शनिवार, 22 दिसंबर 2012

बचके रहना रे बाबा कहीं कोई श्री न कह दे

बीते गुरूवार की शाम एक मित्र अचानक ही मिल गए। खूब तपाक से मिले, गले भी लगे। इतना ही नहीं अपने सहकर्मी से मेरा परिचय भी कराया। परिचय कराने से पहले तक तो बात ठीक थी। लेकिन परिचय इस ढंग से कराया कि मैं सकपका और सहम गया। असल मंे उन्होंने कहा कि इनसे मिलिए, ये श्री सतीश एलिया हैं। अब आप कहेंगे जब आपका नाम ही सतीश एलिया है तो इसमें सकपका कैसा! आपकी बात वैसे तो सही है लेकिन मैं सकपकाया इसलिए क्यांेकि हमारे देश की सरकार इन दिनों पदम श्री वगैरह से आगे बढ चुकी है। वो अब देश की सबसे बडी पंचायत संसद में आतंकवादियों को श्री कह रही है। जी हां यूपीए सरकार के ग्रह मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे ने मुंबई हमले के मुख्य आरोपी दुर्दांत पाकिस्तानी आतंकवादी हफीज सईद को श्री कह चुके हैं। यथा राजा तथा प्रजा। तो जब सरकार आतंकवादियों को श्री कह रही है तो फिर जब कोई मुझे श्री कहेगा तो मैं सकपकाउं नहीं तो और क्या करूं! इससे पहले कांग्रेस के अति वाचाल महासचिव दिग्विजय सिंह ओसमा बिन लादेन को ओसामा जी कह चुके हैं। तो अब समझ में नहीं आ रहा है कि व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए श्री और जी के विकल्प खो देने के बाद क्या किया जाए! एक दफा मप्र के तत्कालीन विख्यात और अब रसातल को जा रहे अखबार ने डाॅन दाउद इब्राहीम के भारत से फरार होने के समाचार में शीर्षक लगाया था श्री दाउद इब्राहीम भारत से फरार। श्री शिंदे और दिग्विजय सिंह जी का क्या है दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के आरोपियों को भी श्री और जी कह सकते हैं। जैसे कि वे संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल को गुरू कहते ही हैं। उसकी फांसी पर चार साल से अमल नहीं होने दे रहे। लेकिन भाई साब मेरे नाम के पहले श्री और बाद में कोई जी लगाए तो मैं इन दिनों घबरा और सकपका जाता हूं कि मुझे भी आतंकवादी न समझ लिया जाए।

रविवार, 18 नवंबर 2012

sadmein mein kunba makhanlal ka

सदमे मंे कुनबा माखनलाल का

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुनबे के पहले बैच पर वज्रपात हुआ है। हमारा साथी यार वेदव्रत गिरि काल के क्रूर हाथों ने हमसे छीन लिया है। शनिवार को यह मनहूस ह्रदय विदारक समाचार मिला तो दिमाग सुन्न हो गया। अभी दीपावली के एक दिन पहले ही तो भोपाल में मुख्यमंत्री निवास में दोपहर भोज में हम एक घंटे साथ थे। उसने परंपरानुसार मुझे भरपूर गालियां दी और मैंने भी। हमारा याराना ही ऐसा था। हम पहले बैच के थर्टी थ्री ईडियटस थे जो साल भर हाॅस्टल में भी साथ रहे और 21 बरस से मुसलसल यारी मंे थे। सडक हादसे से हमसे हमारा एक ईडियट छीन लिया। इसके पहले करीब आठ बरस पहले प्रदीप दीक्षित की असमय मौत हुई। वेद ने ही बताया कि अवनीत सिन्हा नहीं रहा। तैंतीस में से तीस रह गए हम। वेद को हम न जाने कितने नामों से बुलाते थे। एक जगह थमकर नहीं रहना, धुमक्कडी उसका स्वभाव था। हमने उसे यायावर नाम दिया था। बोलचाल में इतना बेलाग कि गाली उसका तकिया कलाम सा था। हम कहते तुम साले गंवार हो गंवार ही रहोगे। बीडी पर लंबी कविता सुनाता था, अब भी कभी फरमाइश पर मैं उससे वो कविता सुन लेता था। हाॅस्टल में उसके गीतों की गूंज अब भी दिमाग में सुनाई दे रही है। गांडीव, अमर उजाला, चैथा संसार, दैनिक भास्कर, ईटीसी से लेकर राष्ट्रीय सहारा और फिर अपनी बेवसाइट माय न्यूज डाॅटकाॅम और मेरी खबर डाॅटकाम। पत्रकारिता का यायावर वेद । कभी मजाक का बुरा नहीं मानने वाला गिरि अब नहीं है। हमारी प्यारी सखी अल्पना पर जो विपदा आई है, उसकी कल्पना करके ही कलेजा मुहं को आ रहा है। मैंने कल उससे फोन पर बात की थी। तब तक उसे बताया नहीं गया था कि वेद नहीं रहा। उस बिचारी को तो यही बताया गया था कि एक्सीडंेट हुआ है, अस्पताल में है। अब जबकि उसे पता चल गया है तो उससे बात करने का माददा ही नहीं है मुझ में। कल संजीव, अनिल पाराशर, रीमा दीवान, जितेंद्र रिछारिया को मैंने फोन पर सूचना दी तो सब सदमे में डूब गए। हे ईश्वर ये क्यों किया।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

एक दीप धरें मन की देहरी पर

आप सभी को सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। दीप पर्व पर मेरी अपनी एक कविता सुधिजनों को समर्पित है।
 
 
 
 
एक दीप धरें मन की देहरी पर
धीरे धीरे घिरता है तम,
ग्रस लेता जड़ और चेतन को
निविड़ अंधकार गहन है ऐसा सूझ न पड़ता
हाथ को भी हाथ
क्या करें,
कैसे काटें इस तम को
यह यक्ष प्रश्न
विषधर सा
कर देता किंकर्तव्यविमूढ़
तो जगती है एक किरन उम्मीद की
टिमटिमाती कंपकंपाती दीप शिखा सी
आओ लड़ें तिमिर अंधकार से,
एक दीप धरें मन की देहरी पर
प्रेम की जोत जगाएं हम
मिटे अंधियारा
बाहर का भीतर का भी,
आओ दीपमालिका सजाएं,
दीपावली बनाएं 
एक दीप धरें मन की देहरी पर।।
- सतीश एलिया