सोमवार, 24 नवंबर 2025

*बासौदा से वासुदेव नगर:नाम से बदलेगा क्या?_*

 बचपन में प्राथमिक विद्यालय की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में एक बोध कथा थी" नाम बड़ा या काम" । जिसका निचोड़ था कि नाम में क्या है, काम प्रभावी लोक हितकारी होना चाहिए। यह कहानी बालमन में ऐसी पैठती है कि जीवन भर नहीं भूलती। नाम राम, कृष्ण,  महावीर,  गणेश,  महादेव आदि जिनके होते हैं या फिर शेर सिंह क्या वे वैसै होते हैं? खैर हमारे शहर बासौदा का नाम "वासुदेव नगर" रखने का ऐलान हुआ है तो जिस नगर में मेरी मातामही ( नानी) , माता और मेरा खुद का जन्म हुआ जहाँ तब तक उपलब्ध उच्चतम शिक्षा बीएससी मैनै पाई, जो मेरे लिए दुनिया की सबसे प्रिय नगरी है बासौदा। बासौदा के साथ पास का गांव "गंज" भी जुड़ा है गंजबासौदा। वो इसलिए कि एक गाँव है जिसका नाम है " दाऊद बासौदा"। एक और जगह है जिसका नाम है  हैदरगढ लेकिन एक जमाने तक "छोटा बासौदा" कहलाता था, जिसके पास मोहम्मदगढ है, जिस बोलचाल में मम्मदगढ कहा जाता है, जिसके मिडिल स्कूल में मेरे पिताजी शिक्षक रहे ( 1974-76) में दूसरी कक्षा मोहम्मदगढ स्कूल में ही पढ़ा।                                      अब बात बासौदा ( हम बासौदा वाले बासदा कहते हैं,  लिखते गंजबासौदा हैं और विधानसभा क्षेत्र है बासौदा) की। तो जनाब ये नाम बदलने की बात सबसे पहले 1977 हलधर किसान चुनाव चिन्ह पर जनता पार्टी के विधायक बने एडवोकेट जमना प्रसाद चौरसिया जी ( अब दिवंगत) ने उठाई थी। अब रविवार को मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव के मुख से पूर्ति का ऐलान क्षेत्रीय सांसद अत्यंत लोकप्रिय नेता सर्वाधिक समय मप्र के मुख्यमंत्री रहे वर्तमान केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराजसिंह चौहान की मौजूदगी में हुआ। बासौदा का नाम प्रयागराज को इलाहाबाद से फिर प्रयागराज करने जैसा नहीं है, न ही जगदीशपुर से इस्लाम नगर बनाने और भैरून्दा से औबेदुल्लागंज बनाने की क्रूरता को दुरुस्त करने जैसा है। इस्लाम नगर फिर जगदीशपुर बनना स्तुत्य और गौरवपूर्ण है लेकिन हलाली नदी, हलाली डैम अब भी कायम हैं,  जैसै हबीबगंज रेलवे स्टेशन रानी कमलापति बन गया लेकिन कोई माई का लाल थाना हबीबगंज का नाम नहीं बदल रहा, जबकि हबीबगंज नामक कोई जगो भोपाल में हैई नई भाई। बासौदा का लिखित भू अभिलेख एक शिलालेख में मिलता है करीब साढ़े चार सौ साल पहले। यह शिलालेख हमारे बासौदा के गनगौर वाला बाग ( अब यह नाम भी कोई याद नहीं रखता, लोग जमीन खाने लगे, नाम भी हजम करने लगे) की प्राचीन बावड़ी की शुरुआती सीढियों की दीवार पर लगा है। इसमें लिखा है- *मौजा-  बासौदा, परगना- उदयपुर) संवत 1632 या आसपास का है, इस वक्त पक्की तारीख स्मरण में नही हैं।*  खैर मौजा बासौदा अपनी मौज में ही रहा, तहसील बना, नगरपालिका बनी, आसपास और दूर दूर तक के आसपास के जिलों के ग्राम्य अंचलों के लिए बाजार और व्यापार का पसंदीदा शहर, जहाँ से सौदा लेना अति उत्तम इसलिए  " बासौदा"। ए श्रेणी की मंडी और पत्थर के कारोबार तथा बाकी व्यापार और मेहनती किसानों के श्रम से चमका और यहाँ की प्रतिभाओं ने शहर, प्रदेश,  देश , विदेश में शहर का नाम स्थापित किया।  यहाँ की जन आकांक्षा बासौदा को वासुदेव नगर या कुछ और नाम देने की कभी नहीं रही। जन आकांक्षा है सब योग्यताएं,  अहर्ता पूरी करने वाले बासौदा को जिला बनाया जाए। आगर- मालवा,  अनूपपुर,  डिण्डोरी,  अशोकनगर,  बुरहानपुर,  हरदा,  बड़वानी, नीमच, श्योपुर, उमरिया, निवाडी,...लगातार नये जिला बनते गए तो बासौदा किस पैमाने पर कम है? कब तक न्याय न होगा? नाम बदलने से क्या बदल जाएगा?                                                        सवाल अब यह है कि नाम बदलने से युवाओं पर नशे की गिरफ्त कम होगी? उद्योग लग जाएंगे? जमीनों पर अतिक्रमण कम होंगे? अपराध कम हो जाएँगे? छुद्र राजनीति और भ्रष्टाचार से मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होकर  विकास और शहर हित में एकजुटते हो जाएगी?        *- सतीश एलिया ( वरिष्ठ पत्रकार)*

शनिवार, 3 मई 2025

पहलगाम इस्लामिक आतंकवादी नरसंहार और हमारी 'कायरता'...

 



