रविवार, 29 दिसंबर 2019

नागरिकता संशोधन के बहाने उठा विवाद अब जनसंख्या रजिस्टर पर भी घमासान में उलझा

                                               -   सतीश एलिया                                                                                                                                                       लोकसभा और राज्यसभा में पारित विधेयक को राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद कानून बने नागरिकता संशोधन अधिनियम की हिंसक खिलाफत की आंच अब सरकार की सख्ती से मंद भले ही हो रही हो लेकिन इस संशोधन के साथ ही नेशनल रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजनशिप यानी एनआरसी के एक साथ विरोध और दोनों को गडढमडढ कर दिए जाने से उपजा विरोध अब इसमें एनपीआर को भी जोड़ दिए जाने से देश की सियासत में जारी उबाल और बबाल बढ़ता ही जा रहा है। देखा जाए तो सीएए, एनआरसी और एनपीआर में से कोई भी नया नहीं है। नागरिकता कानून जिसमें शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है, उतना ही पुराना है जितना भारत के विभाजन का मामला। नेहरू-लियाकत समझौता भी धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने देश में सुरक्षा और संरक्षा देने के बारे में ही था। कांग्रेस की सरकारों में भी पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए धार्मिक अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता दी ही जाती थी। इसी तरह कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार के वक्त में हुए असम समझौते के बाद एनआरसी उस राज्य में लागू करने की बात शुरू हुई थी। जिसे असम में अभी सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निर्देशन में लागू करने की प्रक्रिया जारी है, जिसका हिंसक और अहिंसक दोनों का तरह का विरोध हुआ है। पूरे देश में एनआरसी लागू नहीं किए जाने के प्रधानमंत्री के सार्वजनिक बयानों के बावजूद इस मामले पर कुहासे की वजह सीएबी पर राज्यसभा मेंं बहस का जबाव देते हुए गृह मंत्री अमित शाह की वो टिप्पणी है जिसमें उन्होंने तैश मे यह कह दिया था कि देश में एनआरसी लागू होकर रहेगी और हम इसे 2024 तक लागू करके रहेंगे। इसी बयान और इसी बयान में नेशनल पापुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर के सियासी विरोध की वजह भी है। विपक्ष खासकर कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर ही भाजपा की मंशा से भयाक्रांत लग रही है।                                     देखा जाए तो एनपीआर लागू करने की बात की शुरूआत अटल सरकार में हुई थी लेकिन इसके बाद की कांग्रेसनीत सरकार ने ही उस पर अमल शुरू किया और यह योजनाएं बनाने के लिए एक आवश्यक कदम है और इसका विरोध अनावश्यक रूप से सीएए, एनआरसी के जारी विरोध के बहाने किया जा रहा है। एनआरसी, एनपीआर और डिटेंशन सेंटर पर बयानबाजी                                                               एनआरसी पर चर्चा और विरोध प्रदर्शनों के बीच डिटेंशन सेंटर्स का मुद्दा भी गरमा गया है। सरकार इस पर बचाव की मुद्रा में भले आ गई हो लेकिन डिटेंशन सेंटर्स की शुरूआत भी असम समझौते के बाद ही कांग्रेस राज में ही हो गई थी। अब सरकार इससे इंकार कर रही है और प्रधानमंत्री झूठ है झूठ है झूठ है कहकर नकार रहे हैं, लेकिन घुसपैठियों को डिटेन करके रखना गलत कैसे हो सकता है। विरोध प्रदर्शनों से बैकफुट पर आई सरकार को इसके सच को पूरी ईमानदारी से बताना चाहिए, ताकि उसी के मुताबिक विपक्षी दल भ्रम फैला रहे हैं, तो उसे दूर करने का काम किसका है? इस बीच मीडिया के अलावा सोशल मीडिया पर इन मामलाें को लेकर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के दौरान के तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिंदबरम से लेकर कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला से लेकर कुछ न्यूज चैनलों के एनआरसी पर पुराने कार्यक्रमों के वीडियो भी जमकर  शेयर किए जा रहे हैं।                          