाड़े बज उठे थे। दोपहर दो बजे तक तो उमाशंकर गुप्ता, सरताज सिंह, अजय विश्नोई, विजय शाह और नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने पटाखों की लडिय़ों से आतिशबाजी शुरूकर दी थी। सर्वाधिक जश्न सरताज सिंह समर्थकों में था। प्रदेश भाजपा कार्यालय दीनदयाल परिसर के ठीक पीछे स्थित उनके होटल के बाहर तो दीपावली जैसा माहौल हो गया था। पिछली दफा जब वे मंत्री नहीं बन पाए थे, तो उनके समर्थकों ने पार्टी कार्यालय में जमकर तोडफ़ोड़ कर दी थी। होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र से कई दफा सांसद रहे श्री सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को भी इसी क्षेत्र से लोकसभा चुनाव में पटखनी दी थी। उन्हें मंत्री बनाए जाने के आश्वासन के साथ ही विधानसभा चुनाव लड़ाया गया था, उसमें भी उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज और अपराजेय तत्कालीन विधानसभा उपाध्यक्ष हजारीलाल रघुवंशी को परास्त किया था। उन्हें मंत्री नहीं बनाए जाने का खामियाजा भाजपा को हाल ही में लोकसभा चुनाव में होशंगाबाद सीट गंवाकर उठाना पड़ा था।

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

चीन से रोशन हिंदोस्तां हमारा...

शीर्षक अटपटा लग सकता है और चीन की हरकतों से आक्रोशित हर भारतीय को चुभ सकता है। लेकिन मित्रो यह शीर्षक बिल्कुल सच है, पूरे सोलह आना और सौ फीसदी सच। आज पांच दिवसीय दीपोत्सव का पांचवां दिन है और शहरों में जगमगाती रोशनी इस बात की गवाही दे रही है कि इस झिलमिलाहट में चीनी उत्पादों का हिस्सा भारतीय उत्पादों के बनिस्बत ज्यादा है। बीते करीब तीन चार साल से भारतीय बाजारों में दीपावली के एक महीने पहले ही बल्वों की लडिय़ां और तरह तरह के आयटम भर जाते हैं। इनमें जो सस्ते और विविधता भरे आयटम होते हैं वे चीन निर्मित हैं। हालत यह है कि स्थानीय कारोबारियों को खुदरा विक्रेताओं को दो और चार गुने तक दाम आसानी से मिल जाते हैं और खरीददार को फिर भी लगता है कि सस्ता आयटम मिल गया। बेचने वाले खुलेआम बताते हैं कि यह आयटम चीनी है इसकी कोई गारंटी नहीं, चले तो कई साल चल जाए और न चले तो हमारी जिम्मेदारी नहीं। हर दीपावली पर नए नए आयटम चीन भारत में भेजता है और जमकर खपते हैं। मुझे याद है जब हमारे मोहल्ले के कई लड़के बल्ब, डोरी और कईया लाकर बल्बों की लडिय़ां तैयार करते थे और आसपास ही उन्हें बेचकर दीवाली के पटाखों का खर्च निकाल लेते थे। कई स्थानीय छोटे छोटे दुकानदार इस तरह के आयटम तैयार करके बेचते थे। अब यह छोटा मोटा रोजगार पूरी तरह खत्म हो चुका है। क्योंकि उजाले के भारतीय पर्व दीपावली को मनाने के लिए चीन भरपूर आयटम भेज रहा है, भले ही वे खतरनाक हो सकते हों, ऊर्जा की बर्बादी करने वाले हों। अकेले बिजली के नहीं बल्कि खिलौनों से लेकर मोबाइल और दूध तक चीन से भारत में आ रहे हैं। इनकी क्वालिटी की कोई गारंटी नहीं लेकिन महंगाई के इस दौर में सस्ता बिकता है, गारंटी से। चीनी प्रोडक्ट भरोसेमंद नहीं हैं ठीक उसी तरह चीन भी भरोसेमंद नहीं है। नेहरू-चाउ एन लाई का हिंदी चीनी भाई भाई नारा 1962 में चीन के धोखे और भारत की पराजय में तब्दील हुआ था और अब तक वह जख्म नासूर बना हुआ है। सोनिया मनमोहन से लेकर चिंदबरम तक और आनंद शर्मा से लेकर मनीष तिवारी तक भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ पर इंकार की मुद्रा में दिखाई भले दे रहे हों लेकिन मीडिया ने जो सच्चाई उजागर की है, उससे देश हकीकत को जान चुका है। देश के लोग सरकारी सफाई से कतई मुतमईन नहीं हैं।