- सतीश एलिया
कश्मीर के पहलगाम में 27 पर्यटकों की हिन्दू होने पर गोली मारकर हत्या ने देश में भारी गुस्से और पाकिस्तान से एक और युद्ध की नौबत के हालात हैं। 1947 में अधूरे भारत-पाकिस्तान विभाजन से अब तक हुए भारत पाकिस्तान के बीच चार युद्धों और पाकिस्तानी प्रशिक्षित आतंकवाद की पहलगाम जैसी सैकड़ों वारदात में कुछ नया है तो ये कि गोली मारने से पहले एक सवाल पूछा गया और उसका सही जबाव  देने पर भी मौत और गलत जबाव देने पर जांच में फेल होने पर भी मौत। भारत सरकार की बदला लेने या मरने वालों के परिवारों को न्याय मिलकर रहेगा की प्रतिज्ञा और विपक्ष के नेताओं की पहले एकजुटता और चार दिन बाद ही  साजिश कर्ता पाकिस्तान की हिमायत करती सी बयानबाजी के बीच कुछ बुनियाद सवाल हमें अपने आप से करने का भी वक्त है। जो कलमा न पढ़ पाने और खतना न होने के कारण मारे गए, उनके प्रति पूरी सहानुभूति और उनके परिवारों के दुख  के साथ पूरी संवेदना होने के बावजूद सवाल ये भी है कि चार बंदूकधारी जाहिल 27 लोगों पर भारी पड़ गए।  आतंकियों के आदेश पर पेन्ट उतारने वाले किसी ने भी मर्दानगी नहीं दिखाई,  बंदूक छीनने की कोशिश क्यों नहीं की? कोई तानाजी,  संभाजी क्यों नहीं बना? किसी की भी पत्नी ने अपने सुहाग को बचाने जाहिल इस्लामिक आतंकियों से भिड़ने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई? अभी अभी तो पूरे देश ने वीर शिवाजी के पुत्र संभाजी के जीवन पर बनी फिल्म ' छावा' देखी थी। आतताई विदेशी आक्रांता इस्लामिक जिहादी औरंगजेब के खिलाफ आक्रोश से भर गए थे और संभाजी के जयकारे पापकार्न खाते हुए थियेटरो में लगाए थे। ये जो 27 मारे गए,  उनमें से ज्यादातर ने  ' छावा' , बार्डर इत्यादि देखी ही होगीं न! अपने पतियों को मारे जाते देख रोने वाली वारांगनाएँ वीरांगनाएँ क्यों नहीं बनीं? एक आदिल हुसैन विदेशी आतंकवादियों से कैसै भिड़ गया? क्या तत्कालीन सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ' रज्जाक भैया' ने एक बार हिन्दुओं को कायर कहा था, तो सच ही कहा था। विचार करके देखिए तरह तरह जाहिल विदेशी आक्रांताओ ने भारत पर तकरीबन 1200 साल राज किया तो इसके पीछे जाहिलियत का वीरता से मुकाबला न कर पाना ही अहम और सबसे प्रमुख कारण रहा था। शिवाजी, महाराणा  प्रताप,  पृथ्वीराज चौहान, राणा सांगा , लक्ष्मीबाई जैसै अप्रतिम शौर्य के प्रेरक उदाहरणों से कई गुना ज्यादा उदाहरण गद्दारी और कायरता के हैं। आज भारत,  पाकिस्तान,  बांग्लादेश,  अफगानिस्तान में जितने तरह के और जितने मुसलमान हैं उनमें से 99 फीसदी वे ही हैं जिनके पूर्वज किसी आध्यात्मिक स्वीकार्यता या राजी खुशी से नहीं बल्कि ऐसे ही कायरता के चलते कन्वर्ट हुए थे। जब तक हम भारत के सदियों गुलाम रहने, भारत के विभाजन की असल जड़ को नहीं समझेंगे तब तक 'पहलगाम ' होते ही रहेंगे। सेना की सुरक्षा समूचे देश को नहीं सीमा पर ही होनी चाहिए, देश में तो नागरिको को ही वीरता से आतंकवाद से दो दो हाथ करने लायक बनना होगा। स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों में सैनिक प्रशिक्षण अनिवार्य करे बिना ये संभव नहीं। राष्ट्रीय कैडेट कोर ( एनसीसी) की अभी क्या स्थिति है? बीते 78 साल में स्कूल, कालेज, विवि और कुल विद्यार्थियों की संख्या में जितनी वृध्दि हुई है, उसकी तुलना में एनसीसी कैडेट्स की संख्या कितनी बढी? आज 140 करोड़ आबादी वाले हमारे देश में स्कूल कालेजों में करीब 31 करोड़ विद्यार्थी हैं। इनमें से करीब 12 लाख एनसीसी कैडेट्स हैं। यानी देश की आबादी में एनसीसी  कैडेट्स करीब 1.11 प्रतिशत हैं और विद्यार्थियों की संख्या में से 2.58 फीसदी विद्यार्थी ही कैडेट्स हैं।                                 हमारे देश में उच्च शिक्षा संस्थान लगातार बढ़ते जा रहे हैं। उनमें प्रवेश की परीक्षाओं की तैयारी के संस्थान और फीस भी लगातार बढते जा रहे हैं। माता पिता बच्चो के अच्छे संस्थानों में प्रवेश,  विदेश में पढ़ाई के बाद देशी  विदेशी कंपनियों में पैकैज और नौकरियों को जीवन का लक्ष्य बना रहे हैं और बच्चे भी वही कर रहे हैं। बच्चों को प्रतियोगी प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग को प्राथमिकता देने उनके हायर सेकंडरी स्कूलो के लिए डमी स्कूल में  एडमिशन कराए जाते हैं। ऐसे प्रवेशकामी और पैकैजकामी  माता-पिता और युवा जिहाद ट्रेंड जाहिल आतंकवादियों से कैसै मुकाबला कर सकते हैं? अखाड़े व्यायामशाला अतीत की बात हो रहे हैं,  जिम और स्ट्रायड से दिखलौट देह का आकर्षण बढ़ रहा। युवाओ के विवाह का आधार पैकैज बन रहे हैं, हनीमून मनाते जोड़ों से कलमा सुनाने की फरमाइश करने और पेन्ट उतरवाकर सुन्नत( खतना) चेक करने वाले जाहिल इस्लामिक जिहादियो के हाथों मारे जाने के अलावा लडकर मरने का विकल्प कैसै उनके जेहन में आता,  उन्होंने आतंकवाद के आगे हार मान ली और मारे गए।  27 लोग बंदूक छीनने का प्रयास करते एकाध को मार पाते पकड़ पाते भले ही सब मारे जाते तो एक मिसाल बनती,  लेकिन आतंकवादियो से भिड़ने की हिम्मत दिखाई और वीर की तरह जो अट्ठाइसवा मारा गया वो कलमा भी जानता था, सुन्नत भी थी,  लेकिन वो उसी की तरह कलमे वाले आतंकियों जैसा नहीं था, न ही आतंकवाद को पैसे के लिए कलमे के लिए साथ देने वाले स्थानीय गद्दारो की तरह था। काश ! वे 27 भी लडकर मरते या अब विलाप कर रही उनकी पत्नियाँ वीरांगना बनती और पतियों को बचाती या खुद भी शहीद हो जाती। हम अपनी संतानों को कब वीरता का मंत्र , प्रशिक्षण और हौसला दे सकेंगे? सरकार को अब सैनिक प्रशिक्षण अनिवार्य करना ही होगा। तभी हम मुक्कमल जबाव दे सकेंगे तब ऐसे "पहलगाम " नहीं होगें,  वीरता भरे होगें,  सेना की तरह हर भारतीय पाकिस्तान या भारत के किसी और दुश्मन को सटीक जबाव दे पाएगा। 

बुधवार, 19 मार्च 2025

संभल, महू, नागपुर.....दंगे अनेक, जड़ एक...अधूरा बंटवारा, पूरा वोट बैंक ! - सतीश एलिया

जो संभल में हुआ,  तमाम ऐहतियात,  चौकसी, सख्ती, चाक-चौबंद सुरक्षा इंतजाम के दावों के बावजूद वही महू में हुआ और ठीक वैसा ही अब नागपुर में भी हुआ। तीन अलग अलग राज्य उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और अब महाराष्ट्र , तीनों जगह 'डबल इंजन' सरकार और बुलडोज़र की नजीरें, नागपुर  में तो विश्व के सबसे बड़े  सामाजिक संगठन का मुख्यालय भी है, लेकिन पिटा कौन, संपत्ति किसकी लुटी,  नष्ट हुई ? जो डबल इंजन चलाने बुलडोज़र चलाने में अपने वोट की आहूति देता है। भारी कौन? वो वर्ग जो ' गंगा- जमुनी ' जैसै  फर्जी जुल्मों को जूते की नोंक पर रखकर ठोकर मारता है और भारत की टीम के हारने का जश्न मनाता है, शोभायात्राओ पर पथराव करता है और गाय काटते है, जो औरंगजेब और बाबर को अपना पुरखा मानता और उनके कुकर्मो पर फख्र महसूस करता है, जो लाल किला, ताजमहल को अपने मालिकाना हक के सुबूत बताता है। जो जमींदोज हो चुकी ' बाबरी' को फिर तामीर करने के नारे पर सोशल मीडिया पर ऐलानिया खुद को कुर्बान करने की बात कर रहा है  जबकि सच्चाई यही है कि जो वर्ग खुद को आततायी मुगलों समेत अन्य विदेशी आक्रांताओ से खुद को जोड़कर देख रहा है, उसके पुरखों को उन्हीं आक्रांताओ ने धर्म भ्रष्ट कर, अपमानित कर मा मारकर कन्वर्ट किया था। आज जो उनकी असल पहचान नहीं है। वे एक तरह से उस विचार, उस आक्रांता पहचान के साथ खड़े है जो उनके पुरखों की गुनहगार है। वे उनके खिलाफ कर दिए गए हैं या बरगलाकर किए जा रहे हैं जो आक्रांताओ के आगे झुके नहीं अपने धर्म  पर टिके रहे। जिन्होंने अपने मठ, मंदिर,  गुरुद्वारे,  धर्म बचाने कष्ट सहे, बलिदान दिए और अपने राष्ट्र को बचाए रखा।                                             संभल, महू, नागपुर से पहले बीते करीब 90 बरस में जो दंगे भारत भूमि में हुए उनकी जड़ एक ही है। इस जड़ को पूरी तरह से उखाड़ने का इकलौता अवसर  78 साल पहले आया था जब मजहब के नाम पर भारत के एक भूभाग को अलग कर उसे पाकिस्तान नाम देकर एक अलग मुलुक बनाया गया। लेकिन जिस बिना पर मुल्क तकसीम किया गया उस पर ही मुकम्मल अमल नहीं किया गया, बल्कि होने ही नहीं दिया। उस मुल्क में उस जमीन के मूल बाशिंदे जो मुसलमान नहीं थे, अपनी मिट्टी से मुहब्बत और जिन्नाह के सेक्युलर फरेब में आकर वहीं रह गए, दोयम दर्जे में जी जीकर या मर मरकर 23 फीसद से चार पांच फीसद रह गए। जो मुसलमान यहाँ से पाकिस्तान को जन्नत मिलना समझकर गए, उनकी तीसरी पीढ़ी मुहाजिर की जलील पहचान के साथ वहाँ रहती है। भुखमरी और आटे के लाले में मुब्तिला पाकिस्तानी आबादी में इन्हीं की तादाद ज्यादा है। हालांकि पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश बनने और 55 साल बाद बांग्लादेश के फिर पाकिस्तान कई तरह बन जाने की कहानी बंटवारे मुकम्मल न होने के गुनाह का ही बड़ा हिस्सा है लेकिन बलूचिस्तान के हालात फिर वही साबित कर रहे हैं जो 1971 में अलग बांग्लादेश बनने से साबित हुआ था। अलग बलूचिस्तान बन भी गया तो भविष्य में वो भी आज के बांग्लादेश की तरह नहीं हो जाएगा, इसकी गारंटी कोई नहीं  ले सकता।  लेकिन अब सवाल बांग्लादेश या बलूचिस्तान का नहीं है। सवाल 78 साल से जारी भारत की एक बड़ी आबादी का भारत विरोधी दंगाई होने का है। मुकम्मल बंटवारा यानी एक एक मुसलमान को पाकिस्तान भेजना और एक एक गैर मुसलमान को 1947 में अलग मुलुक पाकिस्तान बना दी गई जमीन से भारत लाना था। यही न होना 78 साल से मुसलसल दंगों की जड़ है। सरकार को अब पूरी तैयारी के साथ एक देश एक कानून यानी सेक्युलर सिविल कोड या समान नागरिक संहिता लानी और लागू करनी ही होगी। हर दंगे को जाने देने और होने के बाद बुलडोजर या अन्य एक्शन से वास्तव में कोई नतीजा निकलने वाला नहीं है। सुरक्षा बलों,  जरूरत पड़े तो सेना को देश के भीतर उसी तरह मुस्तैद रखना होगा, जैसा हम देश की सीमाओं पर करते हैं। सबका विश्वास नारे में उन लोगों को पहचान कर अलग थलग करना होगा जो इस विश्वास में ' विष' की तरह शामिल हैं और देश को दंगों का विषपान करने पर विवश कर रहे हैं। 1947 में जिनके लिए पाकिस्तान बना उनको 100 फीसदी वहाँ न भेजकर जो भयंकर भूल उस वक्त के लीडरान ने की , उसे दुरुस्त करने के उपाय खोजने ही होगें,  ये आज के नेतृत्व की ही जिम्मेदारी है, भारत अपना पूरा समर्थन इस वक्त के नेतृत्व को दे रहा है। भारत के भीतर फल फूल रहे और खुली आँखों से दिख रहे ' छोटे छोटे पाकिस्तान '  दीर्घकालीन बहुआयामी रणनीति बनाकर  नेस्तनाबूद करने ही होंगे। सबका विकास में अनजाने, अनचाहे ही इनका भी विकास होने की भूल गलती को दुरूस्त करना होगी। ये न हुआ तो संभल, महू,  नागपुर.....यह फेहरिस्त विष बेल बढती ही रहेगी। अगर हम अगले  22 बरस में 1947 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बनना चाहते हैं, विश्व गुरु कहलाना चाहते हैं तो भारत को दंगामुक्त बनाए बिना यह कैसै संभव होगा? भारत की बहुसंख्यक आबादी भारत में वैसै रहेगी जैसी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक आबादी रहने को मजबूर है तो भारत परम वैभव के लक्ष्य को हासिल कर पाएगा क्या? दंगों को जन्म देने वाली विष बेलों को समूल नष्ट करना ही होगा।