सीएए के विरोध में राज्य सरकारों के प्रदर्शन                                                                                 नागरिकता संशोधन  अधिनियम के खिलाफ कांग्रेसनीत राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों के विरोध प्रदर्शन ने केंद्र राज्य संबंधों और संविधान के व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इन राज्यों की सरकारों ने साफ तौर पर इस संशाेधित कानून को अपने राज्य में लागू करने से न केवल इंकार किया है बल्कि इसके खिलाफ खुद मुख्यमंत्री मैदान में सड़़क पर उतरे हैं। सवाल ये है कि क्या यह विरोध जायज है? क्या यह केंद्र और ऐसी राज्य सरकारों के बीच भविष्य में कोई नए संवैधानिक संकट का कारण नहीं बनेगा?                                                        अरुधंती राय का कूदना                                                                                                                     अपने उपन्यास के लिए बुकर पुरस्कार जीतने के बाद चर्चा मेंं आई भारतीय मूल की अंग्रेजी लेखिका अरुंधती राय भी इस मामले में न केवल कूद पड़ी हैं बल्कि वे हल्के और विचित्र बयानों से एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने एनपीआर के विरोध में लोगों से अपने नाम और पते बताने के लिए जो तरीके बताए हैं, वे हास्यापद तो हैं ही लोगों को भड़काने वाले भी हैं। यह एक तरह से सहिष्णु लोकतंत्र का मजाक उड़ाने जैसा भी है। अरुंधति इसके पहले नक्सलियों और अलगाववादी कश्मीरी नेताओं से जुगलबंदी को लेकर विवादों में रह चुकी हैं।                               कहीं यह विपक्ष का भाजपा के एजेंडे में उलझना तो नहीं                                                                         2014 से भी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा ने अपने दूसरे कार्यकाल में धारा 370 हटाने और अयोध्या में राममंदिर के पक्ष में फैसला आने के बाद शांति कायम रखने के बाद अपना अगला एजेंडा स्पष्ट कर दिया है। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर सरकार के विरोध से विपक्ष को सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा मिलता भले दिख रहा हो लेकिन अयोध्या मामले से ताकतवर बनी भाजपा अब इस मुद्दे के निर्णायक हल के बाद अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए देश के बहुसंख्यकों को अपने पक्ष में ध्रुवीकरण में बनाए रखने की जुगत में तो है ही, सीएए के विरोध को हिंदुत्व के विरोध में पेश करने का कांग्रेस और उसके मित्र दलों ने उसे मौका दे दिया है। एक तरह से जिस तरह भाजपा ने कांग्रेस को सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ जाने को मजबूर करने का एजेंडा सेट कर सफलता हासिल कर सफलता हासिल की अब 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा एक बार फिर कांग्रेस और उसकी युति के दलों को एक बार फिर बैकफुट पर ले जाने के अपने एजेंडे पर पग बढ़ाती दिख रही है। जो कांग्रेस 14 दिसंबर को सरकार की आर्थिक नीतियों और बेरोजगारी के ज्वलंत मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी कर रही थी, जो देश के वास्तविक मुद्दे हैं भी, भाजपा ने उसे तारीख और एजेंडा बदललकर सीएए, एनआरसी,एनपीआर विरोध की तरफ धकेल दिया।  