शनिवार, 19 मार्च 2011

राजा भोज और भोपाली रंग

पैदाइशी भोपाली वो भी बर्रूकाट खानदान
के चश्मो चिराग मियां जुम्मन ने जब से होश
संभाला है बिला नागा बड़े तालाब को दिन में
तीन दफा जरूर देखते हैं, कभी भोपाल से बाहर
तशरीफ ले जाना पड़े तो तालाब ख्वाब में नजर
आकर उलाहने देता है म्यां आज कां
रै गए, एक दफा भी दीदार नईं हुए। सो मियां
जुम्मन सन छप्पन से आज तलक छप्पन दफा भी
शहर से बाहर नहीं गए। सन छप्पन में ही
उनकी वो उमर थी, जिसे होश सम्हालना
केते हेंगे, यानी येई कोई आठ दस बरस के
रहे होंगे। तब से ये शेहर मध्येपरदेश की
राजधानी भी बना हैगा। खैर शनीचर को
अलसुबह जुम्मन ने रोज की तरह बड़े तालाब के
किनारे तफरीह शुरू की ही थी कि तालाब के
बुर्ज पर रोशन राजा भोज के बुत से
सफ्फाक रोशनी का बगूला सा उठा, मियां
जुम्मन की आंखें फटी की फटी रह गईं,
होश गुम होते से मालूम पड़े, आंख खुली तो
देखा रात हो चुकी है, पास में एक रौबदार
चेहरे के मालिक को मुसकराते हुए पाया।
सर पर ताज, गले में मोतियों की मालाएं, कंधे
पर तेग टंगी हुई। मियां जुम्मन ने आंखें मली,
पूछने लगे म्यां कौन हो तुम। अब रौबदार
लेकिन मुलायम लहजा गूंजा जुम्मन उठो, मैं
हूं राजा भोज धारा नगरी का। जुम्मन के
होश कुछ ठिकाने लगे तो वे बोले, अरे
वाह जनाब आपका तो बुत तालाब में अभी
लगाया गया है, हूबहू वही हैं आप, लेकिन बुत
से निकले कैसे, सरकार को पता चला तो फिर
से बुत में भिजवा देगी। परम ज्ञानवान राजा
भोज ने भोले भोपाली मियां जु मन से कहा
मैं अपनी धारा नगरी में प्रजा के हाल जानने
भेष बदलकर निकला करता था। अब जब इस राज्य की
सरकार मेरा इतना गुणगान कर रही है,
तो मुझसे रहा नहीं गया, मैं इस शहर का
भ्रमण करना चाहता हूं, क्या तुम मेरी
सहायता करोगे। जु मन ने खुद को चोंटियां
ली हाथ में दरद हुआ तो समझ गए, ये ख्वाब नईं
बल्के हकीकत हे। बोले- राजासाब अपन तो
पक्के भोपाली हैं, मदद भी पूरी करते हेंगे,
कोई पता पूछे तो ठिकाने पेई छोड़के
आते हेंगे। वैसे आप झां खड़े हो वो तो अब
आपकेई नाम से सड़क केलाएगी, चीफ मिनिसटर
ने के दिया हैगा, जे तालाब भी आपके नाम पर
करने का भी एलान हो चुका है, मगर अपन तो
बड़ा तालाब केते थे, केते हैं, केते रहेंगे।
चलो घुमाए देते हैं भोपाल पूरा, बोलो
नया घूमोगे के पुराना। भोज बोले वत्स, हम
पूरे नगर का भ्रमण कर जनता का हाल जानना
चाहते हैं, नवीन प्राचीन में भेद करना हमारी
नीति नहीं हैं। राजा भोज मियां जु मन के साथ
नगर भ्रमण पर निकले, आईए देखें वे कहां
कहां गए और क्या क्या देखा।
दृश्य एक
करबला के सामने से कटते हुए वे उस सड़क पर
जा पहुंचे, जहां कलेक्ट्रेट है। सड़क खुदी
देखकर राजाभोज चौंके, जु मन से पूछा वत्स,
ताल किनारे के मार्ग की भव्यता के विपरीत चंद ही
कदम दूर इस मार्ग की ऐसी दुर्दशा क्यों? जु मन
बोले- साब ये सवाल तो भोपाल की पब्लिक अर्से से
पूछ रई हे, मगर कोई जवाब कहीं से नईं
आता, आपका बुत तालाब में लगवाने वाले गौर
साब भी नईं देते जवाब। भोज ने अचानक तीक्ष्ण
दुर्गंध महसूस की, बोले वत्स ये दुर्गंध इस भवन की
ओर से आती प्रतीत हो रही है, क्या हुआ
इस भवन में क्या कार्य होता है यहां। जु मन
बोले- सरकार ये कलेक्टरेट हे, ये बदवू
केरोसिन की है, यहां एक किसान ने जमीन का
नामांतरन रिश्वत देने के बाद भी नईं होने पर
मिट्टी का तेल डालकर खुदकुशी कर ली थी, तब से
जिनके दिल पाक साफ होता है, उन्हें तेल की
बदवू और आदमी के जलने की बदवू खुद ब खुद आती
हेगी, बाकी लोग दिन भर यहां रेते हैंगे,
नेता भी गुजरते हेंगे, किसी को नईं आती बदवू।
भोज का चित्त द्रवित हो गया, वे ओर ज्यादा देर
वहां नहीं ठहर सके।

