सोमवार, 14 जून 2010

गडे मुर्दे ही तय करते हैं राजनीति की दिशा

राजनीति में मुर्दे सबसे ज्यादा काम की चीज होते हैं। गडे हुए मुर्दे उखाडे जाते हैं और वे ही राजनीति के भविष्य की दिशा तक तय करते हैं। यकीन नहीं हो रहा मेरी बात को तो भोपाल गैस मानव संहार के मामले को ही ले लीजिए। एक जमाने में इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी के निकटतम सिपहसालार अर्जुन सिंह के मामले को ही बतौर नजीर लीजिए। गैस हादसे के वक्त उनकी भूमिका के मुर्दे न केवल उखडे। हैं बल्कि वे अखबारों, विवाद पिपासु न्यूज चैनलों, राजनीतिक गलियारों, दफतरों में तांडव कर रहे हैं। प्रणव मुखर्जी से लेकर सत्यव्रत चतुर्वेदी तक और मोइली से लेकर पचौरी तक सब अर्जुन सिंह को ललकार रहे हैं। अर्जुन के पुराने शिष्य दिग्विजय सिंह भी इस मामले में निशाने पर आ गए हैं, क्योंकि वे मुर्दों की बोली को अनसुना कर गुरू ऋण उतारने की चेष्टा कर रहे थे। राजनीति या प्रशासन का महज ककहरा जानने वाला भी यह नहीं मान सकता कि अर्जुन सिंह जैसा चतुर सुजान ओर घनघोर चंट राजनेता बिना तत्कालीन कांग्रेस हाईकमान की सहमति के वारेन एंडरसन को सुरक्षित भोपाल से दिल्ली भेजता। जाहिर है राजीव गांधी की सहमति के बिना वारेन बाहर नहीं गया था। लेकिन अर्जुन और सोनिया दोनों ही मौन हैं, मुखर हैं तो सोनिया को प्रसन्न करने की कोशिश में और जबरिया वानप्रस्थ में धकेल दिए गए अर्जुन सिंह से बेपरवाह बिना जनाधार वाले नेता। कांग्रेस की गुटबाजी और कलह इस मामले में कहां खत्म होगी, कहा नहीं जा सकता। हो सकता है अर्जुन सिंह का मौन टूटे या फिर बोफोर्स मामले की वजह से सालों मौन रहीं और राजनीति में आने से कतराती रहीं सोनिया ही मौन तोडें। कांग्रेस की चिंता कांग्रेस करे और विपक्ष इस मुददे पर कितना क्या लाभ ले सकता है, यह वह जाने। कटघरे में तो जनता का विश्वास और लोकतंत्र की जिम्मेदारी तथा मर्यादा है। आखिर सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद से लेकर तिलक, गोखले, गांधी किस आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे? हमारे देश के नेता मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, जनता को सामूहिक नरसंहार के मुहं में झौंक देने के षडयंत्र में शाामिल होंगे और नरसंहार के जिम्मेदारों को बचाएंगे, यह दिन देखने के लिए आजादी के दीवानों ने संघर्ष किया था? अर्जुन सिंह दो दफा मप्र के मुख्यमंत्री रहे और कई दफा केंद्रीय मंत्री, सदन के नेता और राज्यपाल भी रहे उन्होंने सत्यनिष्ठा की शपथ दर्जनों बार ली होगी? क्या उन्हें वह शपथ नहीं कचोट रही है, उनका मौन बडा ही खतरनाक है और देश में लोकतंत्र पर सवालिया निशान की तरह है। जिस भोपाल शहर में उनके नाम पर अर्जुन नगर, बेटे के नाम पर राहुल नगर, पत्नी के नाम पर बिटटन मार्केट है, अपनी केरवां कोठी है। सी टाइप का सरकारी बंगला सी 19 है, जिसके नाम का भी भोपाल में कभी जलाल हुआ करता था, उसी शहर के 15 हजार लोगों की मौत एक रात में होने के मामले में वे अब मौन ही रहना चाहते हैं। बाबरी ढांचा गिरने के बाद फूट फूटकर रोना क्या स्वांग नहीं था? भारतीय परंपरा के अध्ययन को भगवाकरण नाम देकर राजनीति में शब्दों को उनकी पहचान से विलग कर अपमानित करने में माहिर अर्जुन सिंह को 26 बरस से जारी मौत के मामले में मौन तोड.कर भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में सच्चाई की एक मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए? कांग्रेस की राजनीति में वे हाशिए पर पड़े हैं, बेटे की भी लगभग नगण्य हैसियत है, बेटी को टिकिट दिला नहीं पाए, जीवन की सांझ में अपनी अंतरात्मा को जाग्रत कर वे सच सामने रखें, शायद उनका मामला भविष्य में प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों से लेकर सरपंचों तक में सच की अलख जगा जाए। क्या ऐसा करेंगे अर्जुन?

1 टिप्पणी:

Vidhu ने कहा…

कटघरे में तो जनता का विश्वास और लोकतंत्र की जिम्मेदारी तथा मर्यादा है। आखिर सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद से लेकर तिलक, गोखले, गांधी किस आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे
आप की बात सही है