कई मोर्चों पर नाकाम दिख रही सरकार राजनीतिक विरोध के चलते ध्रुवीकरण को खुद के मुफीद बनाने का एक और मौका हासिल करने के रूप में देख रही होगी। भाजपा नेताओं के बयानों और उनके समर्थकों के सोशल मीडिया पर जंग की मुद्रा ठीक वैसे ही है जैसी चुनाव के वक्त में होती है और कांग्रेस और उसके समर्थक बचाव की मुद्रा में जाते दिख रहे हैं।  

मप्र की सियासत में साल 2019 के गुजरते अक्स

कहते हैं वक्त हर बदल रहा होता है, हम उसे कैसे गुजारते हैँं इस पर आने वाले वक्त की बुनियाद बनती चली जाती है। वर्ष 2019 बीत रहा है, वर्ष 2020 की आहट करीब आती जा रही है। दोनों वर्षो के आने और जाने के इस संधिकाल में बीत रहे साल की छवियां और आने वाले वर्ष की उम्मीदों के लेखा जोखा के इस वक्त में अगर हम मध्यप्रदेश के लिहाज से देखें तो प्रदेश के लिए 2019 परिवर्ततनों और उठापटक का तो दौर रहा ही, यह प्राकृतिक से लेकर राजनीतिक उथलपुथल तक का भी साल रहा। सियासत की बात करें तो वर्ष 2018 के आखिर में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और लगातार 15 साल से कायम भाजपा की सत्ता से विदाई होकर इतने ही वर्ष से सत्ता का वनवास झेल रही कांग्रेस का सत्तारोहण हुआ था। नए साल 2019 में मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के सामने अपने सबसे बड़े चुनावी वादे को पूरा करने की चुनौती थी। यानी किसानों के कर्ज माफी के वादे पर अमल का मुख्यमंत्री ने आदेश तो जारी कर दिया था लेकिन यह वादा अमल शुरू होने के बावजूद पूरा होने की तरफ नहीं बढ़ पाया, पूरे साल सरकार और प्रमुख विपक्षी दल केे बीच यही मुद‍दा राजनीतिक घमासान का केंद्र बिंदु बना रहा। भाजपा ने तो इसके खिलाफ कई दफा प्रदेश स्तर पर प्रदर्शन भी किए। इतना नहीं सत्ताधारी दल कांग्रेस में भी किसान कर्ज माफी का वादा पूरा नहीं होने के खिलाफ खींचतान के मामले सामने आते रहे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर कांग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह भी इस मामले को लेकर सरकार की खिंचाई करते रहे। सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद शुरू हुए इस साल के पांचवें महीने यानी मई में हुए लोकसभा चुनाव ने एक बार फिर बाजी पलटते हुए मप्र की 29 में से 28 लोकसभा सीटाें पर विजय भाजपा के खाते में डालकर कांग्रेस की विधानसभा चुनाव की जीत को फीका कर दिया। अकेले मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ अपने पिता की पारंपरिक सीट जीतकर प्रदेश में कांग्रेस का खाता भर खोलने में कामयाब हो सके। गुना से अब तक अपराजेय रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री और मप्र में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया को पहली दफा हार का स्वाद चखना पड़ा। लोकसभा चुनाव के नतीजे ने प्रदेश के मतदाताओं की परिवक्पता का एक बार और प्रमाण दिया कि वे देश के मुद‍दों और राज्य के मुद‍दों पर अलग तरह से सोचकर मतदान करते हैं। इसकी बानगी झाबुआ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में एक बार फिर दिखी। झाबुआ के विधायक गुमान सिंह डामोर के सांसद बनने से हुए उपचुनाव में भाजपा यह सीट हार गई। डामोर ने जिन कांतिलाल भूरिया को रतलाम लोकसभा सीट पर चुनाव में हराया था, वही भूरिया झाबुआ उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी को हराकर विधायक बन गए।                                                              