कहावतें इतनी ठोक और बजकर स्थापित होती हैं, कि उनके लेखक को लेकर कभी विवाद नहीं होता और नहीं उनका प्रमोशन करना पडता। जैसा कि तीन में से एक इडियट को ज्यादा बाकी को केवल हाथ भर लगाने लायक करना पड रहा है। शुक्रवार को यह साबित हो गया कि तीन इडियट वे नहीं जो पोस्टरों मंे या हर टीवी चैनल में प्रोमो में दिख रहे हैं, उनमें से एक ही असल तीन में शामिल हैं, बाकी तो प्रेस कान्फरेंस में विधु विनोद चोपडा और राजकुमार हिरानी ने भी साबित कर दिया कि हम भी इसी असल नाम और पहचान वाले हैं। गांधीगिरी पर फिल्म बनाकर वाहवाही लूट चुके विनोद और हीरानी ने बता दिया कि गांधीगिरी फिल्म तक ही सीमित है, यानी दूसरों को सीख देने के लिए हम तो बदतमीजी करेंगे। धन कमाने के मूल उददेश्य से चलने वाले विषय तलाशने में माहिर यह धंधेबाज ये कैसे समझ सकते हैं कि दूसरों की जिज्ञासाएं पूरी करना वह भी प्रेस कानफरेंस में उनकी न केवल जिम्मेदारी है, भले वे स्टार हों कि नेब्युला। अगर आप ने चेतन भगत की किताब को चुराया नहीं है तो यह बात शांति से भी बताई जा सकती थी, लेकिन यहां फिर कहावत हमारी मदद को हाजिर है चोर की दाडी में तिनका। अब पत्रकार तिनके की तरफ इशारा करेंगे तो भला आमिर, राजकुमार और विधु विनोद झल्लाएं नहीं क्या! आखिर फिल्म का नाम भी तो थ्री इडियटस है भाई। फिल्म चूंकि हिट हो चुकी है और इसमें मीडिया की भी मेहरबानी है तो ये तीनों अब इस मेहरबानी को और क्यों झेलें तो बोल दिया शटअप। नेता भी तो यही करते हैं अपना काम बनता भाड में जाए जनता। वर्ना कौन नहीं जानता कि बच्चों के लिए तारे जमीन पर बनाने वाले आमिर खान अपने बीबी बच्चों को छोडकर दूसरी शादी कर चुके हैं और टूटे हुए परिवार के दर्द पर कभी फिल्म कभी नहीं बनाना चाहेंगे, कोई अपने गिरेबां में झांकता है भला। रही बात फिल्म वालों की बदतमीजी की तो उसमें सन्नी देवल से लेकर सलमान खान तक कौन शामिल नहीं है। अब मीडिया वाले भी इस में किसी से कहां पीछे हैं, जार्ज डब्ल्यु बुश और चिदंबरम से पूछिए पत्रकारों के बारे में उनकी दिली राय क्या है। फिर भी सार्वजनिक जीवन में वह चाहे फिल्म, राजनीति, साहित्य, पत्रकारिता कोई क्षेत्र क्यों न हो सहिष्णुता होनी ही चाहिए, आखिर हमारे भारत की हजारों साल की तहजीब के बचे रहने का यही इकलौता बडा कारण है, वर्ना मिस्त्र, रोम और न जाने कितनी सभ्यताएं जमींदोज हो चुकी है। आमिर, हीरानी और उनके मुखिया विधु विनोद चोपडा के बारे में अपनी बात में एक कहावत से ही खत्म करता हूं कि ...तियों के अलग से गांव नहीं बसते, न ही उनके चार कान और छह हाथ ही होते हैं, वे हमारे आपके बीच में ही मौजूद रहते हैं, हम उनके साथ ही रहना है बकौल कवि कुल तिलक गोस्वामी तुलसीदास जी- तुलसी या संसार में भांति भांति के लोग सब संग हिल मिल चालिए, नदी नाव संजोग। इसका एक देसी तर्जुमा भी दिलजलों ने बनाया हुआ है, उसे में यहां नहीं बताउंगा समझदार तो समझ ही जाएंगे, बाकी सबक ये है कि ईडियटयस थ्री नहीं अनंत हैं। फिर भी फिल्म देखने लायक है, चेतन भगत साहब की थीम पर बनी है, यह अगर सच है तो उन्हें धन्यवाद। उन्हीं के मुताबिक अंग्रेजी वाले तो यह बात पहले से ही जानते हैं अब हिंदी वालों को भी जानना चाहिए, लेकिन चेतन भगतजी अंग्रेजी में लिखकर आप महान हो जरूर गए हैं लेकिन ईडियटगिरी से बचना है तो अपनी भाषा में सोचने और लिखने की जहमत उठाइए फिर देखिए कि इस देश की माटी की महक अपनी भाषा में कैसे रंग लाती है। आमीन!
