गुरुवार, 7 मार्च 2019

शौर्य को चुनावी खिलाफत का मुद्दा मत बनाइए

                                                       - सतीश एलिया

लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान भले न हुआ हो लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने चुनाव अभियानों का न केवल आगाज कर दिया है बल्कि इसके लपेटे में देश की सुरक्षा और सैन्य बलों को भी ले लिया है। जो चुनाव राफेल को लेकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के सत्ताधारी दल भाजपा और सरकार पर आरोपों और इसके प्रतिउत्तर में कांग्रेस सरकारों के वक्त में हुए घोटालों के वृतांतों के जिक्र के रूप में हो रहा था, वह पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर पाक पोषित जैश ए मोहम्मद के फिदायीन के आत्मघाती हमले के जघन्य अपराध के बाद बदल गया है। यह कह सकते हैं कि पुलवामा आतंकी हमले में 40 जवानों के शहीद होने के पहले का
िसयासी परिदृश्य इस हमले के बाद 360 डिग्री घूम गया है। अब महागठबंधन की रैलियां नदारद सी हैं और दूसरी तरफ पुलवामा का जैश और पािकस्तान को मुंहतोड़ जबाव जैश के अड्डे बालाकोट पर हमारी एयरफोर्स की एयर स्ट्राइक और उसमें पाकिस्तानी गिरफ्त में आए विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की वापसी के जश्न ने भाजपा को भारी जोश से भर दिया है। भाजपा देश के सेना के प्रति जोश को अपने प्रति जोश में तब्दील कर फिर सत्ता आरोहण का मार्ग प्रशस्त देख रही है। दूसरी तरफ पुलवामा के बाद सर्वदलीय बैठक में सरकार और सेना का पूरी तरह समर्थन करती रही कांग्रेस एयर स्ट्राइक के देश पर असर और इसका भाजपा को िसयासी लाभ मिलने की आशंका से ग्रस्त होकर अब एयर स्ट्राइक पर सवाल उठा रही है। ये सवाल प्रकारांतर से वैसे ही सवाल हैं जो पािकस्तानी फौज, सरकार और वहां के पत्रकार एकतरफा नजरिए से उठा रहे हैं। भाजपा और उसके सहयोगी दलों को इस लिहाज से कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों तथा महागठबंधन की तीसरी ताकत बनने की जुगत में लगे दलों पर बढ़त लेने का मौका मिल गया है। सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्र िवरोधी संग्राम ने तटस्थ होकर तार्किक बातचीत का रास्ता एक तरफ से बंद सा कर दिया है। सरकार से सवाल पूछने में विपक्षी दल संयम से काम नहीं ले पा रहे हैं और नतीजे में वे चूक भी कर रहे हैं, सत्ताधारी दल चूंकि एडवांटेज की स्थिति में है और वे िवपक्षी नेताओं के फाउल पर फिर बैकहैंड स्ट्रोक से उन्हें चुनावी मैदान की आउटर लाइन पर धकेल धकेल दे रहा है। आलम ये है कि पांच साल पहले विकास के नारे पर आई नरेंद्र मोदी सरकार अपने अपने विकास के कारनामे गिना तो रही है लेकिन यह सब बताते वक्त उन उपलब्धियों पर िवपक्षी दलों को आफ्टर पुलवामा बयानों के कारण लानत भेजना िवकास के ऊपर जा रहा है। एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र का चुनाव विकास और वास्तविक मुद्दों के बजाय एक तात्कालिक मुद्दे पर केंदि्रत होता दिख रहा है।
