शनिवार, 1 अगस्त 2009

भाभी जी की तबियत अब कैसी है!

यह सवाल शुक्रवार को मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से उनके चैंबर में आधा दर्जन संवाददाताओं ने समवेत स्वर में पूछा, इनमें से ज्यादातर टीवी पत्रकार थे। मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वस्त किया कि चिंता की कोई बात नहीं है मिसिज चीफ मिनिस्टर अब बेहतर हैं। दरअसल श्री चौहान दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नक्शे कदम पर चलते हुए केवल बाइट देने टीवी न्यूज चैनल के नुमाइंदों को अचानक बुलवा लेते हैं। जिन अखबारी संवाददाताओं की बीट अर्थात रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मंत्रालय, कैबिनेट मीटिंग, मुख्यमंत्री या भाजपा है, उन्हें बिन बुलाए ही दौडते हांफते बाइटकरण में दो काॅलम खबर बीनना पडती है। हालांकि हर बार जब तक वे पहुंचते हैं, पर्याप्त बाइटीकरण हो चुकता है, मुख्यमंत्री मामले को खत्म कर चाय डयू रही कह रहे होते हैं। प्रिंट वालों को चैनल वालों और पीआरओ से पूछ पाछकर काम चलाना पडता है। खैर मेरा मकसद यहां खानों मंे बंटे मीडिया जगत पर तपसरा करना या मीडिया को खानों में बांटने की कोशिश का नहीं है। मेरा सवाल है प्रदेश में पांच मेडिकल काॅलेजों के अस्पताल हैं, इसके अलावा इंदौर में बांबे हास्पिटल, अपोलो अस्पताल, चोइथराम अस्पताल के अलावा राजधानी भोपाल में दर्जनों निजी और सुविधायुक्त अस्पताल हैं तो फिर क्यों मुख्यमंत्री की पत्नी को इलाज के लिए मुंबई ले जाना पडता है। मुख्यमंत्री को भी जब कभी वायरल होता है तो वे क्यों भोपाल में ही जिला अस्पताल, मेडिकल काॅलेज के अस्पताल के बजाय निजी अस्पताल में भर्ती होते हैं। पिछले दिनों एक प्रिंट पत्रकार ने उनसे यह सवाल पूछ भी लिया था कि आप हमीदिया में क्यों भर्ती नहीं हुए जबकि आपके ही मुताबिक वहां सब स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं। मुख्यमंत्री इस सवाल पर असहज तो हुए ही उन्होंने उचित उत्तर भी नहीं दिया था। इस पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती साधना सिंह की तबियत खराब हुई और उनके परीक्षण भोपाल में निजी लैब में कराने के बाद मुंबई इलाज के लिए ले जाया गया, मुख्यमंत्री के मुताबिक अब वे बेहतर हैं। हालांकि एक दिन पहले ही सरकारी विज्ञप्ति में उनके सफल आपरेशन की बकायदा विज्ञप्ति जारी कर दी गई थी, जो सभी अखबारों में प्रकाशित भी हुई। लेकिन इसके बावजूद मिजाजपुर्सी के लिए मुख्यमंत्री से सवाल किया गया। संकोची स्वभाव के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने तत्काल कैमरे बंद हैं न यह पूछा और बताया कि श्रीमती चौहान को तकलीफ कई दिनों से थी, कभी बताया नहीं। ज्यादा हुई तकलीफ तो मुंबई ले जाकर इलाजा कराना पडा। मुख्यमंत्री का यह नितांत व्यक्तिगत मामला था लेकिन उसे प्रचारित किया गया, मीडिया ने इसे सदभावना प्रश्न के रूप में पूछा और मुख्यमंत्री ने उसी सहजता से उत्तर भी दिया। लेकिन सवाल ये है हर साल स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होने के दावों के बावजूद क्यों हमें अपने प्रियजनों को प्रदेश के बाहर इलाज के लिए ले जाना पडता हैं, लेकिन जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, वे क्या करें? इसका जवाब ये हो सकता है वे अपने प्रियजनों को सरकारी अस्पतालों की मर्जी पर छोड दें और फिर जो भी हो उसे ईश्वर की मर्जी मान कर स्वीकार कर लें। पिछले दिनों गांधी मेडिकल काॅलेज से संबद्ध सुल्तानिया जनाना अस्पताल में 16 घंटे में छह प्रसूताओं की मौत हो गई। मामला विधानसभा में भी उठा लेकिन डाक्टरों को क्लीन चिट दे दी गई। जिनकी मौत हुई वे भी किसी की पत्नी, बहन या बेटी थीं। क्या उनकी असमय मौत के लिए हम ईश्वर को जिम्मेदार मानें? क्योंकि डाक्टरों को तो सरकार ने क्लीन चिट दे दी। सुल्तानिया अस्पताल में जो महानुभाव कभी नहीं गए उनसे निवेदन है कि एक बार वहां जाकर देखें जरूर, तो उन्हें पता लगेगा कि नरक क्या होता है और दुव्र्यवहार किसे कहते हैं? मैं यह बात अनुभव से कह रहा हूं। जिसका कोई अपना असमय मरता है, तकलीफ वही समझ सकता है। पिछले साल जुलाई में ही मेरी अपनी बहन को उसके घर के लोग पता नहीं किस डॉक्टर की सलाह पर आधी रात को सुल्तानिया अस्पताल लेकर पहुंचे थे। उसने स्वस्थ्य बेटे को जन्म दिया था डॉक्टर और स्टाफ की लापरवाही के चलते, बेटे को निजी अस्पाल में दो दिन इंक्यूवेटर में रखना पडा और अंततः चल बसा। मेरी बहन, उसके बच्चों और हम सबको को जो सदमा पहुंचा था, वह एक साल बाद भी ताजा है। हर शख्स ने यहां तक कि सुल्तानिया अस्पताल में ही परिचित निकल आए कुछ कर्मचारियों तक ने बाद में यह कहा कि किसी प्रायवेट अस्पताल में ले जाते तो बच्चा खोना नहीं पडता। यह दर्द किसी एक परिवार का नहीं सैकडों परिवारों का होगा। शिवराज सिंह चौहान खुद को मुख्यमंत्री बाद में और किसान का बेटा, मजदूरों का साथी और प्रदेश की महिलाओं का भैया पहले मानते हैं। मेरा कहना है भैया छह बहनों की मौत क्यों हो जाती है एक ही सरकारी अस्पताल में वह भी 24 घंटे में? भाभी की चिंता भी करो भैया और बहनों की भी चिंता करो। आपकी संवेदनशीलता और जमीन से जुडे होने को लेकर कोई संशय न मुझे है और न ही किसी और को होगा। लेकिन बदलाव हो नहीं रहा है शिवराजजी, बदलावा दिखना चाहिए। कम से कम अस्पताल तो सुधारिए। इस पूरे सिस्टम में भ्रष्टों को बचाने वालों को मत बचने दीजिए। उम्मीद की जाना चाहिए कि ऐसा हो पाएगा। मुख्यमंत्री से सवाल पूछा कर कटसी कम और चेहरा दिखाकर मिजाजपुर्सी करने वाले मेरे पत्रकार भाईयों आप भी क्रपा करके सामान्य वर्ग के लोगों के संदर्भ में सवाल करेंगे तो इस प्रदेश का कुछ तो भला हो ही सकता है।