रविवार, 9 फ़रवरी 2025

इंद्रप्रस्थ' में 27 साल बाद फिर भगवा ध्वज* * *सतीश एलिया*

 * *मोदी की गारंटी पर मुहर और कांग्रेस के बदले ने ढहा दिया केजरीवाल का ' शीशमहल* '...

* *सतीश एलिया* 

लगभग 27 वर्ष का सूखा समाप्त करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने नई दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ विजय हासिल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उठी भारतीय जनता पार्टी की आंधी में न सिर्फ बड़े-बड़े किले ढह गए बल्कि इंद्रप्रस्थ से आप का तंबू ही उखड़ गया। भाजपा के लिए यह बड़ी उपलब्धि है क्योंकि अपने गढ़ में भाजपा वर्षों से स्वयं को बेगाना महसूस कर रही थी। लोकसभा चुनाव में लगातार दिल्ली में सफलता का परचम फहराने के बाद भी विधानसभा चुनाव में सफलता दूर की कौड़ी हो गई थी। इस बार सत्ता की हेट्रिक कर चुकी आप पार्टी को जहां सत्ता विरोधी लहर ने डुबोया, दूसरी तरफ सफल रणनीति के चलते भाजपा के पक्ष में चली लहर ने मानों तूफान का काम किया। नतीजा यह रहा कि अन्ना आंदोलन को हाईजैक कर बनी और एक एक कर नामचीन साथियो को जलील कर निकालने से  वन मैन आर्मी बन।गई 'आप' के 'शिखर पुरुष' शीशमहल वाले अरविंद केजरीवाल का सशक्त किला ही ढह गया। केजरीवाल की तरह तिहाड़ याफ्ता पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया सुरक्षित सीट ढूंढने के बावजूद खेेत रहे, तो सौरभ भारद्वाज, सोमनाथ भारती, सत्येंद्र जैन और दुर्गेश पाठक भी किनारे नहीं लग सके। जैन भी तिहाड़ी हैं। और तो और लोकप्रिय ‘शिक्षक’ से आप नेता बने अवध ओझा भी पहली ही डुबकी से उभर नहीं पाए। मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना ही एकमात्र दिग्गज आप नेता रहीं जो मोदी के तूफान में अपनी किश्ती बामुश्किल किनारे  ला सकीं।अब ही नेता प्रतिपक्ष बनेगी ऐसा तय माना जा सकता है।

   राष्टीय राजधानी दिल्ली विधानसभा की 70 में से इस बार 68 सीटों पर चुनाव लड़ी भाजपा (दो सीट एनडीए सहयोगी जद (यू) और एलजेपी को दी थीं) 48 सीट पर विजय पताका फहराने में सफल रही। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले उसने अपनी ताकत में आठ गुना इजाफा किया। वर्ष 2020 के चुनाव में उसे मात्र आठ सीट से संतोष करना पड़ा था। वहीं आम आदमी पार्टी 62 से 22 पर सिमट आई। भ भाजपा का स्ट्राइक रेट 71 प्रतिशत रहा और आप का 31 प्रतिशत रहा। कांग्रेस को लगातार तीन विधानसभा और लगातार तीन लोकसभा चुनाव में शून्य सीट मिलने से उसकी शर्मनाक डबल हैट्रिक लग चुकी है। एक पार्टी जिसका नेता खुद भी और जिसके बचे खुचे कार्यकर्ता भी उसे देश का भावी प्रधानमंत्री सोशल मीडिया पर अब भी बता रहे हैं।                           भारतीय जनता पार्टी को हालांकि लोकसभा चुनाव 2024 के मुकाबले वोट प्रतिशत चार फीसदी घट गया है।  लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव (2020) के मुकाबले लगभग नौ प्रतिशत वोट बैंक बढ़ा है। उधर, आप का वोट बैंक बीते विधानसभा चुनाव के मुकाबले दस प्रतिशत घटा  है। इस चुनाव में मोदी की गारंटी ने तो काम किया ही, सीएम चेहरा घोषित  न करना भी भाजपा की रणनीतिक जीत भी है। अरविंद केजरीवाल लंबे समय से सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टारगेट करते रहे हैं, ताकि स्वयं को प्रधानमंत्री पद का दावेदार साबित कर सकें। लेकिन यही महत्वाकांक्षा इस बार उनके लिए हानिकारक साबित हुई। इस बार भाजपा ने मुख्यमंत्री चेहरा घोषित न करते हुए बार-बार प्रधानमंत्री मोदी से केजरीवाल पर हमले करवाए। आप को आप‘दा’ घोषित करने के अलावा मोदी ने ‘शीशमहल’ जैसी लोकप्रिय शब्दावली का भी प्रयोग किया। वहीं जनता जनार्दन से ‘मोदी को सेवा का अवसर देने’ की विनम्र अपील भी की। जो कारगर साबित हुई। भाजपा ने केजरीवाल के शीशमहल की वाीडियो क्लिप भी जारी की और बताया कि इस पर 45 करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं।

    उधर, मतदान के चार दिन पूर्व केंद्रीय बजट में मध्यम वर्ग को राहत देते हुए बारह लाख तक की आय टैक्स फ्री करना भी तुरुप का पत्ता साबित हुआ। दिल्ली में 67 फीसदी आबादी मध्यम वर्ग की बताई जाती है। साथ ही भाजपा ने सैद्धांतिक असहमति के बावजूद मुफ्त रेवडी बांटो प्रतियोगिता का मप्र, महाराष्ट्र की ही तरह हिस्सा बनते हुए चुनावी घोषणा-पत्र में गरीबों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए अनेक प्रकार की आर्थिक मदद की भी घोषणा की। जिसे मोदी की गारंटी मानते हुए जनता ने सहर्ष समर्थन दिया। फिर अपनी परंपरा कायम रखते हुए भाजपा ने 67 प्रतिशत उम्मीदवार भी बदल दिए, जिनमें से एक तो वर्तमान विधायक ही थे। इसके साथ आम आदमी पार्टी के एकछत्र नेता अरविंद केजरीवाल के ‘कट्टर ईमानदार’ के दावे को ‘कट्टर बेईमान’ साबित करने में भी भाजपा सफल रही। जिसमें केजरीवाल का 177 दिन जेल में रहना, शराब घोटाला, शीशमहल और जल बोर्ड घोटाले ने आग में घी का काम किया।    