दृश्य दो
जुम्मन के साथ राजा भोज शहर में आगे बढ़े
बढ़ी सी इमारत दिखी तो पूछा वत्स ये कौन सा
भवन है। जुम्मन बोले, जनाब इस तरफ ताजुल
मसाजिद और दूसरी तरफ ये गांधी मेडिकल
कॉलेज है, आइए घुमा लाएं। वे मुडऩा ही
चाहते थे, कि भोज ठिठक गए, ये चीखें कैसी हैं, ये नीचे जाते मार्ग पर लहू कैसा है? जुम्मन ने कहा राजा साब एक दिन इस रस्ते पर पुलिस
की एक गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए थे। कई आदमी
औरतें, बच्चे, स्टूडेंट उससे कुचल मरे।
उस वाकये को तो भौत दिन होगए, जांच का भी
पता नईं चला मगर आप भी खूब हैं, अब तक लहू
और चीखें महसूस कर रए हैं। खैर जुम्मन भोज
को हमीदिया अस्पताल लिवा ले गए। सिहर उठे
भोज, लगभग विलाप की मुद्रा में बोले, वत्स तुम
मुझे कहां नरक में ले आए, लोग विलख रहे
हैं, उनकी कोई सुन नहीं रहा, ये कौन
हैं जो इन विपदाग्रस्त लोगों को पशुओं की
तरह हकाल रहे हैं। जुम्मन बोले-जनाब ये
डॉक्टर, नर्स, बॉर्ड ब्यॉय हैं जो गरीब
मरीजों का इसी तरह इलाज करते हैं। भोज
बोले राज्य सत्ता के कोई अमात्य या गण इस
अव्यवस्था पर विराम नहीं लगा पाते। जु मन ने
आसमान में बिसूरते हुए कहा-अल्ला करे तो
करे, इंसानों के बस की बात तो मुझे नहीं
लगती जनाब।

दृश्य तीन
जुम्मन शहर के पुराने कहे जाने वाले
हिस्से में जाने के बजाय कमला पार्क की ओर
आ गए। भोज ने कहा वत्स ये तो फिर ताल का
किनारा गया, अब हम किस और प्रस्थान कर
रहे हैं। अरे, वत्स ताल के पाल पर ये खनन कार्य
क्यों हो रहा है,क्या ये मेरे ताल को
प्रवाहित करने की युक्ति है? जुम्मन बोले-
अरे नई जनाब, ये तो शहर में सड़कों
को चौड़ा करने की स्कीम है, मगर पूरा
शहर जगह जगह इतना और इतने दिनों से
खुदा पड़ा है कि मुंह निकल पड़ता है या खुदा।
इसके बाद वे पॉलीटेक्रिक चौराहा होते
हुए रोशनपुरा चौराहे पर खुदाई के
दृश्य देखते हुए पहुंचे। यहां से आगे बढ़ते ही
सड़कों के सौंदर्य से भोज अभिभूत से हो गए।
लिंक रोड नंबर एक पर पहुंचते वे बोले- ये
बड़े बड़े आवास, बढिय़ा मार्ग, हरीतिमा, बड़े
बड़े वाहन, क्या हम किसी दूसरे नगर में प्रवेश
कर रहे हैं। जु मन बोले- अरे जनाब ये
नया भोपाल है, ये बंगले मिनिस्टरों के हैं,
ये सड़क एक साल में तीन दफा बन चुकी है, बनाने
वाला भी और बनवाने वाला भी भोत नाम और
नामेवाले लोग हैं।

