सोमवार, 21 सितंबर 2009

दिग्विजय उवाच-देवी का भंडार भरा रहे, लोग पी-पी कर पड़े रहें

यह आशीष वचन दस साल मप्र के मुख्यमंत्री रहे (उमा भारती के शब्दों में मिस्टर बंटाढार) और अब कांग्रेस के सबसे ज्यादा प्रभावशाली महासचिव दिग्विजय सिंह ने नवरात्र के दूसरे दिन रविवार को इंदौर के एक मॉल में पब का शुभारंभ करते हुए व्यक्त किए। खुद को महात्मा गांधी की धरोहर और विरासत की झंडाबरदार मानने वाली कांग्रेस के इस चतुर महासचिव ने कांग्रेस के विधायक और अन्य कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में यह भी कहा समय बदल रहा है, पहले मयखाने होते थे, फिर लोग ठेके पर जाकर पीने लगे, अब पब आ गए हैं। अपने चमचों के बीच राजा साब और दिग्गी राजा के नाम से मशहूर दिग्विजय सिंह ने पब के उदघाटन में फीता ही नहीं काटा बल्कि बीयर के जाम सर्व किए। हालांकि दिग्विजय सिंह को करीब से जानने वालों की मानें तो वे खुद पीने वालों की कतार में शामिल नहीं हैं। भाजपा के नेताओं ने दिग्विजय के इस बयान पर उन्हें जमकर कोसा है। लेकिन इंदौर शहर में ही बीते साल भाजपा के महासचिव प्रकाश जावडेकर बकायदा शैंपेन के जाम उड़ाते वीडियो में रिकार्ड किए गए थे। हालांकि दूसरों को कोसने में राजनीतिक दल पीछे नहीं रहते लेकिन अपने मामले में वे चुप्पी साधना बेहतर समझते हैं। राजनीतिक दलों और नेताओं की कथनी, करनी, विचार और अमल में जो फर्क है, उसे लेकर शायद ही किसी को कोई शक हो। दिग्विजय सिंह ने नवरात्र में पब का उदघाटन कर पीने का प्रचार किया तो, हिंदुत्ववादी विचारधारा से ओतप्रोत संगठन आरएसएस के आंगन में बतौर नेता विकसित हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नवरात्र के पहले दिन और रमजान के समापन से दो दिन पूर्व रोजा अफ्तार का आयोजन किया। सरकारी कार्यक्रमों में भूमिपूजन, शिलान्यास, दीप प्रज्ज्वलन, नारियल फोडऩे जैसे कार्र्यों का विरोध करने वाले किसी भी शख्स या संगठन ने सरकारी खर्चे पर रोजा अफ्तारी का विरोध नहीं किया। इस आयोजन में भी चंद लोगों को छोड़कर ज्यादातर वे लोग थे जिनका इबादत से कोई लेना देना नहीं होता। इसमें इस्लाम के अनुआईयों से ज्यादा भाजपा कार्यकर्ता, नेता, अफसर और पत्रकार थे। इस हुजूम में वे लोग भी थे जिनका अपराध की दुनिया में खासा नाम है। इधर नवरात्र पर्व में जगह जगह श्रद्धा भक्ति की गंगा बह रही है, तो कई जगह फिल्मी गानों और धुनों पर देर रात नाचने और हंगामे का भी दौर जारी है। उपवास का अर्थ होता है, ईश्वर की आराधना में शांत चित्त होकर बैठना। अर्थात हम सामान्य दिनों में जिस तरह का भोजन, चिंतन, कामकाज, मनोरंजन आदि करते हैं, उससे अलग केवल आराधना में वह भी शांत और दत्त चित्त होकर लीन हों। राजनीति, धर्म, मनोरंजन और मौजमस्ती के इस घालमेल भरे आयोजनों ने आराधना के पर्र्वों रमजान और नवरात्र की गरिमा को एक अर्थ में कम करने कोशिश की है। लेकिन इस सबसे परे ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो रमजान में और नवरात्र में वाकई ईश आराधना में वक्त लगाते हैं। यह पर्व ऐसे आस्थावान लोगों के कारण ही हजारों सालों से न केवल बरकरार हैं, बल्कि उनका प्रभाव पूरे वातावरण में व्याप्त भी है।

3 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

मुझे यह सब बहुत बुरे लगते है, इन के बारे सिर्फ़ गालिया ही निकलती है जो मै देना नही चाहता.
आप ने बहुत सुंदर लेख लिखा.
धन्यवाद

प्रवीण एलिया ने कहा…

Sab rotiya senk rahe hai paisa kama rahe hai. unka to paisa our Powar hi bhagwan hai. Ies bare mai Sock kar to samay Barbad karna hai.

RepublicSense.com ने कहा…

A very good piece indeed. Congratulations.