*कांंग्रेस में भी खुशी का माहौल*

     भारतीय जनता पार्टी के साथ कांग्रेस भी दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों पर जश्न मना रही है। भाजपा तो विजय का जश्न मना रही है, लेकिन पराजय के देशव्यापी सिलसिले के कायम रहने के बावजूद कांग्रेस को आम आदमी पार्टी की पराजय की खुशी है। कांगेस और आप में अदावत लोकसभा चुनाव के बाद से ही शुरू हो गई थी, जो चुनाव का कारवाँ बढ़ने के साथ-साथ तीखी कटुता में बदलती चली गई। इंडी गठबंधन के अन्य दलों दकि आप को समर्थन मिलने के बाद तो यह लड़ाई कांग्रेस के अस्तित्व का सवाल बन गई थी। ऐसे में अकेले ही चुनाव लड़ना उसकी मजबूरी बन गई। हालांकि कांग्रेस के लिए प्रसन्नता का विषय यह है कि उसके पास खोने के लिए कुछ था भी नहीं और उसने खोया भी नहीं। उसने अपने 2020 के चार प्रतिशत वोट बैंक में दो प्रतिशत का इजाफा जरूर किया। निश्चित ही यह राहुल प्रियंका के परिश्रम का प्रतिफल हर्ष है। लेकिन लगता है कांग्रेस में इससे अधिक खुशी इस बात की है कि कांग्रेस आम आदमी पार्टी की चौदह सीटें हरवाने में कामयाब रही, जिसमें स्वयं अरविंद केजरीवाल की नईदिल्ली सीट भी शामिल है। यहां केजरीवाल चार हजार से अधिक मतों से भाजपा के प्रवेश वर्मा से चुनाव हारे।  तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस उम्मीदवार पूर्व सांसद संदीप दीक्षित को 4,500 से अधिक वोट मिले। इस तरह उन्होंने तीन बार सीएम रहीं अपनी माँ शीला दीक्षित की हार का बदला केजरीवाल से ले लिया। यह परिणाम बताते हैं कि यदि दिल्ली में आप और कांग्रेस मिलकर लड़ते तो 36 सीट जीत सकते थे क्योंकि 22 पर आप जीती है और 14 पर कांंग्रेस के कारण पराजित हुई। इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि कांग्रेस ने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के लिए बी-टीम का काम किया है और इस बात की कांग्रेस को खुशी भी है क्योंकि वह आप से बदला लेने में सफल रही। इस प्रकार दिल्ली में आप और कांग्रेस की आमने-सामने की लड़ाई भाजपा को बहुत भायी। यह बात अलग है कि कांग्रेस के कुल सत्तर में से नब्बे फीसदी उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाए जो कि एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कही जाएगी। 

    कुल मिलाकर 27 वर्ष बाद भाजपा दिल्ली में अपना परचम फहराने में सफल रही है। उसके दुर्भाग्य की शुरूआत 1993 से प्रारंभ हुई थी जब नईदिल्ली राज्य गठन के बाद पार्टी को सफलता हासिल हुई और दिल्ली के लोकप्रिय नेता मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री बने। लेकिन आंतरिक गुटबाजी के चलते साहिब सिंह वर्मा मुख्यमंत्री बना दिए गए। अगले 1998 के चुनाव आने के पूर्व सुषमा स्वराज भी दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी थीं। पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बनने के बाद 1998 में कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं और चुनाव जीतकर लगातार तीन बाद मुख्यमंत्री बनीं। बाद में 2013 से केजरीवाल की नवगठित पार्टी ने दिल्ली की सत्ता संभाल ली।

 बहरहाल, लंबे वनवास के बाद भाजपा को एक बार फिर इंद्रप्रस्थ हाथ आया है। उसके सामने मुख्यमंत्री चयन की चुनौती है। अपनी परंपरा को बरकरार रखते हुए लगता है कि वह कोई चौंकाने वाला नाम ही देगी। वैसे पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के पुत्र प्रवेश वर्मा भी केजरीवाल को हराकर जाइंट किलर कहे जा रहे हैं। वैसे भी वे पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं तथा पूर्व सांसद भी हैं। उनका मध्यप्रदेश से भी नाता है, वे वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व मंत्री , पूर्व नेता प्रतिपक्ष, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष,  पूर्व राज्य सभा सदस्य विक्रम वर्मा के दामाद हैं। उधर दिल्ली के पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया को हराकर तरविंदर सिंह मारवाह भी जाइंट किलर बन गए हैं। इससे इतर दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेव की मेहनत भी कमतर नहीं आँकी जा सकती। पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी भी पूर्वांचलियों के नेता बनकर दावेदारों की सूची में शामिल हैं। देखना यह है कि इंद्रप्रस्थ का सिंहासन किसे मिलता है। सीएम कुर्सी मिले किसी को लेकिन दिल्ली में चलेगी मोदी की ही जिन्होंने अपने विजय संदेश में यमुना की सफाई और आप के भ्रष्टाचार की धुलाई को प्राथमिकता के तौर पर जाहिर कर दिया है। उम्मीद की जाना चाहिए कि दिल्ली अब भारत की विश्व स्तरीय राजधानी बनने की यात्रा शुरू करेगी।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2025

स्वजनों का ह्रदय से आभार, थैंक्स जेन कूम, ब्रायन एक्टन और मार्क जुकरबर्ग...... स्वजनों का ह्रदय से आभार, थैंक्स जेन कूम, ब्रायन एक्टन और मार्क जुकरबर्ग......

  पिताजी शिक्षक, ज्योतिषविद और भागवत कथाचार्य थे, वे कहते थे नारायण ने देह धरी तब वे श्रीकृष्ण रूप में 119 वर्ष ही धरती पर रहे तो मनुष्य की देह तो विदा होनी है, मेरी भी होगी, तुम शोक मत करना। सब यहीं बने रहे तो धरती पर चलना असंभव हो जाएगा,  मनुज मनुज को खाएगा। ये दर्शन यथार्थ है लेकिन माता- पिता की देह का विदा होना कोई ऐसा बिछोह नहीं है जिसे सहज ही सहन किया जा सके। अम्मा के गोलोकगमन  ( 3 नवंबर 2016) के 8 बरस  2 माह 10 दिन बाद बीती पौष पूर्णिमा 13 जनवरी 2025 को जब पिता की देह पंचतत्व में विलीन हुई और 15 जनवरी 2025 को तीर्थराज प्रयाग में महाकुंभ में त्रिवेणी संगम में अस्थि विसर्जन किया तो मन के भीतर एक विराट शून्य आच्छादित हो गया। अम्मा की ही तरह वे भी मेरे हाथों में स्वर्ग सिधारे। मैं उनका 'भैया', श्याम सुंदर और राजकुमार था, सतीश तो शायद ही पुकारा हो। वे मेरे पिता,  गुरु, शिक्षक, मित्र सब कुछ थे। पिता के अचानक विदा होने के संताप की घड़ी में इष्ट मित्रो, परिजनों, परिचितो और पिताजी के शिष्यों ने मुझे बहुत संबल दिया। एक समय था जब संचार और आवागमन के साधन इतने कम थे और परिजनो को अंतिम संस्कार की  न जाने क्यों इतनी जल्दी होती थी कि  पिताजी अपने पिता और  पिता तुल्य दादा बड़े भाई की अंत्येष्टि में शामिल न हो सके थे। पिता के निधन की सूचना तो उन्हें तीसरे दिन मिली थी, अपने पैतृक गाँव बरवाई से महज 70 किमी दूर मिडिल स्कूल मोहम्मदगढ़ में पदस्थ थे वे। आज संचार के साधनों की पहुँच लगभग हर व्यक्ति तक होने से पिताजी के लगभग सभी शिष्यों,  मित्रों,  स्वजनों तक उनके गोलोकगमन की सूचना समय से पहुँच सकी और जो आत्मीय थे, वे सभी यथासमय  भोपाल और फिर बासौदा पहुँचे भी। अंतिम दर्शन कर सके, अंतिम उत्तर क्रियाओ में शामिल हो सके, जो नहीं आना चाहते थे या असमर्थ थे केवल वही नहीं पहुँचे। रिश्तों के नकलीपन की पहचान और कृतघ्नो के असल मंतव्य जाहिर होने की भी यही घड़ी थी। मुझे सांत्वना देने वाले सभी स्वजनों का ह्रदय से आभार, दोऊ कर जोरि  प्रणाम,  स्नेह बनाए रखिएगा। व्हाटसएप के सर्जक जेन कूम और ब्रायन एक्टन तथा फ़ेसबुक और व्हाटसएप के मालिक मार्क जुकरबर्ग का भी दिल से शुक्रिया जिनकी वजह से यह संभव हुआ कि जिन तक यह सूचना पहुँचाना थी ' पिताजी, गुरुजी नहीं रहे' मैं संदेश तत्काल पहुँच सका।