दृश्य चार
जुम्मन 74 बंगले से बिरला मंदिर होकर
विधानसभा, वल्लभ भवन के रास्ते पर कट लिए।
मंदिर के शिखरों को निहारते हुए भोज
ने पूछा वत्स ये बौद्ध स्तूप सदृश्य भवन क्या है?
जु मन ने गर्व से बताया ये हमारे परदेश की
विधानसभा है, बिल्डिंग बनना शुरू हुई
तो 12 करोड़ लागत तै हुई थी, बनी तो 72
करोड़ लग चुके थे, अवार्ड मिल चुके हे आगा
खां अवार्ड। वल्लभ भवन को देखकर भोज कुछ
कहते, जुम्मन बोले- और ये हे वल्लभ भवन, फिर
सतपुड़ा और विंध्याचल भवन। यहीं से परदेश
की सरकार चलती हेगी, जे सामने झुगिगयां
बनी हैं, पूरे देश में जनाब किसी भी स्टेट
के सेक्रिटिएट के सामने झुगगी नईं हैं, मगर
अपना भोपाल तो भोपाल हे, यहां सब चलता है।

ठंडी सड़क से कटते हुए, 1250 से गुजरते हुए
जुम्मन चार इमली की घाटी चढ़ गए। भोज अब
थक चुके थे, बोले वत्स यह हरा भरा बंगलों से सज्जित कौन सा प्रदेश है। जुम्मन बोले-अरे जनाब भोपाल ही है, कभी इस इलाके
में ईमली का एक बड़ा पेड़ था, सुनसान जगह थी,
चोर यहां आकर माल की हिस्सा बांटी करते
थे, हमने ऐसा अपने बुजुरगों से सुना है। अब
यहां मिनिस्टर, अफसर रहते हैंगे। भोज ने
सड़कें चकाचक और बंगले चमचमाते और चमचमाती
बड़ी बड़ी गाडिय़ां देखीं तो बरबस कह उठे,
वत्स यहां आकर अनुभूति हुई कि यह राज्य
सुसपंन्न है।