प्रदेश की सियासत में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तनातनी पूरे साल जारी रही। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने स्थानीय निकायों के चुनाव में महापौर और नगरपालिका नगर परिषद अध्यक्षों का सीधा चुनाव बंद कर पार्षदों में से ही मेयर और अध्यक्ष चुनने का फैसला किया। इसके खिलाफ भाजपा ने प्रदेश व्यापी विरोध प्रदर्शन किए और राज्यपाल लालजी टंडन से गुहार लगाई। नतीजा यह हुआ कि नगरीय निकाय चुनावों को लेकर फैसला साल के अंत तक नहीं हो पाया। मेयर और अध्यक्षों कें अप्रत्यक्ष चुनाव के अलावा भोपाल नगर निगम के दो भागों में बंटवारे के मुद‍दे पर भी सत्ताधारी दल कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के बीच तनातनी साल के अंत तक जारी रही।                                                                                                                                          प्रदेश में इस साल मौसम के तेवर कुछ ऐसे रहे कि समूचा प्रदेश इससे हलाकान रहा। प्रदेश में इस साल मानसून में इस सदी की सर्वाधिक वर्षा का रिकार्ड बना। इस भारी बारिश और बाढ़ के हालात ने प्रदेश में फसलों को बुरी तरह से बर्बाद किया और करीब साढ़े चार सौ लोगों को जान गवांना पड़ी, पशुओं की भी बड़ी संख्या में हानि हुई। भारी बारिश ने प्रदेश की लगभग सभी सड़कों को दुर्दशाग्रस्त कर दिया। इनकी मरम्मत को लेकर भी पक्ष विपक्ष के बीच सियासी तकरार के कई मौके आए। बाढ़ और फसल बर्बादी की राहत को लेकर राज्य सरकार केंद्र सरकार के बीच विवाद के हालात बने। केंद्रीय दलों के दौरों के बाद भी राज्य सरकार ने प्रदेश को राहत नहीं दी जाने के आरोप लगाए। पक्ष विपक्ष महात्मा गांधी के 150 वें जन्म वर्ष के मौके पर कार्यक्रमों के आयोजनों को लेकर भी एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे।                                                                             मध्यप्रदेश को इस साल दो पूर्व मुख्यमंत्रियों बाबूलाल गौर और कैलाश जोशी का अवसान झेलना पड़ा। लगातार आठ बार विधायक, दो बार लोकसभा और राज्यसभा के सांसद रहे कैलाश जोशी को मप्र की राजनीति में संत माना जाता था। बाबूलाल गौर भोपाल से लगातार 10 बार विधायक बनने वाले अपराजेय नेता थे। इन दोनों भाजपा नेताओं के अवसरान के अलावा मप्र से राज्यसभा सदस्य रहीं और विदिशा लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष रहीं और विदेश मंत्री रहीं सुषमा स्वराज का भी इस वर्ष असामायिक निधन हो गया। यह मप्र की सियासत के लिए बड़ी क्षति रही।       प्रदेश में इस साल एक स्कैंडल न केवल प्रदेश बल्कि देश भर में मप्र की चर्चा का कारण बना। इंदौर नगर निगम के एक अधिकारी की पुलिस में शिकायत करने के बाद सैक्स वीडियो बनाकर अफसरों, नेताओं को ब्लैकमेल करने वाले एक गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। इसे लेकर वायरल वीडियो, गिरफ्तारी और रहस्योदघाटनों का सिलसिला साल के अंत तक कई बार सामने आता रहा। इसकी आंच कई सियासी नेताओं और आला अफसरों तक पहुंचने की चर्चा होती रही। सरकार ने इस साल मिलावटखोरी के खिलाफ शुद‍ध के लिए युद्ध चलाकर मिलावट को खत्म करने का अभियान जोर शोर से चलाया। इसके बाद इंदौर में एक कारोबारी के खिलाफ चले अभियान के बाद पूरे प्रदेश में भूमाफिया के खिलासफ अभियान भी शुरू किया गया। करीब एक दशक से चर्चित व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाले में इस साल भी कार्रवाईयों ने इस मामले को चर्चा में बनाए रखा। साल के अंत मकें तीन नई एफआईआर ने मामले को फिर सरगर्म बना दिया।                                  