रविवार, 8 दिसंबर 2019

पाेर्नोग्राफी पर सर्जिकल स्ट्राइक क्यों नहीं करती सरकार -सतीश एलिया


                                                                                                                                                                                                                       देश को झकझोर देने वाले दिल्ली के निर्भया कांड केे सख्त कानून बनाने की देश की मंशा को सरकार ने पूरा कर दिया और नाबालिग की परिभाषा भी बदल दी जा चुकी। इसके बावजूद निर्भया कांड की ही तरह बर्बर और जघन्यतम अपराधों की संख्या घटने के बजाए बढ़ ही रही है। अब तक निर्भया के गुनहगारों को फांसी की सजा पर अमल नहीं हो पाया है। हैदराबाद में डा. प्रियंका रेड्डी के साथ भी उतना ही जघन्य अपराध हुआ है और एक बार फिर पूरा देश गम और गुस्से में उबल रहा है । गुनहगारों को सरेआम फांसी देने सब तरफ से उठ रही है। क्या आम क्या खास सब यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिरी ऐसे सख्त कानून का क्या फायदा जो सजा देने में बरसों लगा दे और उस पर अमल की कोई सूरत नजर आती हो। रेप के गुनहगारों को फांसी की सजा की खबर पढ़़ और सुनकर लोग अब यह कहने लगे हैं कि आखिर इन पर अमल कब होगा? हैदराबाद की सड़कों पर गु़नहगारों को खुद सजा देने के लिए उमड़ी भीड़ लोगों का भरोसा उठने का प्रतीक ही कहा जाएगा। निर्भया और डा. प्रियंका रेड्डी से हुए गुनाह के बीच सैकड़ों ऐसे ही मामले सामने आए हैं, एनसीआरबी के ताजे आंकड़े बताते हैं कि हर राज्य में ज्यादती के मामले बढ़ रहे हैं। निर्भया कांड के बाद मंदसौर में एक सात साल की मासूम से हुई दरिंदगी की वारदात ने भी पूरे देश को ऐसे ही उद्वेलित किया था। लेकिन इसकेे बाद ऐसी घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं।  मंदसौर के बाद सतना, भोपाल और जगह जगह लगभग हर दिन दुष्कृत्यों की खबरें कैंडल मार्च, सियासत, फांसी की सजा का एेलान और पकड़े गए दुराचारियों पर पुलिस की थर्ड डिग्री के वायरल वीडियोज के बावजूद यह वारदात थम नहीं रहीं। आखिर क्यों? इस सवाल के कई प्रमुख कारणों में से एक पर न सियासत और न ही समाज सुधारक मंचोंऔर न ही मीडिया में ज्यादा चर्चा हो रही है। यह विष्ाय है वासना को आत्मघ्ााती बना रहा नंगेपन का कारोबार। मुफ्त डॉटा के बोनांजा की हर दिन नई सेल के इस दौर में विश्व व्यापी यौन दृश्यों का कारोबार यानी पोर्नोग्राफी भारत में लगभग हर मोबाइल धारक के मोबाइल पर नॉक कर रहा है। भारत के इंटरनेट यूजर्स दुनिया के उन टॉप टेन देशों में शुमार हैँ जो मोबाइल का ज्यादातर उपयोग पोर्नोग्राफी देखने में करते हैं। भारतीय सामग्री भी वहां लगातार बढ़ रही है। हालात कितने खतरनाक हो चुके हें, यह इसी बात से पता चलता है कि हैदराबाद में प्रियंका रेड्डी की यौनाचार के बाद जघन्य घटना के सामने आने के बाद तीन दिन में 80 लाख लोगों ने पोर्न साइट्स पर हैदराबाद गैंगरैप को सर्च किया। यानी लोग इस जघन्य कांड में गैंगरैप का वीडियो देखना चाह रहे थे। यह हमारे समाज में मानसिक जहर और उससे होने वाले ऐसे जघन्य अपराधों के गहरे पैठने  का सबूत है। अपराध करने और उसका वीडियो बनाकर उसे बेचने और सार्वजनिक करने का यह घिनाैना अपराध और कारोबार जारी है और सरकार कुछ नहीं कर रही।                                                              इंटरनेट के संजाल ने पूरी दुनिया में ज्ञान और सूचना के आदान प्रदान को न केवल आसान बनाया है बल्कि यह रोजमर्रा के कामकाज में भी प्रभावीशाली परिवर्तन का माध्यम भी बना है। कारोबार को तो मानो पंख ही लग गए हैं। पूरी दुनिया में ऑनलाइन कारोबार लगातार बढ़ रहा है। भारत में भी यह एक बड़ा बाजार और कारोबार के गेमचेंजर के रूम में सामने आया है। इसका दूसरा पहलू उतना ही भयावह है। इंटरनेट पर तीस से पैंतीस फीसदी सामग्री पोर्नोग्राफी है। फ्री डाटा और ओपन एसेस ने 10 रुपए में मोबाइल रिचार्ज करवा सकने वालों तक के दिमाग में यह पोर्नोग्राफिक गंदगी घुस रही है। कुछ अर्से पहले मैक्स हॉस्पिटल के एक सर्वे में पाया गया था कि भारत महानगरों के 47 फीसदी विद्यार्थी आपस में पोर्न की बात करते हैं। लेकिन इस सर्वे से आगे की भयावह हकीकत यह है कि सुदूर गांव-देहात में रहने वाले मजदूर और अति गरीब तबके तक यह इंटरनेट प्रेषित जहर फैल चुका है। आए दिन यौन अपराध के वीडियो अपलोड किए जाने और अपलोड किए जाने की धमकी देकर दुष्कृत्यों की खबरें आम हो चुकी हैं। वीडियो अपलोड करने के लिए खुलेआम छेड़छाड़ की वारदात की संख्या बढ़ती जा रही है। किस प्रदेश में ऐसे अपराधों की दर्ज संख्या और वहां किस दल की सरकार है, इस पर सियासत भी बढ़ रही है, लेकिन इसे रोकने को लेेकर सही मायने में काेई चिंतित नजर नहीं आ रहा है। यह भयावह है।