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

एक दीप धरें मन की देहरी पर

आप सभी को सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। दीप पर्व पर मेरी अपनी एक कविता सुधिजनों को समर्पित है।
एक दीप धरें मन की देहरी पर
धीरे धीरे घिरता है तम,

ग्रस लेता जड़ और चेतन को

निविड़ अंधकार गहन है ऐसासूझ न पड़ता

हाथ को भी हाथ

क्या करें,

कैसे काटें इस तम को

यह यक्ष प्रश्न

विषधर साकर देता किंकर्तव्यविमूढ़

तो जगती है एक किरनउम्मीद की

टिमटिमातीकंपकंपाती दीप शिखा सी

आओ लड़ें तिमिर अंधकार से,

एक दीप धरें मन की देहरी परप्रेम की जोत जगाएं हम

मिटे अंधियारा

बाहर काभीतर का भी,

आओ दीपमालिका सजाएं,

दीपावली बनाएंएक दीप धरें मन की देहरी पर।।

- सतीश एलिया

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

मक्का एक लाख रुपए क्विंटल ......

शीर्षक चौंकाने वाला लग सकता है। जी हां मक्का के फूटे हुए दाने दस रुपए तोले के भाव बिक रहे हैं। जिन्हें किसी जमाने में फुटाने कहा जाता था और अब जो पॉप कॉर्न के नाम से विख्यात हैं, ट्रेनों में आम आदमी की बोगी अर्थात जनरल कोच में अंग्रेजी के देसी नाम पप्पन से जाने जाते हैं। ट्रेनों में दो रुपए तौला और माल्स, थिएटर और बड़े लोगों के शॉपिंग मेलों में दस रुपए तौले के भाव में मिल रहे हें। कल में ऐसे ही एक मेले में गया था, शौक से कतई नहीं बल्कि कर्तव्य परायणता की वजह से । पति धर्म निभाने अर्थात पत्नी की मंशा पूरी करने में इस शॉपिंग मेले में गया था, वहां जो चीज सबसे सस्ती थी, यही थी। देश भर के किसान और गरीब मुझ गरीब को माफ करें मैंने इस मेले में 20 रुपए के 10 ग्राम पॉपकार्न न केवल खरीदे बल्कि पत्नी के साथ खाए भी। अर्थात मक्का के दाने उर्फ पॉप कार्न बीस रुपए में 10 ग्राम। जरा सोचिए मक्का का सरकारी समर्थन मूल्य 840 रुपए प्रति क्ंिवटल है और बाजार में अधिकतम भाव 890 रुपए प्रति सौ किलो है। यही मक्का जब पॉप कार्न के नाम से बिकती है तो उसका भाव एक लाख रुपए क्विंटल हो जाता है। जो किसान बोता है, सींचता है और काटकर, साफ कर दुकान पर बेचता है, उसके दाम और पॉप कार्न के दाम में हजारों गुना फर्क। सरकारें किसानों के कर्ज माफ कर अहसान जताने, उन्हें मिलने वाली सब्सिडी लगातार घटाने में लगी रहती हैं लेकिन 840 रुपए क्विंटल की मक्का को एक लाख रुपए क्विंटल के भाव में बेचकर मुनाफा कमाने पर कोई नियंत्रण नहीं है। दलितों के नल पर नहाने, उनके यहां टेबिल लगवाकर खाना खाते हुए फोटो खिंचवाने और दलितों के घर में रात बिताकर लोगों की समस्याएं सीखने में लगे राहुल बाबा अगर किसानों, गरीबों की जिंदगी की वास्तविक दिक्कतें समझना चाहते हैं और सही मायने में राजनीति को गरीबी हटाने से जोडना चाहते हैं तो उन्हें किसान की उपज और बाजार में उसके उत्पादों की कीमतों में हजारों गुने अंतर को पाटने पर काम करना होगा। राहुल से कांग्रेस के विरोध ी दलों के नेताओं को भी उम्मीद जगी हैं, लेकिन उम्मीद ये की जाना चाहिए कि उनकी यह दलित घरों में जाने की प्रायोजित किस्म की मुहिम वाकई बदलाव की वजह बन पाए। अन्यथा कलावती के यहां भी वे गए थे और कलावती खुश तो कम से कम नहीं ं ही है।