इधर नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदेश की सरकार और सत्ताधारी दल कांग्रेस की केंद्र सरकार से सीधी तकरार की स्थिति ने नए सियासी टकराव को पैदा कर दिया। खुद मुख्मंत्री कमलनाथ ने इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई की। इस बीच कमलनाथ सरकार को समर्थन दे रही बहुजन समाज पार्टी की विधायक राम बाई ने नागरिकता संशोधन कानून और इस कानून को लेकर भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री का खुला समर्थन कर देने से साल के अंत में नई सियासी हलचल सामने आई है। बसपा प्रमुख मायावती ने रामबाई को पार्टी से निलंबित कर दिया। साल के आखिरी महीने में हुआ विधानसभा का शीतकालीन सत्र पक्ष विपक्ष के बीच तनातनी के कारण खासा गर्म रहा और समय के पहले ही सत्रावसान हो गया। छह दिन के लिए बुलाए गए सत्र का समापन चार दिन में ही हो गया, जिसमें पांच विधेयक बिना चर्चा के ही पारित कर लिए गए। इस साल एक घटनाक्रम भाजपा विधायक प्रहलाद लोधी को एक आपराधिक मामले में सजा होने पर उनकी सदस्यता खत्म कर दिए जाने और फिर उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने पर सदस्यता बहाल करद दी जाने को लेकर हुआ। यह घटनाक्रम मप्र विधानसभा के लिहाज से अभूतपूर्व था। प्रदेश में गुजरता साल 2019 अपने आखिरी दिनों में भीषण शीतलहर की चपेट में बीत रहा है, उम्मीद की जाना चाहिए कि नया साल 2020 प्रदेश में मौसम के खुशनुमा होने और प्रदेश के विकास की दिशा में उल्लेखनीय बनकर आएगा।                                                      

रविवार, 8 दिसंबर 2019

पाेर्नोग्राफी पर सर्जिकल स्ट्राइक क्यों नहीं करती सरकार -सतीश एलिया


                                                                                                                                                                                                                       देश को झकझोर देने वाले दिल्ली के निर्भया कांड केे सख्त कानून बनाने की देश की मंशा को सरकार ने पूरा कर दिया और नाबालिग की परिभाषा भी बदल दी जा चुकी। इसके बावजूद निर्भया कांड की ही तरह बर्बर और जघन्यतम अपराधों की संख्या घटने के बजाए बढ़ ही रही है। अब तक निर्भया के गुनहगारों को फांसी की सजा पर अमल नहीं हो पाया है। हैदराबाद में डा. प्रियंका रेड्डी के साथ भी उतना ही जघन्य अपराध हुआ है और एक बार फिर पूरा देश गम और गुस्से में उबल रहा है । गुनहगारों को सरेआम फांसी देने सब तरफ से उठ रही है। क्या आम क्या खास सब यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिरी ऐसे सख्त कानून का क्या फायदा जो सजा देने में बरसों लगा दे और उस पर अमल की कोई सूरत नजर आती हो। रेप के गुनहगारों को फांसी की सजा की खबर पढ़़ और सुनकर लोग अब यह कहने लगे हैं कि आखिर इन पर अमल कब होगा? हैदराबाद की सड़कों पर गु़नहगारों को खुद सजा देने के लिए उमड़ी भीड़ लोगों का भरोसा उठने का प्रतीक ही कहा जाएगा। निर्भया और डा. प्रियंका रेड्डी से हुए गुनाह के बीच सैकड़ों ऐसे ही मामले सामने आए हैं, एनसीआरबी के ताजे आंकड़े बताते हैं कि हर राज्य में ज्यादती के मामले बढ़ रहे हैं। निर्भया कांड के बाद मंदसौर में एक सात साल की मासूम से हुई दरिंदगी की वारदात ने भी पूरे देश को ऐसे ही उद्वेलित किया था। लेकिन इसकेे बाद ऐसी घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं।  