सवाल ये है कि मासूम बच्चियों से दुष्कृत्य करने वालों को फांसी की सजा मुकर्रर करने के बावजूद इसकी जड़ पर लगाम लगाने में सरकारें क्यों कुछ नहीं कर रही हैं? एनडीए के पहले कार्यकाल यानी वाजपेयी सरकार के वक्त तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुष्ामा स्वराज ने पोर्नोग्राफी परोसने वाले विदेशी चैनल बंद करवा दिए थे। उन्होंने इंटरनेट पर इस कारोबार को रोकने की भी मुहिम शुरू की थी लेकिन आजादी गैंग को यह निजता के अधिकार का उल्लंघन लगा था। यूपीए की सरकार के दो कार्यकाल में पोर्नोग्राफी पर लगाम लगने के बजाय यह बढ़ती गई और वर्तमान एनडीए-टू में यह कई गुना बढ़ चुकी है, क्योंकि अब इस विष बेल के परवान चढ़ने के लिए वन जीबी डॉॅटा फ्री जैसे प्लान हर मोबाइल कंपनी के पास हैं और बाजार में 500 रुपए के स्मार्ट फोन भी हाजिर हैं। कुछ भी वर्जित नहीं। इंदौर हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसले में 850 पोर्न बेवसाइट्स पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था लेकिन यह न हो सका, क्योंकि आजादी गैंग ने इसे संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 के खिलाफ बताया। केंद्र की सरकार ने कुछ पोर्न साइटस को बैन किया भी लेकिन 99 फीसदी कंटेंट उपलब्ध है। डिजिटल इंडिया के सपने का यह बेहद बदसूरत चेहरा है कि देश में सबको दो वक्त की रोटी मिले न मिले मुफ्त डाटा के जरिए नंगापन भरपूर उपलब्ध है। केंद्र सरकारों इस मामले को लेकर रवैया बेहद
चिंताजनक है।
मासूमों से सामूहिक दुराचार की दिल को चीरकर रख देने वाली वारदातों के बीच हमारे समाज की यह सर्व स्वीकार्यता भी बेहद घातक प्रवत्ति है कि हमारे यहां पोर्न स्टार सनी लियोनी भी फिल्मों की नायिका बन जाती है और चल भी पड़ती है। वीरे की वेडिंग जैसी फूहड़, शर्मनाक और गलीज फिल्में भी करोड़ों की कमाई करती हैं, ये सब आजादी के नाम पर बन, चल और बिक रहा है। हम इस तरह के कारोबार को चलने देने और दुराचार के खिलाफ एक ही तरीेके से मोमबत्ती मार्च निकालने वाला समाज बन गए हैं। क्या किसी एक घटना पर आक्रोश जताने के बाद फिर किसी ऐसी घटना पर फिर ऐसा ही प्रदर्शन करते जाना और जड़ की तरफ से आंखें फेर लेना बतौर समाज हमें आत्म निंदा की तरफ नहीं धकेल रहा है। यह सब एक दिन में नहीं हो गया है। बीते करीब डेढ़ दशक में यह लगातार पसरता गया है। एक प्रदेश की विधानसभा में सदन के अंदर माननीय विधायकों का मोबाइल पर पोर्न दर्शन भी यह देश नहीं भूला है। उनके निलंबन की खबरें भी सुर्खियां बनी थीं। दुराचार की घटनाओं की लगातार आ रही खबराें के बीच जरूरत इस बात की है कि न केवल पोर्न साइटस को पूरी तरह बैन किया जाए बल्कि खुलेआम फलफूल रहे नशे के कारोबार पर लगाम लगाई जाए। सोश्यल मीडिया के नाम पर पोर्नोग्राफी की साझेदारी और अफवाहें फैलाने के नेटवर्क को तोड़ना भी बहुत जरूरी है। क्योंकि जघन्य अपराधों को किसी जाति विशेष या मजहब विशेष से जोड़कर ऐसे पापाचार पर लगाम के बजाय समाज को तोड़ने में भी इस्तेमाल हो रहा है और यह सब कुछ आजादी के नाम पर। बाकी देश और सरकाराें को भी सोचना होगा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर यह सब कैसे चलने दिया जा सकता है?आखिर किसकी आजादी? ऐसी आजादी से क्या मिल रहा है? सरकार अगर सीमापार से आने वाले आतंक को मिटाने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के शौर्य का बखान कर जनता का भारी समर्थन हासिल कर रही  है तो उसे पोर्नोग्राफी और नशे के कारोबार पर भी इसी तरह सर्जिकल स्ट्राइक की हिम्मत दिखाने होगी, यह संभव है और जो इसका विरोध करेंगे वे एक बार फिर बेनकाब होंगे, उन्हें अलग-थलग करना ही होगा। वर्ना शक्तिशाली भारत, विकसित राष्ट्र भारत,स्वामी विवेकानंद के सपनों का भारत बनाने और फिर विश्व गुरू बनने की बातें जुमले से ज्यादा कुछ नहीं मानी जाएंगी। उम्मीद की जाना चाहिए कि सरकार अब इस सर्जिकल स्ट्राइक की तैयारी कर एक दिन ऐलान करेगी, क्या ऐसा होगा?



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