यह सही है कि कश्मीर समस्या आजादी के वक्त जो नेतृत्व था, उसकी दूरदर्शिता में हुई गफलत और एक हद तक अंग्रेजों की बनाई सिचुएशन के मुताबिक चलने की नीति का नतीजा है। तीन घोषित और दो अघोषित युद्ध होने के बावजूद न तो भारत और न ही पाकिस्तान और न ही कश्मीर घाटी की सियासत और न ही विश्व समुदाय की कश्मीर को लेकर िस्थति में कोई बदलाव आया है। करीब साढ़े तीन दशक से सर उठाए पाक पोषित आतंकवाद फिर उफान पर है और पुलवामा के बाद एयर स्ट्राइक के जरिए जबाव दिए जानेके बावजूद इसमें कोई कमी नहीं आई है। कश्मीर घ्ााटी के दल नेशनल कांफ्रेंस और भाजपा से गलबहियां कर सरकार भी चला चुकी पीडीपी भी हुर्रियत की ही तरह पाकिस्तान को भाने वाला तराना गा रहे हैं। धारा 370 को हटाने के नारों से देश में ताकतवर बनी भाजपा पूर्ण बहुमत की पांच साल की सरकार में भी इस धारा या कश्मीर को दिए गए अन्य विशेषाधिकारों को हटाने के बारे में संविधान की स्थिति को बदलने के बारे में कोई बात नहीं कर सकी। दूसरी तरफ कश्मीरी दल लगभग धमकी की मुद्रा में हैं।
पाकिस्तान में जैश के आतंकवाद ट्रेनिंग सेंटर पर भारतीय वायुसेना की स्ट्राइक में कितने मरे या नहीं मरे इस मुद्दे को लेकर भारत में सेना कोई दावा नहीं कर रही है लेकिन सत्ताधारी दल भाजपा के लोग 300 और 250 आतंकी मारे गए , ऐसे दावे कर चुनावी दंगल में एकतरफा विजेता होने के भाव से अभी से भर गए हैं। दूसरी तरफ पािकस्तानी मीडिया एक ही कौआ मरा और 15 पेड़ गिरे जैसी हास्यापद सूचनाएं प्रसारित कर रहे हैं, पाकिस्तान के क्लाइमेट मिनिस्टर तो संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय वायु सेना द्वारा 15 पेड़ गिराए जाने की िशकायत करने की तैयारी कर रहे हैं। जािहर है पाकिस्तान अपने यहां आतंकी ट्रेनिंग के अड्डे होने की बात क्यों कुबूल करेगा? जाहिर यह भी है कि आतंक की जड़ पर चोट तो हुई है, तभी तो आका भारतीय सीमा में हमले की कोशिश करने आया और जबावी हमले में मुंह की खाई। जैश के लीडर मौलाना मसूद अजहर के संगठन को आतंकी मानने और उसके सिपहसालारों की गिरफ्तारी यह बताती है कि पाकिस्तान भारत के दुनिया भर में बढ़े रसूख से मात खा रहा है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी में बतौर मुख्य अतिथि मौजूदगी को न रुकवा सके पािकस्तान ने इस आयोजन का बहिष्कार कर दिया। इससे पहले 1969 में भारत के मंत्री फखरुद्दीन अली जो बाद में राष्ट्रपति भ्ाी बने, को ओआईसी की बैठक में आने से मना कर दिया गा था, उन्हें रास्ते से ही लौटना पड़ा था, तब पाकिस्तान की चल गई थी लेकिन अब भारत का वक्त है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस समेत सोश्यल मीडिया पर आलोचना और परिहास अब तिरोहित हो गए हैं, अब आम जनता ही कहने लगी है देखा मोदी ऐसे ही विदेशी दौरे नहीं करते थे, पािकस्तान को अलग थलग कर दिया।
चुनावी दहलीज पर खड़ी भारत की सियासत में कांग्रेस नेताओं के बयानों का भी सत्ताधारी दल भाजपा को ही फायदा दिख रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का पुलवामा को दुर्घटना बताने पर प्रधानमंत्री मोदी से लेकर भाजपा के आम कार्यकर्ता तक ने मुद्दा बना लिया है।
जल्द ही चुनाव की तारीखों का ऐलान हो जाएगा, ऐसे मेंं विपक्षी दलों को चाहिए कि वे आतंक पर हमले, एयर स्ट्राइक और फौज के शौर्य से जुड़े किसी मामले पर सवाल न उठाएं बल्कि मोदी सरकार के पांच साल के काम में नुक्स निकालकर उसे मुद्दा बनाएं और अगर एकजुट होकर वाकई कोई महागठबंधन बना सकें तो ही मोदी से मुकाबला किया जा सकता है। यह तो तय है कि 2019 का आम चुनाव विकास से ज्यादा जोश पर लड़ा जाएगा। देखना यह है कि आने वाले दिनों में सरकार कोई चूक करती है या नहीं और विपक्ष एकजुट हो पाता है या नहीं। लेकिन दलों को एक बात तो ध्यान में रखना ही चाहिए कि सेना के शौर्य और देश की सुरक्षा के मामले में सवाल न उठाएं बल्कि एकजुट ही बने रहे हैं, यही श्रेयस्कर है, लेकिन लगता नहीं है कि ऐसा हो पाएगा। 