दृश्य पांच
जुम्मन अब यहां से मुड़े तो हबीबगंज नाके
पर रेलवे फाटक तक जा पहुंचे, फाटक
बंद देख बोले- जनाब ये फाटक ज्यादातर वक्त
बंद ही रहता है, चलो अंडब्रिज से चलते हैं।
रेलवे अंडरब्रिज की दुर्दशा से गुजरते हुए वे होशंगाबाद रोड पर आ गए। भोज बोले,वत्स ये मार्ग कहां जाता है। जुम्मन बताने लगे
इसे होशंगाबाद रोड कहते हैंगे, कहने
को नेशनल हाइवे है, लेकिन हालत ये हैगी
कि होशंगाबाद तक जाने में जान ही निकलते
निकलते बमुश्किल ही बच पाती हे। भोज ने पूछा
नगर की सीमा समाप्त कब होगी, जु मन बोले-
जनाब ये भोपाल की पूंछ समझो, इसी तरफ
बढ़ता ही जा रिया बढ़ताई जा रिया है।
भोज ने जुम्मन से कहा वत्स, शहर की दूसरी
बस्तियों में भी भ्रमण करना है, क्यों न लौट
चलें। जुम्मन बोला, वापस एक शर्त पर चलेंगे, आप
मुझसे वादा कीजिए, हमारे शहर का नाम
भोजपाल करने पर तुली सरकार क़ो बता
देंगे कि आप इस शहर का नाम नहीं बदलवाना
चाहते। भोज असमंजस में फंस गए। कुछ देर सोचने
के बाद वे अपना निर्णय सुनाना ही चाहते थे कि
जुम्मन को उनकी बेगम ने झिंझोडकर उठा
दिया। अरे,अशरफ के अब्बा दिन चढ़े तक सोते
ही रहोगे या घूमने भी जाओगे। जु मन
बोले-प्रिय तुमने मेरा स्वप्र भंग कर दिया, वे
मुझे वरदान देने ही वाले थे। बेगम चौंक गई
खाबिंद की बोली में इस बदलाव से। बोलीं आज
आपको ये हो गया है, केसी बहकी बहकी
बाते कर रिए हो। जुम्मन उठे और तालाब
की ओर चल पड़े, बुर्ज पर राजभोज की भव्य
प्रतिमा को देखकर इत्मीनान हो गया कि सब कुछ
कल के ही ठिए पर है, कुछ नहीं बदला, वे ख्वाब ही देख रहे थे। आमीन
-बकलम सतीश एलिया

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

नाम बड़ा या काम भोपाल या भोजपाल

अतीत सबको अपनी तरफ खींचता है.वर्तमान और भविष्य से भी ज्यादा इतिहास में दिलचस्पी विकास को बाधित करती है। इतिहास के विद्यार्थी और प्रोफ़ेसर रूचि ज्यादा लें तो ठीक भी है। सरकारें खासकर बीजेपी कि सरकारें अतीत पे जोर देतीं हैं। भोपाल का नाम भोजपाल करने की तैयारी में है शिवराज सरकार। जाहिर है एजेंडा संघ का है। धार के राजा रहे भोज की भोपाल के ताल में नबाबी काल के किले के बुर्ज़ पे स्थापित प्रतिमा का सोमवार को अनावरण होगा। सरकार भारी धन खर्च कर जलसा कर रही है। भोपाल का नाम भोपाल हो या भोजपाल इससे क्या फर्क पड़ता है। केंद्र में ६ साल सरकार में रही बीजेपी ने भारत का दुनिया भर में नाम इण्डिया होने को क्यों नही बदला। जहाँ तक हकीकत की बात है तो भोपाल पडोस के राज्यों की राजधानियों के मुकावले कहाँ है। जयपुर ,अहमदाबाद.बेंगलूर.हैदराबाद सूरत शहरों से तुलना करो तो पिछड़ा है भोपाल। जयपुर में परसों ही मेट्रो रेल के काम का शिलान्यास हुआ। फिर कलकत्ता का नाम इसलिए बदला गया क्योंकि अँगरेज़ कोल्कता को केलकटा कहते थे। तिरुंन्तपुरम को त्रिवेन्द्रम,मुम्बा देवी के नाम पर बसे मुंबई को बॉम्बे कहते थे बेंगुलुरु को बैगलोर कहते थे। हम भी कहने लगे। आजाद होने के सालों बाद भी कहते रहे। जनता के समर्थन से नाम बदले गये और चलने लगे। लेकिन भोपाल को अंग्रेजों ने भोपाल नाम नही दिया। भूपाल या भोजताल या भोजपाल का अपभ्रंश हो सकता है। इस तरह तो उज्जैन का नाम उज्जयिनी ,महेश्वर का महिष्मति , धार का धारा नगरी, लखनऊ का लखनपुर नाम करना होगा। बचपन में स्कूल में कहानी पड़ते थे हम लोग नाम बड़ा या काम। लगता है शिवराज इस कहानी को भूल गये है। इतिहास ये भी है की मध्यप्रदेश जब बना तो जिन राज्यों से मिलकर बना उनमें भोपाल स्टेट भी शामिल है। क्या अपनी पसंद का इतिहास चलाने की मंशा एक दिन मध्यप्रदेश का भी नाम बदलने की चेष्टा नही करने लगेगी।