शुक्रवार, 3 जनवरी 2025

सबसे बड़ा गुनाह....मुकम्मल बँटवारा न हुआ

 

  जिसे आज भी हम जिसे आजादी या स्वतंत्रता मिलना कहते हैं , जिस तारीख पर जश्न मनाते हैं दरअसल वो पंद्रह अगस्त 1947 मानव इतिहास के सबसे जघन्य रक्तपात को मंजूर करने के गुनाह की दस्तावेजी तारीख है, शोक का दिन है, एक ऐसे आधार पर राष्ट्र का विभाजन मंजूर कर लेने का गुनाह जिस पर उन तत्कालीन रहनुमाई कर रहे लोगों ने ही अमल नहीं किया जो इसके हिमायती थे या हिमायती न थे तो भी स्वीकार कर चुके थे। तब से अब तक 75 सालों से मुसलसल रक्तपात, युद्ध, दंगों का नासूर जारी है। ताजा बानगी बांग्लादेश के हालात हैं, जो 1947 के आधार को गलत साबित करते हुए 1971 में एक स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान के साथ नया देश बना था। उस सांस्कृतिक पहचान को मिटाकर वही शक्ल दी जा रही है जो 1947 में बँटवारे की बुनियाद बनी थी। तो क्या 1947 का विभाजन द्विराष्ट्रवाद का विचार सही था? लगता यही है कि वह सही था, क्योंकि पाकिस्तान में बहुसंख्यकों ने अल्पसंख्यकों के साथ सरकार और कानून की मदद से जो किया, वह अब बांग्लादेश में हो रहा है। दूसरी तरफ 1947 के विभाजन के बाद भारत की सरकारों, सत्ताधारी दलों और ज्यादातर गैर सत्ताधारी दलों ने इसके ठीक उलट बहुसंख्यकों से वैसा व्यवहार किया जैसा पाकिस्तान में लगातार और बांग्लादेश में अब अल्पसंख्यकों से किया जा रहा है। सत्ता पाने और सत्ता में बने रहने का इसे सफल फार्मूला बना लिया गया।  इस पर नेहरू की कांग्रेस से लेकर राहुल गाँधी की कांग्रेस तो अमल कर ही रही है, उसकी कोख से जन्मी ममता बनर्जी की टीएमसी से लेकर सभी गैर-कांग्रेसवाद, कथित समाजवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, अलग राज्यों के आंदोलन से जन्मी और ताकतवर हुई पार्टियाँ भी अमल कर रही हैं।  यहाँ तक की भ्रष्टाचार के खिलाफ मध्य वर्ग की भावना की लहर पर सवार अन्ना हजारे के आन्दोलन से जन्मी और भ्रष्टाचार की कथित सिरमौर बन गई केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी इसमें शामिल है। विभाजन के खिलाफ और अखंड भारत के पैरोकार विचार भूमि वाली संघपुत्री भाजपा भी बीच बीच में  अल्पसंख्यकवाद का राग यदा यदा में आलापने लगती है, खासकर सत्ता में आने पर तो बहुसंख्यकवाद के पुष्ट होने से सत्तासीन होने की हकीकत से गुरेज करती प्रतीत होती है।         पूरे भारतवर्ष यानी जिसे अखंड भारत कहते हैं, जिसके फिर एकजुट होने का स्वप्न और दिवा स्वप्न देखे जाने से जो वैचारिक आनंद मिलता है, उसकी भारत समेत पूरे भूभाग में हकीकत यही है कि 1947 में मुकम्मल बँटवारा न होने का जख्म मवाद की तरह दंगो, शोभायात्राओ पर हमलों और दफन कर दिए पूजा स्थलो को खोजने,  क्रूरता से बदले गए नाम पुनः पूर्ववत करने के खिलाफ साजिशन दंगों की श्रखंला जारी है। कश्मीर की 370 और 35- ए की बेड़ियों से मुक्ति हो या एक देश एक कानून की अनिवार्यता की बहस सबमें वही स्वर हिंसक रूप से सुनाई देता है जिसकी बिना पर भारत विभाजन हुआ था। यह हालात न बनते अगर सरदार वल्लभभाई पटेल और डा.भीमराव आम्बेडकर की दृढ़ राय मानकर मुकम्मल बंटवारा हुआ होता। विभाजन अवंश्यभावी था, हुआ भी लेकिन इसे एक या दो साल की अवधि में मुकम्मल किया जाना चाहिए  था। जिनके लिए जिस आधार पर अलग मुल्क पाकिस्तान बनाया गया उस पूरे वर्ग को समुदाय को पाकिस्तान भेजा जाना चाहिए था। जिस भूभाग को पाकिस्तान बनाया गया था, वहाँ से उस पूरे भारतीय समाज को शेष रह गए भारत में लाया जाना चाहिए था। बिना रक्तपात, दंगे के यह हो सकता था अगर उस वक्त के रहनुमा गंभीर और वाकई दूरदृष्टा होते। यह टिप्पणी उन लोगों को नागवार लग सकती है, लेकिन सच यही है। विश्व युद्धों से ज्यादा मौतें 1947 के विभाजन में हुई थीं।  इसके बाद भारत- पाकिस्तान के बीच चार घोषित युद्ध और सतत आतंकवाद के चलते उतनी ही मौतें हो चुकी हैं।  1971 में भारत की मदद से बना बांग्लादेश फिर 1947 की स्थिति में जाता दिख रहा है। अलबत्ता पाकिस्तान में जो हालात हैं, अफगानिस्तान से जो पाकिस्तान की नई जंग शुरू हुई है, गिरगिट बालिस्तान, बलूचिस्तान में जो बगावत है, वे भी 1947 में मंजूर बंटवारे के आधार को खारिज करते हैं, लेकिन बांग्लादेश के हालात और भारत में फिर 1947 के से हालात बनाने की दमित और छिटपुट प्रस्फुटित होती मंशा बताती है कि मुकम्मल बँटवारा न होना सबसे बड़ा गुनाह था।  इस गुनाह के असर से भारत जितने तेजी से और जल्दी से मुक्त होगा , विश्व गुरु और विश्व की तीसरी बड़ी अर्थसत्ता बनने की तरफ अग्रसर होगा। यह सबसे बड़ा गुनाह ही सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। 

बुधवार, 15 मई 2024

उषा जीजी नहीं रहीं.......

 हमारे छह भाई बहनों में सबसे बड़ी और दिल से मासूम सीधी सबसे छोटी सी सहज...। 64 की उम्र में दिल ने साथ छोड़ दिया।  आखिरी समय अस्पताल जाने से इन्कार...शब्द थे बरवाई जाना है...जन्म स्थान था उनका, पिता का, दादा परदादा प्रप्रपितामह का भी...जिस गाँव को पिता ने करीब 68 वर्ष पहले आजीविका (शासकीय सेवा) के लिए गंजबासौदा में स्थायी निवास के  निर्माण के बाद बतौर स्थायी निवास छोड दिया था। पूरे कुनबे ने बाद के सालों में एक एक कर  गांव छोड़ दिया, ज्यादातर ने आजीविका के लिए। उन्होंने भी छोड़ दिया जिनकी आजीविका अब भी पुरखों के उसी गांव में है, वे जाते हैं और शहर लौट जाते हैं क्या धरा है गांव में।  उषा जीजी करीब 200 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के सिलवानी में आखिरी सांस में जीवन के अंतिम समय में अपने पैतृक गाँव अपनी जन्म भूमि को याद कर वहाँ जाने की जिद कर रही थीं, मानो करीब एक साल का अबोध शिशु जीवन के 63 वर्ष के भटकाव का वर्तुल पूरा करना चाहता था.

