आज पहली दफा रेडियो पर मोदी जी के मन की बात सुनी, अच्छा लगा। नागपुर के रेल कर्मी की पेंटिंग, हरदा के शौचालय अभियान, रोड सेफ्टी, नार्थ ईस्ट, दीनदयाल ज्योति की बात की। १५ अगस्त के भाषण के लिए सुझाव माँगे। माननीय प्रधानमंत्री जी भ्रष्टाचार पर भी बोलिए, मन की बात में भी और लाल किले की प्राचीर से भी। व्यापमं,ललित गेट समेत हर भ्रष्टाचार पर। किसी को मत बख्शिए। ये धर्मेयुद्ध है, कोई अपना पराया नहीं, कोई अपनी पराई पार्टी नहीं होनी चाहिए। हमारा देश मानव विकास सूचकांक में १९९१ में १३५ वें नंबर पर था, २०१४ में भी वहीं १३५ नंबर पर खड़े हैं, क्यों? जबकि जी में हम ७ वें स्थान पर आ गए हैं। तो किसके जेब में गया विकास? मित्रों लखपतियों. करोड़पतियों की संख्या बढ़ रही है हमारे देश में, गरीब भी बढ़ रहे हैं आबादी व्रद्धि से भी ज्यादा गति से। वजह एक ही है,भ्रष्टाचार। कभी इस पर भी बोलिएगा प्रधानमंत्री जी। वैसे अच्छी लगी आज की आपके मन की बात।
रविवार, 26 जुलाई 2015
गुरुवार, 25 जून 2015
इस व्हाट्सअप गिरी से तो गंवारपन भला
मित्रों, छह महीने पहले मैंने गंवारपन की श्रेणी में मान लिए गए अपने
व्हाट्सएप पर न होने का रोना आपके समक्ष रोया था। जब में यह जलालत न सह
सका और मेरी पत्नी के सौजन्य से मुझे फिर एंड्रायड फोन सुलभ हो गया तो
मैं न न करके व्हाट्स पर आ ही गया। लेकिन अब मेरा दुख नए सिरे से उभर आया
है, वजह है यह व्हाट्स एप की ग्रुपबाजी फूहड़ चुटकुलों, कट पेस्ट के गटर
और भ्रमित करने वाले नकारा पत्रकारों की अफवाहबाजी के रूप में मेरे माथे
पर है। जो कुछ भी नहीं थे, कुछ भी नहीं हैं और कुछ भी हो सकने की जिनमें
तनिक सी भी संभावना नहीं है, वे इस एप के जरिए अच्छे अच्छे पत्रकारों को
नचा रहे हैं। तर्क यह दिया जाता है कि यह सूचना के आदान प्रदान का साधन
तो है। है भाई इससे इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन उस पर दिया क्या जा
रहा है? हर ग्रुप में लगभग वही चुटकुले, वहीं वीडियो, वही स्टिकर। हमारे
एक ग्रुप में तो एक सदस्य ने ऐसा कुछ डाल दिया कि सब शर्मसार हुए। ग्रुप
से रवानगियां हो गर्इं, जिसे लेफ्ट करना कहा जाता है। मुख पुस्तिका की ही
तरह व्हाट्स एप भी हमारे एक पुराने क्राइम रिपोर्टर साथी के जुमले- बंदर
के हाथ में उस्तरा, अब तू मुस्करा। की तरह इस्तेमाल हो रहा है। इधर देश
में आलम ये है कि बात बात में ट्वीट करने वाली एक मादाम ट्वीटर से ेलेकर
फेसबुक और व्हाट्सएप पर जो फेस कर रही हैं, उसके बचाव में विश्व की
सर्वाधिक सदस्यों वाली पार्टी और हिंदुस्तान में तूफानी बहुमत से बनी
सरकार के उतरने के बावजूद उनकी खुद की हिम्मत ट्वीट कर सफाई देने की नहीं
हो रही। तो मित्रों में छह साल पहले ट्वीटर, फेसबुक, ब्लॉक और इसी साल
मार्च में व्हाट्सएप पर आ गया लेकिन मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि
मेरा गंवारापन ही ठीक था, इन आधुनिक संचार माध्यमों से लैस लोगों से तो
घबराहट होने लगी है। मेरे जेहन में लगातार श्री अमिताभ बच्चन अभिनीत और
श्रद्धेय किशोर दा के गाए एक गीत का अंतरा गूंज रहा है- जाने कौन घड़ी में
पड़ गया पढ़े लिखों से पाला...।
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015
शिवराज के श्रम को वोटर का सलाम, अब विकास करो नगर सरकार
- सतीश एलिया