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

आचार्य त्रिखा को गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान

वरिष्ठ पत्रकार प्रो. नंदकिशोर त्रिखा को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से अलंकृत करने निर्णय लिया है। वे नवभारत टाइम्स के संपादक रहे हैं और इस विवि के पहले प्रोफेसर,मैं इस विवि के पहले बैच का विद्यार्थी हूं, अपने आचार्य के सम्मान से मैं अत्यंत हर्षित हूं। अठारह साल पहले जब हम भोपाल में खुले इस विवि में आए थे, तो हमारे लिए पत्रकारिता की पढाई नई चीज थी और उनके लिए अध्यापन। वे तो वर्षों से पत्रकारिता से जुडे थे और मैं कुछ ही सालों से पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के जरिए जुडा था। मैं डा. त्रिखा के बारे में कुछ अनुभव और संस्मरण यहां बांटना चाहता हूं। उनमें दो गुण ऐसे हैं जो किसी भी पत्रकार में होना ही चाहिए। पहला अध्ययन शीलता, दूसरा वक्त की पाबंदी। त्रिखा जी पत्रकारिता विभागाध्यक्ष तो थे ही वे हास्टल में हमारे वार्डन भी थे। वे कक्षाओं के बीच में अध्ययनरत रहते थे और देर रात गए तक उनका अध्यवसाय जारी रहता था। इसके बावजूद वे अलसुबह उठकर सैर कर आते थे और कक्षा में एक सेकंड भी विलंब नहीं होता था। आप उन्हें देखकर घडी मिला सकते थे। जब हम लोग अध्ययन यात्रा पर दिल्ली गए तब भी हमने उनकी वक्त की पाबंदी देखी। हम लोग साउथ ब्लाक मंे रूके थे और दिल्ली में उनका घर साकेत में है। हमारी गणमान्य लोगों से मुलाकात और मीडिया संस्थानों या संसद की कार्यवाही देखने के अपाइंटमेंट डा. त्रिखा ही करते थे, हर दिन जब भी हम लोग पहुंचते वे पहले से वहां हमारा इंतजार कर रहे मिलते थे। पत्रकारिता में उनकी सक्रियता और उनके सम्मान को हमने संसद से लेकर राष्टपति भवन तक देखा। उनकी सह्रदयता और विदयार्थियों से प्रेम खूब याद आता है। वे दिल्ली के हमारे व्यस्त अध्ययन दौरे में समय निकालकर हम सब को अपने घर ले गए और बहुत आत्मीयता से स्वागत किया। अब जबकि पत्रकारिता में मक्कारिता करने वाले कमोबेश सभी जगह हावी दिख रहे हैं, संपादक तक बन रहे हैं, त्रिखा जी को यह सम्मान मन को सुकून देता है, गौरवान्वित करता है।त्रिखाजी से जुडी एक और याद मेेरे मन में है। वो ताजा हो गई है कि वह अवसर शरद पूर्णिमा का था, मेरा जन्म दिन होता है। हम लोग हास्टल में नए थे, नया विवि, नए प्राध्यापक, शिक्षक साथी, भवन सब कुछ नया नया था। हास्टल में बात बात में किसी मित्र ने मेरी डेट आफ बर्थ पूछी तो मैंने कहा था कि तारीख से नहीं हम तो तिथि से याद रखते हैं, तिथि ही ऐसी है शरद पूर्णिमा। सितंबर की यह बात