मंदसौर के बाद सतना, भोपाल और जगह जगह लगभग हर दिन दुष्कृत्यों की खबरें कैंडल मार्च, सियासत, फांसी की सजा का एेलान और पकड़े गए दुराचारियों पर पुलिस की थर्ड डिग्री के वायरल वीडियोज के बावजूद यह वारदात थम नहीं रहीं। आखिर क्यों? इस सवाल के कई प्रमुख कारणों में से एक पर न सियासत और न ही समाज सुधारक मंचोंऔर न ही मीडिया में ज्यादा चर्चा हो रही है। यह विष्ाय है वासना को आत्मघ्ााती बना रहा नंगेपन का कारोबार। मुफ्त डॉटा के बोनांजा की हर दिन नई सेल के इस दौर में विश्व व्यापी यौन दृश्यों का कारोबार यानी पोर्नोग्राफी भारत में लगभग हर मोबाइल धारक के मोबाइल पर नॉक कर रहा है। भारत के इंटरनेट यूजर्स दुनिया के उन टॉप टेन देशों में शुमार हैँ जो मोबाइल का ज्यादातर उपयोग पोर्नोग्राफी देखने में करते हैं। भारतीय सामग्री भी वहां लगातार बढ़ रही है। हालात कितने खतरनाक हो चुके हें, यह इसी बात से पता चलता है कि हैदराबाद में प्रियंका रेड्डी की यौनाचार के बाद जघन्य घटना के सामने आने के बाद तीन दिन में 80 लाख लोगों ने पोर्न साइट्स पर हैदराबाद गैंगरैप को सर्च किया। यानी लोग इस जघन्य कांड में गैंगरैप का वीडियो देखना चाह रहे थे। यह हमारे समाज में मानसिक जहर और उससे होने वाले ऐसे जघन्य अपराधों के गहरे पैठने  का सबूत है। अपराध करने और उसका वीडियो बनाकर उसे बेचने और सार्वजनिक करने का यह घिनाैना अपराध और कारोबार जारी है और सरकार कुछ नहीं कर रही।                                                              इंटरनेट के संजाल ने पूरी दुनिया में ज्ञान और सूचना के आदान प्रदान को न केवल आसान बनाया है बल्कि यह रोजमर्रा के कामकाज में भी प्रभावीशाली परिवर्तन का माध्यम भी बना है। कारोबार को तो मानो पंख ही लग गए हैं। पूरी दुनिया में ऑनलाइन कारोबार लगातार बढ़ रहा है। भारत में भी यह एक बड़ा बाजार और कारोबार के गेमचेंजर के रूम में सामने आया है। इसका दूसरा पहलू उतना ही भयावह है। इंटरनेट पर तीस से पैंतीस फीसदी सामग्री पोर्नोग्राफी है। फ्री डाटा और ओपन एसेस ने 10 रुपए में मोबाइल रिचार्ज करवा सकने वालों तक के दिमाग में यह पोर्नोग्राफिक गंदगी घुस रही है। कुछ अर्से पहले मैक्स हॉस्पिटल के एक सर्वे में पाया गया था कि भारत महानगरों के 47 फीसदी विद्यार्थी आपस में पोर्न की बात करते हैं। लेकिन इस सर्वे से आगे की भयावह हकीकत यह है कि सुदूर गांव-देहात में रहने वाले मजदूर और अति गरीब तबके तक यह इंटरनेट प्रेषित जहर फैल चुका है। आए दिन यौन अपराध के वीडियो अपलोड किए जाने और अपलोड किए जाने की धमकी देकर दुष्कृत्यों की खबरें आम हो चुकी हैं। वीडियो अपलोड करने के लिए खुलेआम छेड़छाड़ की वारदात की संख्या बढ़ती जा रही है। किस प्रदेश में ऐसे अपराधों की दर्ज संख्या और वहां किस दल की सरकार है, इस पर सियासत भी बढ़ रही है, लेकिन इसे रोकने को लेेकर सही मायने में काेई चिंतित नजर नहीं आ रहा है। यह भयावह है।