 शुक्रवार 10 मई  2024, तिथि अक्षय तृतीया, माता पिता के विवाह की 70 वी सालगिरह के दिन उषा जीजी नहीं रहीं, मां सात साल पहले 2016 में नहीं रहीं थीं। पिता सुबह से विवाह की सालगिरह को याद कर मां को याद कर रहे थे, तभी भांजे के फोन काल से यह ह्रदय विदारक सूचना मिली, पिता को बताने की हिम्मत ही न जुटा सका। उनकी बात सुनता रहा और बीच-बीच में परिवार को सूचना देता रहा। सभी बहनों के साथ सिलवानी पहुँचे तो पार्थिव हो चुकी देह वैसी ही दिखी जैसी सात बरस पहले मां को देखा था चारों तरफ महिलाएँ क्रंदन करती बेटियों को ढाढस बंधाने का प्रयास करती हुई। इसी घर में ब्याह कर आई थीं, में तब 7- 8 बरस का था। शादी के बाद जब पहली बार मायके आई तो संदूक से काँच की अंटियो ( कंचे)  की छोटी सी पोटली निकाल कर मुझे दी, देवरो से अपने भैया के लिए छीनकर जमा कर लाई थीं।  कितने दिनो तक अपनी निक्कर के जेबो में भरकर सब दोस्तो को दिखाता फिरा था मैं। दौड़ता तो छन छन आवाज आती, मानो जीजी  भाई के लिए खजाना ही ले आई थी।  और अब यंत्र लिखित सा स्तब्ध मैं उनकी पार्थिव देह के सामने खड़ा अब तक सायास नियंत्रित अश्रुधार बह चली निशब्द, जमीन पर बैठ गया। मैं तुम्हारे लिए कुछ न कर पाया जीजी। कुछ ही पलों में अंतिम यात्रा ....अंत्येष्टि....चिता के सम्मुख चित्र लिखित सा मैं मानो सात वर्ष और 200 मील का फासला शून्य हो गया वेत्रवती तट पर 3 नवंबर 2016 को मां की चिता के सामने खड़ा हूँ....शरीर में मानो रक्त की एक बूँद न बची, तेज स्वर में कंठ से विलाप फूटा पीछे जीजाजी खड़े थे, थाम लिया गले से लगाया...विलाप तेज हुआ कंठ अवरूद्ध श्मशान में मौजूद सब हतप्रभ...इन दिनो श्मशान रुदन भला कौन करता है...! धीरे धीरे कदमों से मंझले जीजाजी का हाथ थामे हुए श्मशान भूमि से उषा जीजी के घर की तरफ...उषा जीजी जो अब नहीं है उनकी देह अभी अभी अग्नि को समर्पित की है, चिता की आंच से अब तक मेरा शरीर दग्ध है, मन विदग्ध है, मेघ घुमड घुमड रहा है , मेरा मन भी, मेघ की बूँदें शरीर को भिगो रही हैं, जीवन क्या है? उसकी सारता निस्सारता क्या है? क्यों आपाधापी है ? सवाल भी घुमड रहे हैं, मां का आवाज लगाना सुनाई दे रहा है, मानो उषा जीजी ने पुकारा है - भैया ए भैय्या....।                                                                          - सतीश एलिया, सिलवानी ( रायसेन मप्र), 10 मई शाम 5.45        बजे

रविवार, 17 सितंबर 2023

मोदी का तोड विरोधियों के पास नहीं

 

रविवार, 17 सितंबर 2023

मोदी की रफ्तार और समय की पदचाप बहुत पहले ही सुन समझकर उसी के मुताबिक प्लानिंग और उस पर वक्त से पहले ही मुकम्मल अमल की उनकी कार्यषैली की मुरीद भारत की जनता ही नहीं दुनिया का नेत्रत्व करने वाले प्रमुख मुल्कों के नेता भी हो चुके हैं। इसमें अतिसयोक्ति नहीं और न ही यह राग जय जयवंती का गान है  और न ही यह गोदी या भक्त या संघी या पत्रकारिता में सत्ता का पक्ष लेने की पक्षधरता है। हाल की दो तीन बातें हैं जिन पर तटस्थ होकर देखा जाए तो यही राय बनती है। कर्तव्य पथ के बाद नए संसद भवन का निर्माण, सेंगोल की स्थापना, जी-20 की भारत को मिली अध्यक्षता का प्रभावी उपयोग और साल भर देष भर में चले आयोजनों के बाद उसका दिल्ली में भव्य भारत मंडपम में समापन और दिल्ली घोषणा को अगर देखते हैं तो यह बहुत साफ है कि मोदी का नेत्रत्व भारत के लिए ताकत बनने और देष के लगातार बढने वाला साबित हो रहा है। देष अगर विष्व की अर्थ व्यवस्था में 10 वीं से पांचवी पायदान पर पहुंच गया है तो इसे लफ्फाजी कहना अपना ही मजाक उडवाना ही माना जाएगा। आज मोदी का 74 वां जन्म दिन है यानी वे 75 साल की उम्र पर पहुंच गए हैं लेकिन उनकी एनर्जी और लगातार अपने और अपनी सरकार तथा दल के लक्ष्यों की पूर्ति का उनका ट्रेक रिकार्ड रफ्तार पर कायम है। 

विपक्ष अगर मोदी विरोध में संसद भवन के उदघाटन से दूरी बनाने और लगातार देष की उपलब्धियों को नकारने की नीति पर चल रहा है तो यह मोदी को और ताकतवर बनाने के अलावा कुछ नहीं माना जा सकता है। विपक्ष की एकजुटता और मुद्दों पर सरकार को लगातार घेरना लोकतंत्र के लिए अच्छा है लेकिन साथ ही कुछ मामलों में विपक्ष को सरकार के साथ यानी देष के साथ खडा होना चाहिए लेकिन संसद भवन के उदघाटन से लेकर जी-20 समिट तक में विपक्ष ने यह न करके अपनी ही भूमिका को नकारने का काम ही किया है। मोदी विरोध की राजनीति के बजाए विपक्ष सरकार की नाकामी और विसंगतियों पर सरकार और सत्ताधारी दल को घेरने पर ध्यान केंद्रित करे तो विपक्ष मजबूत बन सकता है, क्योंकि मजबूत विपक्ष देष के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि स्थिर और बहुमत वाली सरकार। दोनों में से किसी एक चीज का अभाव लोकतंत्र और देष के लिए अच्छा नहीं है। 

चंद्रयान मिषन में मोदी की भूमिका को नकारने का प्रयास विपक्ष के लिए जनता की नजर में नकारात्मक छवि ही बनाता है। जब चंद्रयान मिषन-2 अपने अंतिम क्षण में असफल हुआ तो पूरा देष सदमे में था और मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री जब इसरो के अध्यक्ष को भावुक होकर गले लगाया तो वह क्षण चंद्रयान मिषन-3 की अवष्यंभावी सफलता की सुनिष्चितता बन गया था। जिस क्षण भारत के चंद्रयान मिषन ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपने हस्ताक्षर किए तो पूरा देष हमारे वैज्ञानिकों के साथ था और विदेषी की धरती से मोदी भी लाइव जुडे थे। वे स्वदेष लौटते ही इसरो पहुंचे और वैज्ञानिकों को बधाई दी। यह ऐसी तस्वीरें थीं जो देष ने लाइव देखी और फक्र महसूस किया वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर और अपने प्रधानमंत्री पर। मोदी की योजनाएं और उन पर अमल की सतत मॉनीटरिंग की उनकी कार्यषैली विपक्ष को कोई मौका नहीं दे रही है। आज उन्होंने यषोभूमि का ष्षुभारंभ कर दिल्ली को वर्ल्ड क्लास राजधानी बनने के अपने विजन को विस्तार दिया है और विष्वकर्मा जयंती पर नई योजना लागू कर अपनी योजना को और विस्तार दिया। तेरह हजार करोड रूपए की यह पीएम विष्वकर्मा योजना न केवल देष की एक बडी आबादी और स्वदेषी को बढावा देने वाली होगी बल्कि जातियों में बांटकर राजनीति करने वाले दलों को 2024 के लोकसभा चुनाव में भारी चुनौती बनकर सामने आएगी। आईएनडीआईए यानी इंडी एलाएंस बन तो गया है मोदी के खिलाफ लेकिन इसमें इतने विरोधाभास हैं अलाएंस का एकजुट बने रहना बहुत मुष्किल दिख रहा है। उप्र में उपचुनाव में कांग्रेस ने सपा का साथ दिया जिससे सपा घोसी सीट जीत गई लेकिन सपा ने उत्तराखंड में कांग्रेस प्रत्याषी के सामने प्रत्याषी उतार दिया जिससे कांग्रेस हार गई और भाजपा जीत गई। सर्वाधिक सीट वाले उप्र में सपा और कांग्रेस का लोकसभा चुनाव में इंडिया अलाइंस बना रह सकेगा!  यह प्रष्न और गहराएगा। यही हाल दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गहराएगा इसके आसार अभी से दिखने लगे हैं क्योंकि केजरीवाल की पार्टी राजस्थान, छत्तीसगढ और मप्र में कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार उतारने को तैयार खडी है, विधानसभा चुनाव में यह हाल है तो लोकसभा चुनाव में यह दल अलाएंस बनाए रख पाएंगे। एक तरफ दलों के अलाएंस का मोदी विरोध का आधार कायम रह सकेगा या नहीं़? क्या पष्चिम बंगाल, केरल और अन्य राज्यों में इंडी अलाएंस कायम रह सकेगा? यह प्रष्न तो हैं ही मोदी की योजनाओं की ताकत भी विपक्ष के सामने बडी चुनौती होगी। 