अक्टूबर में शरद पूर्णिमा को मित्रों ने रात हास्टल की छत पर आयोजन कर लिया, छात्राओं ने खीर बनाई, मिठाई मंगाई गई। चांदनी रात में कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ, इसमें डा. त्रिखा, प्रो. कमल दीक्षित, मैडम दविंदर कौर उप्पल, सभी हास्टल निवासी छात्र छात्राएं शामिल हुए। मेरे मन में आज भी वो सुर गूंजते हैं, त्रिखाजी ने भजन सुनाया था- राह दिखा प्रभु...। इस पूरे आयोजन की बात फिर कभी। मुझे यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है कि हास्टल के सबसे दुर्दांत छात्रों मंे मैं शामिल था, त्रिखाजी हमसे बेहद दुखी रहते थे, लेकिन तब भी हम उनका तहे दिल से सम्मान करते थे। हां झूठी जी हुजूरी नहीं करते थे और मस्ती खूब करते थे। अनुशासन प्रिय त्रिखाजी को यह नागवार गुजरता था। खैर एक दिन रात को उन्होंने सन्नाटे में टाइपराइटर की खट-खट सुनी तो वे वहां पहुंच गए, जहां मैं टाइपिंग सीखने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने कहा कि बिना 15 लिखित अभ्यास सीखे टाइपिंग मंे निष्णात नहीं हुआ जा सकता। मैंने इसे चैलंेज बना लिया, रोज रात को टाइपिंग सीखता। कुछ दिन बाद मैंने उनके सामने स्पीड में टाइप करके दिखाया तो वे मुस्कराए और मुझे शाबासी दी। मुझे निबंध प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार मिला तब भी उन्होंने मेरी तारीफ, जब परीक्षा परिणाम आया तो उन्होंने सबसे पहले मुझे इसकी सूचना कि आप प्रथम श्रेणी में उतीर्ण हो गए हैं, प्रायोगिक परीक्षाओं में दूसरों से कम नंबर मिलने से मैं नाराज अवश्य था लेकिन आज सोचता हूं तो लगता है, अच्छे शिक्षक मिलना भी सौभाग्य होता है, मैं इस मामले में सौभाग्यशाली रहा। आखिर में वह वाकया जरूर बताना चाहूंगा, जो अब भी जेहन में ताजा है। त्रिखाजी जब भोपाल से जा रहे थे, हम दो तीन मित्रों को जो स्थानीय अखबारों में काम कर रहे थे, अचानक यह सूचना मिली तो हम भागे भागे रेलवे स्टेशन पहुंचे। शताब्दी एक्सप्रेस दिल्ली रवाना होने ही वाली थी, हम उनके कोच में पहुंचे, चरण स्पर्श किए। पुरानी सभी भूलों, उददंडताओं के लिए क्षमा मांगी, सह्रदय त्रिखाजी की आंखों में आंसू भर आए, हम भी अश्रु विगलित हो उठे। उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया। गुरूओं का आशीष है, पत्रकारिता में 18 वर्षों के दौरान कई तरह के दौर में उनकी शिक्षा और अनुभव साये की तरह काम आए। आचार्य त्रिखा को गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान प्रदान करने के निर्णय पर उन्हें हार्दिक बधाई और नमन।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

