मंगलवार, 3 नवंबर 2009

कॉमन वैल्थ नहीं कॉमन गुलामी है ये ...

बीते तीन दिन से एक तस्वीर मेरी आंखों में अटकी है और खटक रही है, फांस सी चुभ रही है। नि:संदेह और भी हजारों लोगों को यह चित्र चुभा होगा। मैं बात कर रहा हूं उस तस्वीर की जिसमें ब्रिटेन की महारानी भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को कॉमनवैल्थ खेलों की मशाल सौंप रही हैं। इन खेलों के लिए दिल्ली में अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं और निर्माण कार्य जारी है। लेकिन कॉमनवैल्थ गेम्स हैं क्या? उन देशों के समूह है कॉमनवैल्थ जो अंग्रेजी साम्राज्यवाद के गुलाम रहे हैं। इनमें से भारत ने लाखों शहीदों की शहादत के बाद इस साम्राज्यवादी जुए को उतार फैंका। बाकी देशों को संघर्ष से या ब्रिटेन के कमजोर करने के कारण आजादी मिली। इन भूतपूर्व गुलाम देशों ने गुलामी को बरकरार रखने के लिए कॉमनवैल्थ बना लिया जो दरअसल कॉमन गुलामी है। गुट निरपेक्ष आंदोलन, आसियान, दक्षेस, सार्क जैसे संगठन तो समझ में आते हैं और उनमें भारत की प्रमुखता भी भली लग सकती है, लेकिन ये कॉमन वैल्थ, उफ। ओलिंपिक, एशियाड समेत अनेक अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन हैं, जिनकी मेजबानी की दावेदारी भारत को करना चाहिए, अगर स्वतंत्र और ताकतवर देश के रूप में दुनिया में स्थापित होना है तो। लेकिन दुनियाभर में लोकतंत्र आने के बाद एक लोकतंात्रिक देश की प्रमुख एक साम्राज्ञी से सगर्व मशाल ग्रहण करें और इस मौके पर सारे खेल सितारे हाजिर हों तो दुख होता है। आखिर 23 साल की उम्र में भगत सिंह क्यों फांसी चढ़ गए, क्यों चंद्रशेखर आजाद खुद को गोली मारकर शहीद हो गए। गांधी जी ने किसलिए संघर्ष किया। क्योंंकि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज खड़ी की और देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए आहूति दे दी। लाखों अनाम शहीदों की कुर्बानी क्या, कॉमनवैल्थ की मशाल लेकर गर्व करने के लिए थी। मेरे प्यारे हमवतनों मुझे लगता है, इस संगठन और इस खेल आयोजन का आधार हमारी गुलामी का अतीत है, हमें उससे उबरने की जरूरत है। मनमोहन सरकार इस बात को समझे न समझे लेकिन देश के लोगों को तो समझना ही होगी। जय हिंद।

8 टिप्‍पणियां:

MANOJ JOSHI ने कहा…

Bat akele commonwealth game ki nahi he. Gulami ke aise kai pratik hamare aaspas moujud hen. Jan gan man kyon aur kis ke liye likha gaya aur hum ne use kya manyata di? yeh bhi sab jante hen. Hamare desh ka name Bharatvarsh se India ho gaya.Gahrai se vichar karenge to aur bhi chijen mil jayengi.Aaj to halat yah he ki desh ki pahchan kayam karne wale pratikon, vicharon aur paramparon ko bachane aur apnane ki bat karo to aap pichade thahra diye jate hen. SACHHAI YAH HE KE AAJADI PANE KE BBAD HUMNE USE BARKRAR RAKHNE KE LIYE KOI PRAYAS NAHI KIYA. GULAMI KI MANSIKTA IS KADAR HAWI HE KI HUME KOI BHI DESI VICHAR AUR CHIJ KHOTI NAZAR AATI HE. HAMARI AANKHON PAR PASHIMI CHASHMA CHADA HUA HE.

बेनामी ने कहा…

This sporting extravaganza is nothing but another excuse to mint money . In size and volume it surpasses all other mammoth scams . Strangely, it is being projected as equivalent to Asian or Olympic games , but in West it has no significance.

अजित गुप्ता का कोना ने कहा…

अंग्रेजों ने भारत को कैसे लूटा, इसी बात को साझा करते हुए मैंने अपनी पोस्‍ट लिखी है अंग्रेजी खूनी पंजे। विषय भी अदा जी ने कॉमन वेल्‍थ गेम और राष्‍ट्रपति की यात्रा से ही प्रारम्‍भ किया था। दो दिन पहले प्रथम कड़ी पोस्‍ट की थी और आज दूसरी पोस्‍ट की है। इसे अवश्‍य मेरे ब्‍लाग पर पढ़े।

प्रवीण एलिया ने कहा…

hum gulami nahi chhod pa rahe hai. commenwealth hi nahi kai chij hai jinhe hum nahi chhod pa rahe hai.

अनुनाद सिंह ने कहा…

सही विचारा है आपने। यदि हममे स्वाभिमान होता तो हम "कामनवेल्थ" जैसे शब्द से घृणा करते। लेकिन यहाँ तो सब कुछ उल्टा-पुल्टा है। जो जितनी तेजी से पूँछ हिलाता है उतना ही आगे पहुँच जाता है।

रंजन ने कहा…

कुछ साल पहले ignou से एक कोर्स कर रहा था.. youth and development पर.. commonwealth प्रायोजित था.. तम मैनें परिभाषित किया था... ’इन देशों में common ये है इनकी wealth अंग्रेजों ने लुटी है"

आपसे सहमत..

बेनामी ने कहा…

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kishore ghildiyal ने कहा…

sahi hain janaab
jyotishkishore.blogspot.com