7 टिप्‍पणियां:

Dipti ने कहा…

बड़े लोगों की जान बहुत क़ीमती होती है। गरीबों का क्या है, वो तो पैदा ही मरने के लिए होते हैं।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

ये सवाल तो कल पूछा गया था.
वैसे भाभी जी की तबियत अब कैसी है?

atul ने कहा…

जो लिखा वो कड़वा सच है.इसे पड़ने की सीएम को कहाँ फुरसत है
वो कमाई में व्यस्त हैं प्रदेश अस्त_व्यस्त है
मिले तो बता देना. की पॉँच साल बाद पड़ेगा हिसाब देना

अतुल ने कहा…

जो लिखा वो कड़वा सच है.इसे पड़ने की सीएम को कहाँ फुरसत है
वो कमाई में व्यस्त हैं प्रदेश अस्त_व्यस्त है
मिले तो बता देना. की पॉँच साल बाद पड़ेगा हिसाब देना

sanjeev persai ने कहा…

एक पत्रकार साथी एक किताब किख रहे हैं
The Art of CHAMCHAGIRI
बहुत लोगों के काम आयेगी
सही बात

Anil Pusadkar ने कहा…

बहुत ही कडुवी सच्चाई सामने रख दी आपने।इन्ही सब हरकतों के कारण प्रेस कान्फ़्रेंस जाने की इच्छा ही नही होती।सालो हो गये।मंत्री तो बहुत बडी चीज है आजकल तो अफ़सरों की भी चमचाई शुरू हो गई है।बाईट तो अब सच मे बाईट करती है।स्वास्थ्य सेवाओं की हालत यंहा तो और बुरी है!कोई माई-बाप नही है आम आदमी का।मुख्यमंत्री की पत्नी भाभीजी और गरीब की लुगाई कोई नही।सगे रिश्तेदार का भी उतने प्यार से कोई हाल-चाल ना पूछे।बहुत सही लिखा आपने।आपकी बेबाकी की तारीफ़ करना ही पड़ेगा।

आशीष्‍ा देवलिया ने कहा…

आज तक पढे आपके सारे लेखों में वो बेबाकी नहीं दिखी जो इस लेख में है । पत्रकारिता को जो मिशन मानते हैं वो सत्‍‍ता प्रतिष्‍ठानों से बैर लेने में भी गुरेज नहीं करते । भले ही आवाज आम आदमी के मुख्‍यमंत्री तक न पहुंचे मगर आम आदमी की तरफ से आपने जो सवाल उठाया है उसे यूं ही नक्‍कारखाने में तूती की आवाज की तरह गुम न होने दें । सूचना के अधिकार से या विधानसभा में किसी सदस्‍य के माध्‍यम से ये सवाल खडा करवाईये कि इलाज सरकारी धन से हुआ या व्‍यक्तिगत धन से । अगर सरकारी धन से हुआ है तो मुख्‍यमंत्री ये साबित करें कि ऐसा इलाज प्रदेश के सरकारी अस्‍पतालों में संभव नहीं था और अगर इलाज संभव नहीं था तो ऐसे इलाज की मुमकिन व्‍यवस्‍था प्रदेश में अब तक क्‍यों नहीं की गयी ।