प्यारेलाल जी नहीं रहे....

मध्यप्रदेश में जनसंघ और संघपुत्री भाजपा को जिन लोगों ने चना चबेना खाकर शहर शहर कस्बे कस्बे और गांव गांव घूमकर पोषित पल्लवित किया, उन सम्मानीय कार्यकर्ताओं में से एक प्यारेलाल जी नहीं रहे। भाजपा के राष्टीय उपाध्यक्ष, महासचिव, दिग्विजय सिंह को हराकर राजगढ से लोकसभा सदस्य रहे प्यारेलाल खंडेवाल का आज निधन हो गया। शाम पांच बजे भोपाल में उस स्थल के करीब उनकी अंत्येष्टि होगी जहां कुशाभाउ ठाकरे पंचतत्व में विलीन हुए थे। श्री खंडेलवाल वर्तमान में मप्र से राज्यसभा सदस्य थे। कैंसर जैसी घातक बीमारी से सालों से लडते रहे और बार बार उसे चित भी करते रहे प्यारेलाल जी को पिछले महीने ह्रदयाघात के बाद दिल्ली में इलाज के लिए भर्ती किया गया था। करीब चार साल पहले मप्र भाजपा ने उनका अम्रत महोत्सव आयोजित किया था। मप्र मंें भाजपा जिन लोगों के पसीने से लहलहाती फसल बनी उनमें कुशाभाउ ठाकरे के साथ प्यारेलाल खंडेलवाल और नारायण प्रसाद गुप्ता का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वर्ष 2003 में मप्र में भाजपा की सरकार बनने से पहले मैंने उनसे लंबी बातचीत की थी, यह साक्षात्कार 28 सितंबर को प्रकाशित भी हुआ था। उस वक्त नौ साल से जमी दिग्विजय सरकार को उखाडने के लिए भाजपा ने कमर कस ली थी, उमा भारती को सीएम प्रोजेक्ट करने की सुगबुगाहट शुरू ही हुई थी। आडवाणी खेमा इसके लिए माहौल बनाने के प्रयास में था। ऐसे में इस बातचीत में श्री खंडेलवाल ने किसी को भी सीएम प्रोजेक्ट करने की खिलाफत की थी, उनका विरोध व्यक्ति से नहीं था, वे सैद्धांतिक विरोध कर रहे थे। बाद में उनकी कही बातें सच हुईं, उमा भारती मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहीं, बाबूलाल गौर आए फिर शिवराज सिंह चैहान। यह साबित हो गया कि वोट पार्टी का था उमा का नहीं और न ही अब जिस वोट से भाजपा की सरकार बनी है वह शिवराज का वोट है। जाति के मामले में भी यही हुआ। प्रसंगवश यह साक्षात्कार में यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूं।
मैं किसी को सीएम प्रोजेक्ट करने के पक्ष में नहीं: खंडेलवाल