रविवार, 16 दिसंबर 2018

रोचक: उर्फियत और नाम के साथ खास पहचान वाले विधायकों में 12 फीसदी का इजाफा



- बीती विधानसभा में स्पीकर ने निकनेम हटाने का दिया था मशविरा, सात ने ही अपने नाम के साथ हटाई थी उर्फियत
-2013 में तीन दर्जन जीते थे, इस बार चार दर्जन हुए विजयी, आधा दर्जन ऐसे िवधायक टिकट गवां बैठे या सीट
सतीश एलिया, भोपाल
बीती विधानसभा में उर्फियत वाले 26 विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष डा. सीतासरन शर्मा ने उर्फियत न लिखने का मशविरा दिया था, इसमें उन सभी ने नाराजगी दिखाई थी, इसके बावजूद सात ने अपने नाम के साथ चस्पा निकनेम को हटा िलया था, जबकि 19 ने अपनी इस पहचान को बनाए रखने को अपना हक मानकर इसे हटाने से इंकार कर दिया था। इस चुनाव में उर्फियत, वल्दियत, निकनेम वाले विधायकों की संख्या में 12 फीसदी का इजाफा हो गया है। अब 30 फीसदी विधायक इस खासियत वाले हैं । यह तब है जब ऐसी पहचान वाले करीब एक दर्जन प्रत्याशी हार गए हैं और आधा दर्जन तत्कालीन विधायकों को उनकी पार्टियों ने टिकट ही नहीं दिया था। 
नेताओं की उनके निकनेम, गांव के नाम या पिता के नाम के कारण पहचान नई बात नहीं है। चुनाव जीतने के लिए पिता के यश का लाभ भी मिलता है, इस वजह से कई नेता कभी कभी चुनाव में इसका उपयोग करते रहते हैं। बीती विधानसभा में यह पहली दफा ही हुआ था जब अध्यक्ष डा. सीतासरन शर्मा ने विधायकों से निकनेम से बचने की सलाह दी थी। हालांकि विधायकों ने इसे नाराजी में लिया था, इसके बावजूद सत्ताधारी दल के कई विधायकों ने न चाहते हुए भी निकनेम को विदा कर दिया था। विधानसभा और राज्य सरकार के रिकार्ड में उनके नाम अगले वर्षों में बिना िनकनेम के ही चलते रहे, हालांकि उनमें से ज्यादातर ने इस साल टिकट मिला तो चुनाव में पहले की ही तरह निकनेम का प्रयोग किया। ताजा विधानसभा चुनाव में निकनेम, प्रोफेशन नेम, गांव के नाम और वल्दियत या पति के नाम वाले 63 विधायक चुने गए हैं। यह संख्या पांच पहले की तुलना में 22 ज्यादा है। प्रतिशत में बात करें तो इस मामले में 10 फीसदी का इजाफा हुआ है। 
नाम के साथ निकनेम, पिता, पति, गांव के नाम की पताका
2013 में ये जीते थे    
माया सिंह मामी
केपी सिंह कक्काजू
गोपाल सिंह चौहान डग्गी राजा
भूपेंद्र भैया
इंजी. प्रदीप लारिया
हरवंश सुक्कू भैया
कुं. विक्रम सिंह उर्फ नातीराजा
गुड्डन पाठक पुष्पेंद्रनाथ
अहीर रेखा यादव
राजेंद्र कुमार सिंह दादाभाई
पंडित मुकेश नायक
नीलम अभय मिश्रा
पं. रमाकांत तिवारी
कमलेश्वर इंद्रजीत कुमार
अजय अर्जुन सिंह
संदीप शिवप्रसाद जयसवाल
प्रभात पांडे बड़े बाबू
शरद जैन एडवोकेट
सुशील कुमार तिवारी इंदू भैया
हिना लिखीराम कांवरे
गौरीशंकर चतुर्भुज बिसेन
दिनेश राय मुनमुन
पं.रमेश दुबे
चौधरी चंद्रभान सिंह कुबेर सिंह
हेमंत विजय खंडेलवाल
संजय शाह मकड़ाई
कुंवर हजारीलाल दांगी
राजेंद्र फूलचंद वर्मा
आशीष गोविंद शर्मा
कुंवर विजय शाह