शनिवार, 15 जनवरी 2011

मप्र सरकार से नत्थी हो गया नत्था

विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की घटनाआंे की ऋंखला को लेकर कांग्रेस और उसकी सरकार को निशाने पर लेती रही भारतीय जनता पार्टी अब किसानों की खुदकुशी के मामले पर ही बैकफुट पर आ गई है। मध्यप्रदेश में एक महीने के दौरान किसानांें की आत्महत्या और इसके प्रयास के आधा दर्जन मामलों ने किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और संघपुत्री भाजपा के किसान हितैषी होने के ढोल की पोल खोल दी है। कर्ज से लदे दो किसानों ने तो मुख्यमंत्री के जिले सीहोर में ही अपनी जान दे दी। कलेक्टर ने एक किसान को तो पागल करार देने की कुचेष्टा की। दमोह में किसान की मौत पर उसे किसान ही मानने से इंकार कर चुकी सरकार को इन दोनों की मामलों में अखबारों ने बेनकाब कर दिया। अपने कुकर्मों से ही मर रहे हैं किसान, यह बयान देकर सरकार की नाकामी पर पर्दा डालने की कोशिश में किसान कल्याण महकमे के मंत्री रामक्रष्ण कुसमरिया भी मुसीबत में फंस गए। उनके अपने जिले दमोह में किसान मर रहे हैं या जीवन खत्म करने की कोशिश में जुट गए हैं। शर्मनाक बात ये है कि पिछले महीने किसानों की जायज मांगों को लेकर अपने ही कुनबे की सरकार का भोपाल में घेराव कर चुके आरएसएस के किसान संगठन भारतीय किसान संगठन के प्रदेश अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी बेतुके बयान से लैस होकर घूम रहे हैं। सरकार के जिन वादों पर किसान आंदोलन उन्होंने खत्म कराया था, वे तो पूरे ही नहीं हुए, शर्माजी ने किसानों की खुदकुशी को पीपली लाइव फिल्म का असर बता डाला। पीपली लाइव फिल्म की शूटिंग मध्यप्रदेश के ही रायसेन जिले में हुई थी, जो मुख्यमंत्री और इन शर्माजी के अपने जिलों के अलावा राजधानी से भी सटा हुआ है। हालत ये है कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार के साथ नत्थी हो गए पीपली लाइव के नत्था से पल्ला झाडने के लिए मीडिया की मदद लेने में जुट गए हैं। आलम ये है कि गुरूवार को रीवा में लगे अंत्योदय मेले में सरकार ने भाजपा अध्यक्ष गडकरी तथा अन्य नेताओं को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया। गडकरी ने प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के मामले में एक शब्द तक नहीं कहा उलटे शिवराज सरकार की जमकर तारीफ कर डाली। इतना ही नहीं यह भी कहा कि मप्र में किसानों को तीन प्रतिशत ब्याज दर पर कर्ज मिल रहा है जबकि मेरे राज्य महाराष्ट्र में 14 प्रतिशत ब्याज दर है। गडकरी को शायद नहीं मालूम कि मप्र में ब्याज दर पांच से घटाकर तीन प्रतिशत करने का आदेश अप्रैल में जारी होने के 9 महीने बाद भी सरकार के ही वित्त विभाग ने सहकारी बैंकों की सब्सिडी दो प्रतिशत बढाने की मंजूरी नहीं दी है। बैंक पांच फीसदी ही ब्याज वसूलेंगे, ऐसा हुआ तो किसान मरते रहेंगे और ऐसा नहीं हुआ तो बैंक मरने लगेंगे, जिन्हें केंद्र सरकार ने वैद्यनाथन कमेटी की सिफारिश पर 2100 करोड रूपए की मदद देकर जिंदा किया गया है। मध्यप्रदेश में जब किसान बदहाल है किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुश्तैनी गांव मंे महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि महाराज रामकथा कह रहे हैं, यजमान हैं मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी, इस आयोजन पर सरकार के खजाने से 10 लाख रूपए खर्च हो रहे हैं।