सतीश एलिया


भोपाल, 27 सितंबर २००२


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्यारेलाल खंडेवाल मप्र में विधानसभा चुनाव में किसी भी नेता को सीएम प्रोजेक्ट कने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि चुाव किसी एक नेता के बलबूते नहीं जीता, पार्टी का जनाधार सरकार बनाता है। मप्र में भाजपा का जनाधार किसी व्यक्ति या जातिगत आधार पर नहीं है। इस संवाददाता से खास मुलाकात में श्री खंडेलवाल ने कहा कि मप्र में कोई व्यक्ति या जातीय समीकरण महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि पार्टी का जनाधार ही महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि अब तक के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने प्रदेश में किसी एक नेता को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया। मेरी राय में ऐसा किया भी नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीतने के लिए पार्टी के जनाधार के अलावा यह महत्व रखेगा कि जीतने की क्षमता वाले प्रत्याशियों को टिकिट दिए जाएं। श्री खंडेलवाल ने दावा किया कि माहौल भाजपा के पक्ष में नजर आ रहा है, हालांकि चुनाव में अभी सवा साल बाकी है।पार्टी संगठन में बदलाव के बारे में पूछे जाने पर श्री खंडेवाल ने कहा कि युवाओं को आगे लाना एक प्रयोग है। लीक से हटकर नई व्यवस्था बनाने की कोशिश की गई है। पार्टी की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच यह प्रयोग किया गया है। दो अक्टूबर से सदस्यता अभियान शुरू होगा, इसके बाद संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी। संगठन चुनाव ही कसौटी होंगे कि प्रयोग सफल रहा या असफल।मप्र में युवा नेत्रत्व के बजाय अनुभव को तरजीह दी जाने को उचित ठहाते हुए श्री खंडेलवाल ने कहा कि युवाओं को आगे लाने का मतलब अनुभवी नेताओं को घर बैठा देना नहीं हो सकता। मप्र भाजपा अध्यक्ष कैलाश जोशी की टीम में अपेक्षाक्रत युवा लोगों को जगह मिली है।श्री खंडेलवाल ने सवालों के जवाब में कहा कि गांव चलो अभियान के दौरान उन्होंने पाया कि आतंकवाद के मामले मंे देशवासियों के धैर्य की सीमाएं टूट चुकी हैं और अब वक्त आ गया है कि भारत को पाकिस्तान में चल रहे ट्रेनिंग कैंप तबाह कर देना चाहिए। भाजपा इस बारे में शिव सेना की राय से पूरी तरह सहमत है। पार्टी जनता की इस भावना से केंद्र सरकार को अवगत कराएगी। लोग अब आतंकवाद को मुह तोड जबाव देने के बयान सुनने के बजाय एक्शन चाहते हैं। भारत पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी ट्रेनिंग कैंपों को नष्ट करने जैसा सख्त कदम उठाए तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस कदम का विरोध नहीं करेगा, क्योंकि दुनिया पाकिस्तान की करतूतों को अनदेखा नहीं कर सकती है। शिवसेना सुप्रीमो की एनडीए सरकार से समर्थन वापसी की धमकी पर श्री खंडेलवाल ने कहा कि सरकार में रहना न रहना शिवसेना का अपना मामला है, इसके लिए वह स्वतंत्र है।जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में संघ समर्थित मोर्चा और भाजपा के आमने सामने आने के मामले में भाजपा उपाध्यक्ष ने कहा कि मोर्चा राज्य को दो नए राज्यों तथा एक केंद्र शासित प्रदेश में बांटने का पक्षधर है। जबकि भाजपा इससे सहमत नहीं है। इस असहमति के बावजूद चुनाव में मोर्चे और भाजपा ने मिलकर ही चुनाव लडा है, पार्टी को चुनाव में कोई नुकसान नहीं होगा।राम मंदिर, समान नागरिक कानून और धारा 370 के मुददे पीछे धकेल दिए जाने के सवाल पर श्री खंडेलवाल ने कहा कि प्राथमिक मुददे समय के साथ बदल जाते हैं। एनडीए के एजेंडे से सरकार चल रही है। लेकिन भाजा के एजेंडे में भी अब सबसे उपर सरकार का परफार्मेंस तथा विश्व में भारत की प्रतिष्ठा है। भाजपा ने तीनों मुददे छोडे नहीं हैं लेकिन वे अब प्राथमिक मुददे नहीं हैं। इनके बिना भी 1996 में भाजपा को सर्वाधिक सीटें मिलीं। पार्टी के गांव चलो अभियान के बारे में श्री खंडेलवाल ने बताया कि कार्यकर्ता देश के दो लाख गांवों में पहुंचकर केंद्र सरकार की योजनाओं का जायजा लेंगे। फीड बैक सरकार को दिया जाएगा। पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा आयोजन पहली बार कर रही है, हालांकि मप्र, हरयाणा और उडीसा में अलग अलग नामों से इसी तरह के अभियान चलाए जा चुके हैं। मप्र में 88-89 में ग्राम राज अभियान चलाया गया था। हरयाणा, उडीसा में गांव राज अभियान तथा उप्र में एक रात गांव में अभियान चल चुके हैं। इनसे भाजपा का गांवों में जनाधार बढा है। अर्से तक मप्र में पार्टी की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे खंडेलवाल ने बताया कि संगठन को उनकी जरूरत उन राज्यों में ज्यादा है, जहां पार्टी का फैलाव कम है। वे अभी उडीसा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों के प्रभारी हैं। अगले माह पूर्वोत्तर का दूसरा दौरा शुरू करेंगे।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

बिग बास यानी उतरन......