योगिता नवल सिंह बोरकर भाभी
अर्चना िचटनिस दीदी
हितेंद्र ध्यान सिंह सोलंकी
रतन सिंह रावजी आर्य
सुरेंद्र सिंह हनी बघेल
मनोज निर्भय सिंह पटेल
मालिनी लक्ष्मण सिंह गौड़
उषा ठाकुर दीदी
संगीता विजय चारेल
जितेंद्र थावरचंद गहलोत
राजेश यादव धर्मवीर सिंह
2018 में ये जीते 
बनवारीलाल शर्मा जापथाप
संजीव सिंह संजू
मुन्नालाल गोयल मुन्ना भैया
जसमंत जाटव छितरी
सुरेश धाकड़ राठखेड़ा
केपी िसंह कक्काजू
महेंद्र सिंह सिसौदिया संजू भैया
जजपाल सिंह जज्जी
गोपाल सिंह चौहान डग्गी राजा
भूपेंद्र भैया
इंजी.प्रदीप लारिया
तरवर सिंह बंटू भैया
विक्रम सिंह नातीराजा
नीरज विनोद दीक्षित
आलोक चतुर्वेदी पज्जन भैया
कुंवर प्रद्युम्न सिंह लोधी मुन्ना भैया
धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी
पुरुषोत्तम रामकली तंतुवाय
डब्बू सिद्धार्थ सुखलाल कुशवाहा
विक्रम िसंह विक्की
कमलेश्वर इंद्रजीत कुमार
सुभाष रामचरित्र
शिवनारायण िसंह लल्लू भैया
विजय राघवेंद्र िसंह बसंत िसंह
संदीप श्रीप्रसाद जायसवाल
प्रणय प्रभात पांडे गुड्डू भैया
संजय यादव सिवनी टोला 
सुशील कुमार तिवारी इंदू भैया
भूपेंद्र मरावी बबलू
हिना लिखीराम कांवरे
रामकिशोर नानो कावरे
प्रदीप अमृत जायसवाल गुड्डा
टामलाल रघुजी सहारे
दिनेश राय मुनमुन
योगेंद्र िसंह बाबा
नर्मदा प्रसाद प्रजापति एनपी
जालम सिंह पटेल मुन्ना भैया
संजय शर्मा संजू भैया
कमलेश प्रताप शाह
चौधरी विजय मेर सिंह
विजय रेवनाथ चौरे
नीलेश पुसाराम उइके
निलय विनोद डागा
संजय शाह मकड़ाई
प्रेमशंकर कुंजीलाल वर्मा बघवाड़ा 
शशांक श्रीकृष्ण भार्गव
लीना संजय जैन टप्पू
राजश्री रुद्रप्रताप सिंह
िवक्रम सिंह राणा गुड्डु भैया
मनोज नारायण सिंह चौधरी
कुंवर विजय शाह
सुरेंद्र सिंह हनी बघेल
ठाकुर सुुरेंद्र नवल सिंह शेरा भैया
सचिन सुभाषचंद्र यादव
रवि रमेशचंद्र जोशी
केदार सिंह चिड़ाभाई डाबर
मुकेश रावत पटेल
नीना विक्रम वर्मा
राजवर्धन सिंह प्रेमसिंह दत्तीगांव
विशाल जगदीश पटेल
आकाश कैलाश विजयवर्गीय
मालिनी लक्ष्मण सिंह गौड़
 हर्ष विजय गहलोत गुड्डू
राजेंद्र पांडेय राजू भैया
 देवीलाल धाकड़ एडवोकेट
 अनिरुद्ध माधव मारू 

हारे को शिवराज

अब जबकि कमलनाथ की ताजपोशी तय हो चुकी है और कांग्रेस की 15 बरस के वनवास से वापसी  ताजा खबर नहीं रह गई है, 13 बरस और एक महीने मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान इसमें से पूरे 10 साल वे अपने ही नेतृत्व में लड़े गए और पूर्व घोषित सर्व स्वीकृत नेता के तौर पर मप्र सरकार के मुखिया रहे। कांग्रेस से दशमलव एक फीसदी ज्यादा वोट हासिल होने के बावजूद पांच सीटें पीछे रहकर सत्ता गंवाने वाली भाजपा अब शिवराज को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर धन्यवाद यात्रा पर भेजना तय कर चुकी है, शिवराज ने चुनाव हारने की एकमेव जिम्मेदारी लेकर सियासत में अपना कद बरकरार रखा है। संगठन को अब लोकसभा चुनाव की िचंता है, जिसमें बीते चुनाव में मप्र से मिली 27 सीटें बरकरार रखने की बड़ी चुनौती सामने है। हारे को हरिनाम को उन्होंने भाजपा के संदर्भ में वर्तमान चुनावी पराजय को हारे को शिवराज स्वीकार कर जरूर लिया है लेकिन यह जेरे बहस जरूर है कि क्या वाकई ऐसा है? वे अकेले ही इस भरपूर वोट मिलने के बावजूद सत्ता से बेदखली के लिए जिम्मेदार हैं? एक एकांगी व्याख्या ही मानी जाएगी, क्योंकि जिस पार्टी की सरकार में वे तेरह बरस मुख्यमंत्री रहे उसके संगठन में व्यक्ति तो महत्वपूर्ण होता ही नहीं हैं, संगठन ही महत्वपूर्ण होता है, कॉडर बेस पार्टी। तो क्या फिर संगठन फेल हुआ? सीधे नहीं तो व्यक्ति या व्यक्तियों के महत्वपूर्ण होते चले जाने और कॉडर या संगठन का मत नेपथ्य में ध्ाकेल दिए जाने की छूट दे देने के कारण संगठन ही तो जिम्मेदार हुआ न। 
