रविवार, 9 मई 2010

तुमने जो सिखाया माँ

जब भी लगती है कोई चोट
चड़ता है ताप
लगती है कसके भूख
सूख जाता है प्यास से कंठ
लगता है डर भव्तिव्य्ताओं से
लोग लगातार करते है परेशान
तो बरबस याद आता है कौन
तुम तुम तुम -- और कौन
हाँ माँ तुम
में जानता हूँ तुम नही दे सकतीं मुझे
येंसी कोई सलाह जिससे काट फेंकू में
षड्यंत्रों का जाल
तुम कहोगी सब भगवन पे छोड़ दे बेटा
जब तुमने किसी का बुरा नही किया तो
कोई तुमारा बुरा नही कर पायेगा
लेकिन मेरी भोली माँ
किसी का बुरा नही करना ही बन गया हे इस दौर में बुराई
जो दूसरों कि राह में बो रहे हैं कांटे उनको ही मिल रहे हैं फूल
तुम ही बताओ माँ
कहाँ कमी रही गई
तुमने सिखाया सच बोलना डरना मत
किसी का दिल मत दुखाना
थोड़े में संतोष रखना
यही सब करता हूँ हार जाता हूँ माँ
तुम्हारी सीख को गलत साबित करने में
लगा है जमाना
बहुत बहुत अकेला पड़ जाता हूँ माँ
कल रात फिर सपने में देखा तुम्हे
आके गले लगा लो ना माँ
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सतीश एलिया

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

वे बो रहे हैं मप्र की पहली महिला वाइस चांसलर की राह में कांटे

कांग्रेसअध्यक्ष, यूपीए चेयरपर्सन महिला, लोकसभा में अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष सभी महिलाएं, महिला आरक्षण बिल पर यादव त्रयी को छोडकर सभी पक्ष विपक्ष एक साथ। टीवी पर, अखबार में, हवाई जहाज में, नासा में अंतरिक्ष में सभी जगह महिलाओं ने अपनी ताकत दिखा दी है। मप्र के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल में प्रो.निशा दुबे को कुलपति बनाकर राज्य की पहली महिला वाइस चांसलर की नियुक्ति की। इस बात की तारीफ मीडिया में जमकर हुई। लेकिन जब सोमवार को प्रो. दुबे विवि में कुलपति पद का काम सम्हालने पहुंचीं तो उनको विवि प्रशासन के अफसरों से लेकर उन प्रोफेसरों तक ने कोई तवज्जो नहीं दी जो अब तक के सभी कुलपतियों के लिए गुलदस्ते लेकर उनके निवास से लेकर कुलपति कार्यालय के द्वार तक पलक पांवडे बिछाए खडे होते आए थे। आइएएस,आइएफएस और आईपीएस अफसर भी इस विवि में कुलपति रहे और इनमें से कोई भी ऐसा नहीं रहा जिसे भारी विवाद, झगडों टंटों के बाद विदा न होना पडा हो। कार्यवाहक कुलपतियों की भी लंबी परंपरा है बल्कि हर कार्यवाहक नए कुलपति की चयन की सूची में शामिल होता रहा। निशा दुबे को हत्सोसाहित करने का माहौल केवल इसलिए नहीं बना कि कार्यवाहक कुलपति प्रो. पीके मिश्रा की नियुक्ति तय मानी जा रही थी और फिर भी नहीं हुई। इसकी असल वजह प्रो. दुबे का महिला होना है, यह ठीक वैसा ही जैसा भाजपा में उमा भारती के साथ हुआ, क्योंकि वे मायावती या जयललिता नहीं हैं। निशा दुबे को कुलपति बनाने वाले लोगों की मंशा नारी सशक्तिकरण की दिशा में एक और कदम उठाया गया साबित करने की थी और वह साबित भी हुई लेकिन बरकतुल्ला विवि प्रशासन और प्राध्यापकों ने साबित करने की कोशिश की है कि वे किसी महिला को कुलपति पद पर सफल नहीं होने देंगे। आश्चर्य तो इस बात का है कि मीडिया ने प्रदेश की पहली महिला कुलपति की नियुक्ति को पॉजीटिव मानते हुए भरपूर तवज्जो दी लेकिन जब वे फीके माहौल में कार्यभार ग्रहण कर रही थीं तक कुछ पत्रकार बाहर खडे होकर यह चर्चा कर रहे थे कि मैडम चल नहीं पाएंगी। यह जुमले विवि प्रशासन के जिम्मेदार पदों पर सालो से जमे हुए और विभागों में जडें जमाए बैठे लोग भी बोलते सुने गए थे। अब देखना ये है कि महिला को कुलपति बनाने वाले और खुद प्रो. निशा दुबे विवि में जमे कॉकस का तिलिस्म किस तरह तोड. पाते हैं। नई कुलपति को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि उनका कम्युनीकेशन और एडमिनिस्ट्रेटिव पॉवर स्ट्रांग है, देखना ये है कि बरकतुल्ला विवि सही अर्थ में विवि की गरिमा हासिल कर पाता है या नहीं।

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

क्रिकेट ke हर्षद ललित मोदी के बाद अब क्या

फटाफट क्रिकेट के हर्षद मेहता ललित मोदी को गरजते हुए भी पैवेलियन लौटा दिया गया है। लेकिन ग्लेमर , पैसा, जलवे के इस अरीना में अब भी मोदी के भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। आईपीएल सर्कस के रिंग मास्टरों की फौज में राजनीति वाले आका तो अब भी खेल में और सरकार में बने ही हुए हैं। सिने तारिका से लेकर धन लक्ष्मियों तक के लाडले मोदी अब क्या करेंगे इस पर सब की नजर है। नजर सरकार और बीसीसीआई पर भी है कि वे मोदी उपकृतों को बख्शने के लिए सेफ पैसेज के लिए क्या बहाने गढते हैं। चुनाव कि तारीखों में परीक्षाओं कि तारीखों पर चुनाव आयोग में बहस करने वाले राजनीतिक दलों ने आईपीएल तमाशे की तारीखों में भी एगजाम्स डेट का ध्यान नहीं रखा। पढाई के लिए और सिंचाई के लिए बिजली भले न मिले लेकिन क्रिकेट धनवर्षा के लिए चकाचौंध का भरपूर इंतजाम बनाए रखने वाली सरकार के कर्ताधर्ताओं को और भी कई सवालों के जवाब देने हैं। भरपूर विज्ञापन बटोरने वाले मीडिया ने भी इससे पहले आईपीएल को लेकर जनता के सवाल नहीं उठाए। उन्हें भी आत्म अवल कन कर लेना चाहिए।