शनिवार, 2 जनवरी 2010
थ्री नहीं, मैनी मोर हैं वे तो भैया
कहावतें इतनी ठोक और बजकर स्थापित होती हैं, कि उनके लेखक को लेकर कभी विवाद नहीं होता और नहीं उनका प्रमोशन करना पडता। जैसा कि तीन में से एक इडियट को ज्यादा बाकी को केवल हाथ भर लगाने लायक करना पड रहा है। शुक्रवार को यह साबित हो गया कि तीन इडियट वे नहीं जो पोस्टरों मंे या हर टीवी चैनल में प्रोमो में दिख रहे हैं, उनमें से एक ही असल तीन में शामिल हैं, बाकी तो प्रेस कान्फरेंस में विधु विनोद चोपडा और राजकुमार हिरानी ने भी साबित कर दिया कि हम भी इसी असल नाम और पहचान वाले हैं। गांधीगिरी पर फिल्म बनाकर वाहवाही लूट चुके विनोद और हीरानी ने बता दिया कि गांधीगिरी फिल्म तक ही सीमित है, यानी दूसरों को सीख देने के लिए हम तो बदतमीजी करेंगे। धन कमाने के मूल उददेश्य से चलने वाले विषय तलाशने में माहिर यह धंधेबाज ये कैसे समझ सकते हैं कि दूसरों की जिज्ञासाएं पूरी करना वह भी प्रेस कानफरेंस में उनकी न केवल जिम्मेदारी है, भले वे स्टार हों कि नेब्युला। अगर आप ने चेतन भगत की किताब को चुराया नहीं है तो यह बात शांति से भी बताई जा सकती थी, लेकिन यहां फिर कहावत हमारी मदद को हाजिर है चोर की दाडी में तिनका। अब पत्रकार तिनके की तरफ इशारा करेंगे तो भला आमिर, राजकुमार और विधु विनोद झल्लाएं नहीं क्या! आखिर फिल्म का नाम भी तो थ्री इडियटस है भाई। फिल्म चूंकि हिट हो चुकी है और इसमें मीडिया की भी मेहरबानी है तो ये तीनों अब इस मेहरबानी को और क्यों झेलें तो बोल दिया शटअप। नेता भी तो यही करते हैं अपना काम बनता भाड में जाए जनता। वर्ना कौन नहीं जानता कि बच्चों के लिए तारे जमीन पर बनाने वाले आमिर खान अपने बीबी बच्चों को छोडकर दूसरी शादी कर चुके हैं और टूटे हुए परिवार के दर्द पर कभी फिल्म कभी नहीं बनाना चाहेंगे, कोई अपने गिरेबां में झांकता है भला। रही बात फिल्म वालों की बदतमीजी की तो उसमें सन्नी देवल से लेकर सलमान खान तक कौन शामिल नहीं है। अब मीडिया वाले भी इस में किसी से कहां पीछे हैं, जार्ज डब्ल्यु बुश और चिदंबरम से पूछिए पत्रकारों के बारे में उनकी दिली राय क्या है। फिर भी सार्वजनिक जीवन में वह चाहे फिल्म, राजनीति, साहित्य, पत्रकारिता कोई क्षेत्र क्यों न हो सहिष्णुता होनी ही चाहिए, आखिर हमारे भारत की हजारों साल की तहजीब के बचे रहने का यही इकलौता बडा कारण है, वर्ना मिस्त्र, रोम और न जाने कितनी सभ्यताएं जमींदोज हो चुकी है। आमिर, हीरानी और उनके मुखिया विधु विनोद चोपडा के बारे में अपनी बात में एक कहावत से ही खत्म करता हूं कि ...तियों के अलग से गांव नहीं बसते, न ही उनके चार कान और छह हाथ ही होते हैं, वे हमारे आपके बीच में ही मौजूद रहते हैं, हम उनके साथ ही रहना है बकौल कवि कुल तिलक गोस्वामी तुलसीदास जी- तुलसी या संसार में भांति भांति के लोग सब संग हिल मिल चालिए, नदी नाव संजोग। इसका एक देसी तर्जुमा भी दिलजलों ने बनाया हुआ है, उसे में यहां नहीं बताउंगा समझदार तो समझ ही जाएंगे, बाकी सबक ये है कि ईडियटयस थ्री नहीं अनंत हैं। फिर भी फिल्म देखने लायक है, चेतन भगत साहब की थीम पर बनी है, यह अगर सच है तो उन्हें धन्यवाद। उन्हीं के मुताबिक अंग्रेजी वाले तो यह बात पहले से ही जानते हैं अब हिंदी वालों को भी जानना चाहिए, लेकिन चेतन भगतजी अंग्रेजी में लिखकर आप महान हो जरूर गए हैं लेकिन ईडियटगिरी से बचना है तो अपनी भाषा में सोचने और लिखने की जहमत उठाइए फिर देखिए कि इस देश की माटी की महक अपनी भाषा में कैसे रंग लाती है। आमीन!
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1 टिप्पणी:
भगत जी अपनी भाषा मे लिखते तो अच्छा था, अब चिल्लाने से क्या फायदा जब सब कुछ हो चुका है, फिक्चर तो अपनी भाषा मे बन चुकी है, चोपडा जी एवं हिरानी जी तो पैसा बना चुके है
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