पांच सीटों की कमी से सरकार चली जाने के ही गणित को एक-एक कर उन पांच सीटाें के विश्लेषण में परख्ाा जाए जो पार्टी ने आसानी से खो दीं, तो पहली सीट िवदिशा है जो बीते चुनाव मंे खुद शिवराज ने जीती थी और फिर बुदनी पर कायम रहते हुए विदिशा से इस्तीफा दे दिया था। फिर उन्हीं की मर्जी से उपचुनाव में प्रत्याशी तय हुआ और वह जीता भी लेकिन इस चुनाव में उसी को बदलकर जिसे प्रत्याशी बनाया गया, उसे तो नपाध्यक्ष प्रत्याशी चुनने में भी स्थानीय कार्यकर्ताआें की नाराजगी थी। इसके बावजूद पार्टी के नाम पर जीतकर नपाध्यक्ष बन गए मुकेश टंडन को ही विदिशा से इस बार प्रत्याशी बनाते ही लगभग तय हो गया था िक यह सीट इस दफा भाजपा के हाथ से जाना तय है, वही हुआ। जाहिर है प्रत्याशी चयन में संगठन की नहीं चली। दूसरी सीट की बात करें तो जबलपुर में जिस सीट से पूर्व भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष धीरज पटैरिया टिकट मांग रहे थे और नहीं मिलने पर बागी हुए, वह भाजपा को खोना पड़ी और पटैरिया को पार्टी की हार से कहीं ज्यादा वोट मिले, यानी यह सी भी जीती जा सकती थी। पथरिया और दमोह दोनों सीटें बागी होने को मजबूर हुए पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया को नहीं मनाने के कारण गवां दी गईं। सुरखी की सीट विधायक का टिकट काटने और छतरपुर और मलहरा सीटें एक विधायक का ट्रांसफर कर दूसरी विधायक का टिकट काटने के चलते गईं। यानी यह नहीं हुआ होता तो भाजपा आसानी से बहुमत के आंकड़ें पर होती। 
अब अगर भाजपा के उत्थानकाल के नायकाें में से एक और पराजित हुए मंत्री बजरंग दल के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक जयभान सिंह पवैया की बात पर गौर करें तो ग्वालियर में पवैया, अनूप मिश्रा वाली सीटें भी जीती जा सकती थीं। पवैया ही नहीं 2003 में 175 सीटों का प्रचंड बहुमत लाने वाली भाजपा का नेतृत्व कर चुकीं पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की टिप्पणी पर भी गौर करने की जरूरत है। वे बुंदेलखंड में विकास के जमीन पर उतरने में रह गई कमी को निराशा भरे ढंग से देख रही हैं। मालवा-निमाड़ की कलह कथा में उषा ठाकुर के कैलाश विजयवगीय के संदर्भ में संवाद और हार के बाद अर्चना चिटनिस की सभा में नंदू भैया मुर्दाबाद के क्षेपक महज क्षेपक ही नहीं पार्टी संगठन के लिए सबक हो सकते हैँ। याद कीजिए पार्टी के उस अंतिम वास्तविक संगठन चुनाव को जिसमें प्रदेश अध्यक्ष पद पर शिवराज सिंह चौहान विक्रम वर्मा से हार गए थे, और नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सर्वाधिक धाकड़ साबित हुए विक्रम वर्मा 1998 का चुनाव पार्टी की भितरघात के चलते हार गए, उनकी तरह कई हारे और भारी बगावत भी हुई थी, भाजपा का बन चुका छाया मंत्रिमंडल छाया ही बना रहा और दिग्विजय सिंह को पांच साल का एक और कार्यकाल बतौर मुख्यमंत्री मिला था। तब पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा भी दरकिनार कर दिए गए थे। जनता की मर्जी को पराजित कर देने वाली आंतरिक कलह की वह छाया बाद में प्रदेश भाजपा का मुख्य मार्ग बन गई और प्रकारांतर से इस बार नए सिरे से नई कलह के रूप में सामने आकर हार का एक कारण बनी। सत्ताच्युत होने के बाद अब वह फिर मुखरित हो रही है। 