सवाल ये है कि मासूम बच्चियों से दुष्कृत्य करने वालों को फांसी की सजा मुकर्रर करने के बावजूद इसकी जड़ पर लगाम लगाने में सरकारें क्यों कुछ नहीं कर रही हैं? एनडीए के पहले कार्यकाल यानी वाजपेयी सरकार के वक्त तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुष्ामा स्वराज ने पोर्नोग्राफी परोसने वाले विदेशी चैनल बंद करवा दिए थे। उन्होंने इंटरनेट पर इस कारोबार को रोकने की भी मुहिम शुरू की थी लेकिन आजादी गैंग को यह निजता के अधिकार का उल्लंघन लगा था। यूपीए की सरकार के दो कार्यकाल में पोर्नोग्राफी पर लगाम लगने के बजाय यह बढ़ती गई और वर्तमान एनडीए-टू में यह कई गुना बढ़ चुकी है, क्योंकि अब इस विष बेल के परवान चढ़ने के लिए वन जीबी डॉॅटा फ्री जैसे प्लान हर मोबाइल कंपनी के पास हैं और बाजार में 500 रुपए के स्मार्ट फोन भी हाजिर हैं। कुछ भी वर्जित नहीं। इंदौर हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसले में 850 पोर्न बेवसाइट्स पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था लेकिन यह न हो सका, क्योंकि आजादी गैंग ने इसे संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 के खिलाफ बताया। केंद्र की सरकार ने कुछ पोर्न साइटस को बैन किया भी लेकिन 99 फीसदी कंटेंट उपलब्ध है। डिजिटल इंडिया के सपने का यह बेहद बदसूरत चेहरा है कि देश में सबको दो वक्त की रोटी मिले न मिले मुफ्त डाटा के जरिए नंगापन भरपूर उपलब्ध है। केंद्र सरकारों इस मामले को लेकर रवैया बेहद
चिंताजनक है।
मासूमों से सामूहिक दुराचार की दिल को चीरकर रख देने वाली वारदातों के बीच हमारे समाज की यह सर्व स्वीकार्यता भी बेहद घातक प्रवत्ति है कि हमारे यहां पोर्न स्टार सनी लियोनी भी फिल्मों की नायिका बन जाती है और चल भी पड़ती है। वीरे की वेडिंग जैसी फूहड़, शर्मनाक और गलीज फिल्में भी करोड़ों की कमाई करती हैं, ये सब आजादी के नाम पर बन, चल और बिक रहा है। हम इस तरह के कारोबार को चलने देने और दुराचार के खिलाफ एक ही तरीेके से मोमबत्ती मार्च निकालने वाला समाज बन गए हैं। क्या किसी एक घटना पर आक्रोश जताने के बाद फिर किसी ऐसी घटना पर फिर ऐसा ही प्रदर्शन करते जाना और जड़ की तरफ से आंखें फेर लेना बतौर समाज हमें आत्म निंदा की तरफ नहीं धकेल रहा है। यह सब एक दिन में नहीं हो गया है। बीते करीब डेढ़ दशक में यह लगातार पसरता गया है। एक प्रदेश की विधानसभा में सदन के अंदर माननीय विधायकों का मोबाइल पर पोर्न दर्शन भी यह देश नहीं भूला है। उनके निलंबन की खबरें भी सुर्खियां बनी थीं। दुराचार की घटनाओं की लगातार आ रही खबराें के बीच जरूरत इस बात की है कि न केवल पोर्न साइटस को पूरी तरह बैन किया जाए बल्कि खुलेआम फलफूल रहे नशे के कारोबार पर लगाम लगाई जाए। सोश्यल मीडिया के नाम पर पोर्नोग्राफी की साझेदारी और अफवाहें फैलाने के नेटवर्क को तोड़ना भी बहुत जरूरी है। क्योंकि जघन्य अपराधों को किसी जाति विशेष या मजहब विशेष से जोड़कर ऐसे पापाचार पर लगाम के बजाय समाज को तोड़ने में भी इस्तेमाल हो रहा है और यह सब कुछ आजादी के नाम पर। बाकी देश और सरकाराें को भी सोचना होगा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर यह सब कैसे चलने दिया जा सकता है?आखिर किसकी आजादी? ऐसी आजादी से क्या मिल रहा है? सरकार अगर सीमापार से आने वाले आतंक को मिटाने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के शौर्य का बखान कर जनता का भारी समर्थन हासिल कर रही  है तो उसे पोर्नोग्राफी और नशे के कारोबार पर भी इसी तरह सर्जिकल स्ट्राइक की हिम्मत दिखाने होगी, यह संभव है और जो इसका विरोध करेंगे वे एक बार फिर बेनकाब होंगे, उन्हें अलग-थलग करना ही होगा। वर्ना शक्तिशाली भारत, विकसित राष्ट्र भारत,स्वामी विवेकानंद के सपनों का भारत बनाने और फिर विश्व गुरू बनने की बातें जुमले से ज्यादा कुछ नहीं मानी जाएंगी। उम्मीद की जाना चाहिए कि सरकार अब इस सर्जिकल स्ट्राइक की तैयारी कर एक दिन ऐलान करेगी, क्या ऐसा होगा?