सोमवार, 15 मई 2023

कुनैन मोदी देष विरोधियों के साथ ही भाजपा को भी दरकार



कर्नाटक के चुनाव नतीजों ने 2024 के मोदी बनाम ऑल के दंगल को और ताकत दे दी है, वेंटिलेटर पर जा पहुंची कांग्रेस को हिमाचल प्रदेष से मिली ऑक्सीजन के बाद अब कर्नाटक ने एक तरह से न केवल संजीवनी दे दी है बल्कि वह मोदी बनाम ऑल में विपक्षी टीम का कैप्टन बनने की दावेदारी को प्रबलता से पेष करने की स्थिति में दिखने लगी है। तो क्या जो कर्नाटक के नतीजों वाले दि नही राकांपा के रोटी पलटने के बयान से अपने ही दल में अपनी खिलाफत को उखाड फेंक चुके महाविकास अघाडी के सर्जक षरद पवार का ये कहना सही हो सकता है कि अब मोदी है तो मुमकिन है नारे का समापन हो गया है? यह सवाल है जो 2024 के मद्देनजर अहम है, लेकिन क्या कर्नाटक की फतह बार बार चुनावों में असफल साबित होते रहे और अपनी परंपरागत सीट अमेठी तक गवां चुके राहुल गांधी की मोदी के सामने सबसे बडे विपक्षी नेता की दावेदारी की टिकट बन सकती है? क्या इस जीत में उनकी कोई भूमिका है भी? कर्नाटक की कांग्रेस की तूफानी जीत और भाजपा की बुरी तरह पराजय के कारणों की पडताल तो भाजपा भी करेगी ही लेकिन इतना तो तय है कि गुजरात और कर्नाटक का जो फर्क है, वह फर्क मप्र,राजस्थान और छत्तीसगढ समेत उन सभी राज्यों में भी देखा जाएगा जहां 2024 के पहले विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस की कर्नाटक विजय में एक बडा फैक्टर जातीय समीकरण को साध लेना और साथ ही मुसलमान वोट बैक का कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होकर जद-एस को दरकिनार कर देना है। भाजपा ने लिंगायत समुदाय के सबसे बडे भाजपा नेता वीएस येदियुरप्पा को कम महत्व देकर इस समुदाय में अपनी पकड को कमजोर किया और वोकालिंगा समुदाय में कांग्रेस की पैठ और मजबूत होने से भी भाजपा को झटका लगा। लेकिन सवाल यही है कि क्या राष्ट्रवाद और लगातार दो लोकसभा चुनाव में अपनी पापुलर छवि के अलावा कामकाज से भी वर्तमान में सर्वाधिक सियासी ताकतवर नेता बन गए नरेंद्र मोदी के लिए 2024 का चुनाव 2019 की जीत को बरकरार रखने वाला बना रह सकेगा? क्या सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाले और फिर इसमें सबका प्रयास का जुमला भी जोडने वाले नरेंद्र मोदी एनडीए के कुनबा बिखरने के केंद्र में हैं? क्या 2004 में जनप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेत्रत्व में षाइनिंग इंडिया को जनता से मिले नकार पर सवार होकर 10 साल सत्ता में रही कांग्रेसनीत यूपीए अब फिर इतिहास दोहराने की तरफ जा रही है? अब उसके साथ एनडीए के साथ रहे घटक दल भी हैं, भले ही वे भाजपा के साथ रहने के वक्त जितने ताकतवर न हों लेकिन एनडीए का कुनबा यूपीए से तो आकार में और सिमट ही चुका है। दक्षिण का द्वार कर्नाटक बुरी तरह पराजय में गवां चुकी भाजपा दक्षिण के बाकी राज्यों में पैर पसारने के अभियान को एक साल में परवान चढा सकेगी? यह सवाल अहम बन चुके हैं। 

सवाल यह भी है कि क्या साफ्ट हिंदुत्व पर लगातार आगे बढ रही कांग्रेस को इससे फायदा मिल रहा है? कर्नाटक के नतीजे तो यही संकेत दे रहे हैं कि कांग्रेस को इसका लाभ मिला और भाजपा का सबका विकास नारे के साथ पसमांदा मुसलमानों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास कर्नाटक में तो विफल ही रहा। हिजाब बैन की मांग करने वाले भाजपा नेता बीसी नागेष हार गए और हिजाब बैन का विरोध करने वाली कांग्रेस की कनीज फातिमा जीत गईं। मतलब साफ है मुसलमान वोट भाजपा के खिलाफ संगठित रूप से एकजुट हुए और कांग्रेस जीत गई। हिन्दू वोट लिंगायत, वोक्कालिंगा इत्यादि समुदायों में बंटकर भाजपा को झटका और कांग्रेस को सत्ता तक ले गए, विकास के काम और सबका विकास के नारे 40 परसेंट भ्रष्टाचार के नैरेटिव में औंधे मुंह जमीन पर जा गिरे। यही हालात राजस्थान, मप्र और छत्तीसगढ में इसी साल होने वाले चुनाव में 2018 के ही नतीजों को नहीं दोहराएंगे, इसकी गारंटी का प्लान समूची भाजपा के पास नहीं है। 

सवाल यह है कि क्या मोदी विरोध में देष विरोध की हद तक जाने वाले मोदी विरोधी दलों का देष में 2019 की तरह 2024 में भी समर्थन मिलता रहेगा? देष के विरोध की हद तक जाने वालों के लिए नरेंद्र मोदी कुनैन की तरह हैं लेकिन क्या भाजपा और भाजपा के साथी रहे या साथी बने हुए दलों के कुछ नेताओं के लिए भी मोदी कुनैन बन गए हैं? इस सवाल का जितना इमानदारी से परीक्षण और जबाव खोजा जाएगा भाजपा और एनडीए के लिए मुफीद रह सकता है, अगर भाजपा और एनडीए को मोदी का देष विरोधियों के लिए कुनैन बने रहने देना है तो उन्हें भाजपा कुनबे में अेौर उनकी सत्ता वाले राज्यों की वेने सब कमियां दूर करना होंगी जो भाजपा को कर्नाटक में ले डूबीं। पार्टी के वफादार और कद्दावर नेताओं या ऐसे नेताओं के परिजनों का पार्टी छोड देना केवल कर्नाटक तक ही सीमित नहीं है, यह मध्यप्रदेष में भी हुआ है और महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों में भी हो रहा है या आने वाले दिनों मंे हो सकता है, बढ सकता है। कर्नाटक के 40 परसेंट वाले असरदार नारे को नकारने का नतीजा सामने है, ऐसे में मप्र तथा अन्य भाजपा षासित राज्यों में इस मुद्दे पर न केवल देखने की जरूरत है बल्कि इसका निर्मूलन करना भी नितांत आवष्यक है। यह सही है कि देष हित मोदी की ताकत है और देष विरोधियों के लिए मोदी कुनैन हैं, उनका इस अर्थ में कुनैन बने रहना सही है लेकिन यह कुनैन भाजपा में भी उनके लिए इस्तेमाल किया जाना जरूरी है जो प्रदेष, देष हित से ज्यादा अपने  हितों को तवज्जो दे रहे हैं। आने वाले राज्यों के चुनावों में चेहरे बदलने पर भी भाजपा को देना जरूरी है ताकि कुनैन का असर बना रहे और बीमारियों से भाजपा स्वयं ही फिर ग्रस्त न हो जाए। कर्नाटक चुनाव के नतीजे तो यही संदेष दे रहे हैं। 


शनिवार, 13 मई 2023

कांग्रेस को आक्सीजन, बीजेपी को तगड़ा झटका....