इस चुनाव में शिकस्त के बावजूद भाजपा को यह संतोष राहत दे सकता है कि उसका वोट बैंक अब भी कांग्रेस से ज्यादा है। विंध्य में पार्टी को मिली बढ़त इस बात का प्रतीक है, कि एंटी इंकंवैंसी जैसी कोई लहर शिवराज सरकार के खिलाफ पूरे प्रदेश में नहीं थी। हां जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे माई के लाल जुमले या एट्रोसिटी एक्ट संशोधन को लेकर नाराजी ग्वालियर-चंबल समेत अन्य कई क्षेत्रों में अंडर करंट रही वैसे ही िवंध्य में बसपा का वोट बैंक भाजपा की तरफ शिफ्ट होने का फायदा पार्टी को मिला। कांग्रेस के दो बड़े दिग्गज विधानसभा उपाध्यक्ष राजेंद्र कुमार सिंह और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की हार का एक कारण यह भी रहा हो सकता है। 
अब बात लगातार गलतियां दोहराने की गलती की। अर्से से जिन सीटों पर जीतने की भाजपा की कोशिश को भाजपा में ही खारिज करते रहने की कथा जन जन में आम होकर दीवार पर लिखी इबारत की तरह दिखने लगी है, उन सीटोें में  राजधानी भोपाल की जिस उत्तर सीट भी शामिल है, जिसे कभी शिवराज सिंह चौहान ने गोद तक लिया था, उस पर लगातार हार की वजह सिवाय प्रत्याशी चयन के षड्यंत्रों की सफलता और अपनी ही पार्टी को बार बार हराने की मंशा का कामयाब होना नहीं तो और क्या है? अजेय बन गए आरिफ अकील को पहले एक दफ पटखनी दे चुके रमेश शर्मा को टिकट देने में किसे दिक्कत थी? 2013 में आरिफ बेग और इस बार उन रसूल अहमद सिद्दीकी की पुत्री को एक दिन पहले भाजपा में लाकर टिकट देना, जिनकी आरिफ अकील के मुकाबले में जमानत जब्त हो गई थी, क्या दर्शाता है? कांग्रेस को मिली सत्ता उसकी कम समय में भाजपा से बेहतर तैयारी और चुनाव प्रबंधन के साथ ही गुटबाजी पर एक हद तक काबू कर लेने में कामयाबी को माना जा सकता है। कांग्रेस की सरकार बनने के बावजूद चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को मिले मतों की संख्या बता रही है कि जनता ने भाजपा को नहीं हराया। हराया तो संगठन की व्यक्ति केंद्रितता की तरफ अग्रसर होने की प्रवृत्ति से टिकट तय होने और माई के लाल जैसे जुमलों से एक वर्ग की नाराजगी नोटा में दर्ज होने की परिणिति ने। तेरह सीटें ऐसी हैं जिनमें कांग्रेस प्रत्याशी की जीत के मत अंतर से डेढ़ से लेकर आठ गुना तक ज्यादा वोट नोटा बटन पर दबाए गए। इसके बावजूद जीत कांग्रेस की हुई है और प्रदेश अध्यक्ष से अब मुख्यमंत्री बने कमलनाथ को ही ये श्रेय जाता है कि उन्होंने न केवल आठ फीसदी वोट के अंतर को पाटा बल्िक वे गुटीय एकता भी बना पाए और पार्टी को बहुमत से ठीक एक सीट कम तक ला सके। अब उनके सामने 10 िदन में किसानों की कर्जमाफी जैसे भारी बजट खर्च वाला वादा पूरा करने के अलावा सिंिधया समर्थकों की नाराजी दूर करने, लोकसभा चुनाव तक पार्टी का उत्साह बनाए रखने और लगभग बराकर संख्या वाले आक्रामक विपक्ष से जूझने के अलावा जनता की आंकाक्षाओं पर खरा उतरने की भारी चुनौती है।