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लोकप्रिय नेतृत्व में चार नगर निगमों के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की तूफानी जीत ने एक बार फिर उन्हें अपराजेय नेता की तरह स्थापित कर दिया है। निकाय चुनाव में शिवराज के गली गली घूमने पर तंज कस रही कांग्रेस की बोलती इन नतीजों ने बंद कर दी है। इंदौर, भोपाल और जबलपुर में भाजपा के महापौर प्रत्याशियों की जीत के विशाल अंतर ने साबित कर दिया है कि कांग्रेस की रूचि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने तक में नहीं है। भोपाल में एक दफा लोकसभा और बीते साल अपने गृह क्षेत्र भोजपुर में विधानसभा चुनाव हारे सुरेश पचौरी के प्रिय पात्र कैलाश मिश्रा की शिवराज के प्रिय मित्र आलोक शर्मा के हाथों 86 हजार से ज्यादा वोटों से शिकस्त और इंदौर में दस साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल से कांग्रेस की बदहाली की इबारत लिख चुके दिग्विजय सिंह की समर्थक अर्चना जायसवाल की भाजपा विधायक मालिनी गौेड़ से करीब ढाई लाख वोटों से हार ने साबित कर दिया है कि कांग्रेस भाजपा से तो लगातार हार ही रही है, उसके अपने खंड खंड बंटे गुटों की भी इसमें बड़ी भूमिका है। ऐसा नहीं है कि भोपाल, इंदौर और जबलपुर में बीते पांच साल से भाजपा के मेयर होने की वजह से जनता की समस्याओं का अंत हो चुका था और वहां एंटी इंकंवेंसी फैक्टर भाजपा के खिलाफ हथियार नहीं बन सकता था। कांग्रेस के आधा दर्जन क्षत्रपों ने पार्टी के प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं को अनुशासनवद्ध और संगठन आधारित भाजपा से पिटने के लिए छोड़ दिया है। यही कांग्रेस कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता पंचायत चुनाव में भाजपा में भारी पड़ रहे हैं, क्योंकि बकौल दिग्विजय सिंह पंचायत चुनाव में टिकट नहीं बंटते। चार नगर निगमों के चुनाव नतीजे भाजपा की संगठनात्मक कुशलता की वजह से तो हैं ही वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता और प्रदेश के विकास पर एक बार फिर मुहर लगने का सबब भी हैं। इतना ही नहीं इस पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के बरकरार रहने की तस्दीक भी हुई है, क्योंकि भाजपा ने जनता को बताया कि केंद्र में मोदी सरकार, प्रदेश में भाजपा सरकार और अब आपके नगर में भी भाजपा सरकार आपकी समस्याओं को खत्म कर देगी। विकास की नई इबारत लिखी जाएगी और मप्र के शहर अब र्स्माट सिटी बन सकेंगे। भाजपा के संगठन और सरकार पर यह महती जिम्मेदारी है कि वे इन वादों को नारों से जमीन पर उतार कर दिखाएं और कांग्रेस के लिए यह सबक है कि अब भी नहीं चेते तो भाजपा के मिशन कांग्रेस मप्र और कांग्रेस रहित भारत को कांग्रेस के नेता ही सफल कर देंगे। जनता ने अपना मेंडेंट और संदेश दे दिया है कि उसे लफ्फाजी नहीं विकास चाहिए, अब बारी केंद्र, राज्य और नगर सरकारों की है कि वे प्रदेश के महानगरों को अच्छा ट्रैफिक सिस्टम, पार्किंग सुविधा, पानी, सड़क और तरतीब से बसी कॉलानियां दें। गलत करने वालों को सजा दें और विकास में सहभागी बनने वाले सभी वर्गों को सुविधाएं हैं। उम्मीद की जाना चाहिए कि जीत के संदेश को सत्ताधारी दल भाजपा सही अर्थ में लेगी और हार के तल्ख संदेश को ग्रहण कर कांग्रेस भी विपक्ष की भूमिका में शिद्दत से उतरेगी।