हर विदेशी टीवी रियलिटी शो को भारतीय चैनल्स में बतौर उतरन पेश करने की श्रंखला मं इन दिनों अपने कौन बनेगा करोडपति प्रथम और द्वितीय वाले बच्चन बाबू उर्फ बिग बी का बिग बॉस त्रतीय शुरू हो गया है। रंगारंग शुरूआत में खुद अमिताभ बच्चन और उनके परम भक्त कामिडियन राजू श्रीवास्तव ही सही मायने में सेलेब्रिटी थे। कलर्स के हर सीरियल के आखिर में इमोशनल ड्रामे पर ब्रेक लगते ही उस सीरियल के सब कलाकार बिग बास को देखने की गुहार कई दिनों से लगा रहे थे। अखबारों में 13 प्रतिभागियों के धुंधले फोटो वाले विज्ञापन में रहस्य दिखाया जा रहा था, मानो लोग इनके नाम जानने के लिए मरे जा रहे हों। खैर जब नाम सामने आए तो कोई अचरज शायद ही किसी को हुआ होगा। क्योंकि यह सभी जानते हैं कि कोई भी व्यस्त और वाकई सेलेब्रिटी 90 दिन इस कार्यक्रम में क्यों उलझेगा भला? तो इस शो में जो 13 लोग आए उनमें चैंकाने वाला कोई नाम नहीं है। बीते जमाने की हीरोइन अरे वही तीस साल पहले त्रिशूल में सचिन, अरे तेंदुलकर नहीं वो प्रमोद महाजन के कुपुत्र के साथ बच्चों के चुटकुलों वाले शो के जज बनकर बैठे रहते हैं, के साथ गपूची गपूची गम गम... वाला गाना गाते हुए बंबईया फिल्मों, राज जिन्ना ठाकरे के लिए मुंबईया फिल्मों में, आई थीं। अर्थात पून ढिल्लो, जो इन दिनों कुकरी शोज तक में आ रही थीं, इक्का दुक्का सीरियल्स में भी दिखीं थीं। खैर इन 13 प्रतिभागियों में राखी सावंत की मां भी हैं, और पर्याप्त कुख्यात हो चुके संगीतकार ईस्माइल दरबार भी हैं। जितने भी लोग इसमें हैं, उनमें राजू श्रीवास्तव ही वास्तव में सेलिब्रिटी कहे जा सकते हैं, वे शायद इस कार्यक्रम को अपनी दम पर चला ले जाएं। लेकिन बच्चन बाबू का यह नया अवतार शायद ही कौन बनेगा करोडपति वाली सफलता हासिल कर पाए। काहे से कि रीयल पर ऐसा ही एक शो पहले से ही चल रहा है अपने गाडरवारा वाले आशुतोष नीखरा अर्थात आशुतोष राणा के सरकारत्व में सरकार की दुनिया। उसकी टीआरपी तो नहीं मालूम लेकिन उसकी चर्चा लोगों की बातचीत में सुनाई नहीं देती। कंपनियां कुछ भी कहें टीआरपी के बारे में लेकिन अपने हिसाब से तो टीआरपी उसकी ज्यादा जिसकी चर्चा घर, आफिस, पार्टी, शादी ब्याह इत्यादि समारोहों में बसों, ट्रेनों में होने लगे। फिलहाल कलर्स के लाडो और बालिका वधू और भाग्य विधाता की चर्चा गाहे बगाहे सुनाई देती हे, अर्थात यही कार्यक्रम ज्यादा सफल हैं। तो हमारे कहने का मतलब ये कि बिग बास द्वितीय के प्रतिभागी बिग बास प्रथम के मुकाबले कमजोर हैं, बस अकेले बच्चन बाबू और गजोधर अर्थात राजू श्रीवास्तव ही इसकी नैया पार लगाने की कोशिश करेंगे। अगली पोस्ट में हम बात करेंगे एकता कपूर की.......

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

शरद के चांद पर बादलों का साया है

शरद के चांद पर आज बादलों का साया है,

दिन खुशगवार था रात पर भी नशा सा छाया है।

ये कौन मेरे दिल पे अपना नक्श गया है छोडकर,

हर सिम्त हर जर्रे में उसका ही सरमाया है।

अब यहां रिश्तों में न रही पहले सी हरारत,

हर शख्स दूसरों से और अपने आप से घबराया है।

चल बेबाक गुम हो जाएं अपनी ही बेखुदी में,

यहां कौन किसके गम को समझ पाया है।

शरद के चांद पर बादलों का सरमाया है।।

- सतीश एलिया बेबाक

भोपाल शरद पूर्णिमा 2009