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लोकप्रिय नेतृत्व में चार नगर निगमों के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की तूफानी जीत ने एक बार फिर उन्हें अपराजेय नेता की तरह स्थापित कर दिया है। निकाय चुनाव में शिवराज के गली गली घूमने पर तंज कस रही कांग्रेस की बोलती इन नतीजों ने बंद कर दी है। इंदौर, भोपाल और जबलपुर में भाजपा के महापौर प्रत्याशियों की जीत के विशाल अंतर ने साबित कर दिया है कि कांग्रेस की रूचि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने तक में नहीं है। भोपाल में एक दफा लोकसभा और बीते साल अपने गृह क्षेत्र भोजपुर में विधानसभा चुनाव हारे सुरेश पचौरी के प्रिय पात्र कैलाश मिश्रा की शिवराज के प्रिय मित्र आलोक शर्मा के हाथों 86 हजार से ज्यादा वोटों से शिकस्त और इंदौर में दस साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल से कांग्रेस की बदहाली की इबारत लिख चुके दिग्विजय सिंह की समर्थक अर्चना जायसवाल की भाजपा विधायक मालिनी गौेड़ से करीब ढाई लाख वोटों से हार ने साबित कर दिया है कि कांग्रेस भाजपा से तो लगातार हार ही रही है, उसके अपने खंड खंड बंटे गुटों की भी इसमें बड़ी भूमिका है। ऐसा नहीं है कि भोपाल, इंदौर और जबलपुर में बीते पांच साल से भाजपा के मेयर होने की वजह से जनता की समस्याओं का अंत हो चुका था और वहां एंटी इंकंवेंसी फैक्टर भाजपा के खिलाफ हथियार नहीं बन सकता था। कांग्रेस के आधा दर्जन क्षत्रपों ने पार्टी के प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं को अनुशासनवद्ध और संगठन आधारित भाजपा से पिटने के लिए छोड़ दिया है। यही कांग्रेस कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता पंचायत चुनाव में भाजपा में भारी पड़ रहे हैं, क्योंकि बकौल दिग्विजय सिंह पंचायत चुनाव में टिकट नहीं बंटते। चार नगर निगमों के चुनाव नतीजे भाजपा की संगठनात्मक कुशलता की वजह से तो हैं ही वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता और प्रदेश के विकास पर एक बार फिर मुहर लगने का सबब भी हैं। इतना ही नहीं इस पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के बरकरार रहने की तस्दीक भी हुई है, क्योंकि भाजपा ने जनता को बताया कि केंद्र में मोदी सरकार, प्रदेश में भाजपा सरकार और अब आपके नगर में भी भाजपा सरकार आपकी समस्याओं को खत्म कर देगी। विकास की नई इबारत लिखी जाएगी और मप्र के शहर अब र्स्माट सिटी बन सकेंगे। भाजपा के संगठन और सरकार पर यह महती जिम्मेदारी है कि वे इन वादों को नारों से जमीन पर उतार कर दिखाएं और कांग्रेस के लिए यह सबक है कि अब भी नहीं चेते तो भाजपा के मिशन कांग्रेस मप्र और कांग्रेस रहित भारत को कांग्रेस के नेता ही सफल कर देंगे। जनता ने अपना मेंडेंट और संदेश दे दिया है कि उसे लफ्फाजी नहीं विकास चाहिए, अब बारी केंद्र, राज्य और नगर सरकारों की है कि वे प्रदेश के महानगरों को अच्छा ट्रैफिक सिस्टम, पार्किंग सुविधा, पानी, सड़क और तरतीब से बसी कॉलानियां दें। गलत करने वालों को सजा दें और विकास में सहभागी बनने वाले सभी वर्गों को सुविधाएं हैं। उम्मीद की जाना चाहिए कि जीत के संदेश को सत्ताधारी दल भाजपा सही अर्थ में लेगी और हार के तल्ख संदेश को ग्रहण कर कांग्रेस भी विपक्ष की भूमिका में शिद्दत से उतरेगी।
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