 जैसा प्री पोल सर्वे और एक्जिट पोल बता रहे थे कर्नाटक के चुनाव नतीजे वैसे ही आए। हिमाचल प्रदेश के  बाद कर्नाटक ने भी काँग्रेस को जोरदार विजय शक्ति से भर दिया है. पाँच साल पहले भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी  बनी थी,  जनादेश नहीं मिला था.  वोट प्रतिशत बना रहने के वाबजूद बीजेपी दूसरे नंबर खिसक गयी और काँग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ रही है.  बजरंग दल को पीएफआई के बराबर बताकर काँग्रेस ने जो दांव खेला उससे उसे जद- से. के मुस्लिम वोट में सेंधमारी का लाभ मिला,  दूसरी तरफ बजरंग दल की खिलाफ़त को हिन्दुत्व का अपमान साबित करने के बीजेपी के अभियान का उसे कोई फायदा  नहीं हुआ.  40 पर्सेंट भ्रष्टाचार का  मुद्दा बीजेपी पर भारी पड़ा. इसी साल मप्र समेत अन्य राज्यों के चुनाव में  भ्रष्टाचार को मुद्दा मानने से बीजेपी इंकार करेगी तो य़ह माना जाएगा की कर्नाटक से सबक नहीं लिया,  क्योंकि अभी सच को स्वीकारने और सुधार करने का समय है.                         हिमाचल में हारने से बीजेपी ने शायद सबक नहीं लिया, काँग्रेस ने हिमाचल की जीत को कर्नाटक में जारी रखा.  महाराष्ट्र-कर्नाटक विवाद का हल दोनों राज्यों और केंद्र में भी  बीजेपी सरकारें होने के वाबजूद नहीं करना बीजेपी की कर्नाटक में पराजय की बड़ी वज़ह बना.  मुंबई कर्नाटक और महाराष्ट्र कर्नाटक कहे जाने वाले क्षेत्रों में बीजेपी को इस बार काफी नुकसान हुआ.                                                        कर्नाटक में काँग्रेस को राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का लाभ मिला और पार्टी में आज तक एकजुटता भी बनी रही, इसे बरकरार रखने की चुनौती अब काँग्रेस के सामने होगी.  मुख्यमंत्री  तय करना आसान नहीं होगा.  पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बयान को मोदी को गाली साबित करने में बीजेपी नाकाम रही,  गुजरात का फ़ार्मूला कर्नाटक में  नहीं चला क्योंकि सामने कर्नाटक का अपना बेटा ही था.  कर्नाटक के घर घर का मिल्क ब्रांड नंदिनी के सामने गुजरात के अमूल को लाने का मुद्दा बीजेपी के खिलाफ गया,  आधा लीटर नंदिनी दुध देने के  वायदे ने इस मुद्दे पर बीजेपी को हुए नुकसान की भरपाई नहीं की.  आने वाले चुनावों में अन्य राज्यों में भी बीजेपी को एसे मुद्दों का सामना करना पड़ सकता  है.                              अपने गृह राज्य हिमाचल में पार्टी की सरकार बरकरार ना रख सके बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा को कर्नाटक की पराजय का कुछ तो हलाहल पीना ही पड़ेगा.  दूसरी तरफ अपने गृह राज्य कर्नाटक में बम्पर जीत से मल्लिकार्जुन खड़गे को ताकत मिलेगी और उन्हें कठपुतली बताने वाली बीजेपी की  जुबान पे इस मामले में ताला लग सकेगा.  सोनिया गांधी की कर्नाटक चुनाव में उपस्थिति भी काँग्रेस के लिए संजीवनी बनी ऐसा कहा जा सकता है,  इसका उल्था करें तो सवाल बनता है की मोदी ना गए होते तो बीजेपी का और क्या हुआ होता.                         2024 की सम्भावनाओं के मद्देनजर देखें तो कर्नाटक में जद-से.  के  हश्र से क्षेत्रीय दलों को सबक लेना होगा. मुस्लिम वोट बैंक की दम वाले दल एसपी,  जद-यू, राजद, तृणमूल काँग्रेस इत्यादि 2024 में काँग्रेस के पास जायें या दूर ही रहें? महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का दल काँग्रेस की वैसाखी पर रहेगा तो रहेगा या नहीं ये बड़ा सवाल होगा.                                             आज ही उत्तर प्रदेश में  ट्रिपल इंजन के नारे पर बीजेपी की निकाय चुनाव में हुई बम्पर जीत ने काँग्रेस की देश के सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीट वाले प्रदेश में हालात को फिर सतह पर रखा है.  कर्नाटक से उत्साहित काँग्रेस को यूपी के आईने में अपनी चुनावी शक़्ल देख लेना चाहिए क्योंकि राजस्थान में पार्टी की रार ही सरकार बरकरार रहने कहे खिलाफ संकेत दे रही है, वहां सरकार हर 5 साल में बदलने का रिवाज भी है,  हालांकि हिमाचल में य़ह बरकरार रहा उत्तराखंड में बदल गया.  कुल मिलाकर काँग्रेस को आक्सीजन और बीजेपी को चिंतन कर्नाटक चुनाव नतीजे दे चुके हैं,  डी के शिवकुमार या sidhdharamaiyya में से कौन ये प्रश्न अभी कई नाटक दिखा सकता है,  कर्नाटक की सियासत का य़ह अहम किरदार है  हिस्सा है. बीजेपी और काँग्रेस के अलावा अन्य दलों के लिए कर्नाटक 2023 के नतीजे 2024 के लिहाज से कई संदेश दे चुका है.  सतीश एलिया

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

आज मेरा भोपाल दिवस

 आज मेरा ' भोपाल दिवस ' है.... 9.9.1991 को अमृतसर दादर एक्सप्रेस से बोरिया बिस्तर लेकर हबीबगंज स्टेशन पर उतरा था... माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पहले बैच में प्रवेश पहले ही ले चुका‌ था, छात्रावास सुविधा मिली तो एक साल का डेरा जमा। फिर सतत पत्रकारिता के तीन दशक, छह संस्थान, अन्य दर्जनों असाइनमेंट। बीजेएमसी‌ के बाद पत्रकारिता के 12 से 18 घंटे तक की रोज की आपाधापी के साथ एमए हिन्दी, एमजेएमसी, एलएलबी भी कर सका। अध्यावसाय कभी नहीं छोड़ा। अखबार, रेडियो, टीवी पत्रकारिता और पत्रकारिता शिक्षण, पुस्तक लेखन हर विधा में भरपूर मौका और संतोष मिला। इन तीन दशक के दौरान मिला मान सम्मान, स्नेह अपार। गंजबासौदा और भोपाल जैसै घर आंगन। कभी करियर बनाने भोपाल नहीं छोड़ा, अवसर‌ और प्रस्ताव विनम्रता से अस्वीकार किए, लेकिन इसका नुकसान भी उठाना पड़ा, सहर्ष उठाया कोई अफसोस नहीं। न नैहर  छोड़ा न भोपाल। न आतंक से न प्रलोभन से खोजी, भ्रष्टाचार को बेनकाब करती, जनहित की पत्रकारिता को प्रभावित होने दिया। धमकियां, हमले, अन्य नुकसान झेले, टिका रह सका, प्रभु की कृपा है। मौद्रिक धन संग्रह नहीं किया, संतोष धन भरपूर मिला, सहयोग की पूंजी से मालामाल रहता आया, प्रोत्साहन अपार मिला। इन तीन दशक के दौरान साथ रहे, पल पल उंगली पकड़कर संभालते रहे, भूलों को क्षमा करते रहे सभी आत्मीय मित्रों, वरिष्ठजनों का ह्रदय से आभार, जो बिछुड़ गए उन दिवंगत मार्गदर्शक अग्रज, गुरुजनों को नमन, सबको दोऊ कर जोरि प्रणाम।

असल में हम गोसेवक नहीं, भैंस सेवक

 आज..प्रजातंत्र अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर..                                                

हम गोसेवक नहीं, असल में भैंस सेवक हैं....                                               - सतीश एलिया                                          कोरोनाकाल      कोरोनाकाल के संकट के बीच बीते करीब तीन माह के दौरान मजबूरी में अपरिहार्य कारणों से  एकाधिक सड़क मार्ग यात्राएं करनी पड़ी। इनमें से एक तो भोपाल से गाजियाबाद की थी, जिसे दिल्ली वाले एनसीआर में शुमार किए हुए हैं। खासकर वे नौकरी दिल्ली में करते हैं, लेकिन मजबूरन बसेरा गाजियाबाद, गुडगाँव या नोएडा में है। खैर, इस यात्रा और मप्र की अन्य सड़क मार्ग यात्राओं में एक चीज कामन है। वो है राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से लेकर प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क नामना सभी किसिम की सड़कों पर जगह जगह बीच सड़क पर दर्ज़नों से लेकर सैकड़ों की तादाद में गायें खड़ी या बैठी मिलतीं हैं। भारी ट्रैफिक वाले मार्गो पर कई जगह वाहन दुर्घटना के मंजर भी मिलते हैं और गायों की सड़ती म्रत देहे भी, जिन्हें कोई नहीं उठाता। इन सभी श्रेणी के मार्गो पर एक बात और कामन है, जो नजर न आने वाली समानता है। किसी भी मार्ग पर भैंस या भैंस परिवार का कोई सदस्य नजर आता। इसका मतलब क्या है? क्या हमारे देश में गायें बहुतायत में हैं और भैंसें बची ही नहीं? असल में हम भैंसो को सहेजकर रखते हैं और गायों को मरने छोड़ देते हैं। जबकि जगह जगह सरकारी खर्च पर बनीं गौशालाए हैं, राज्य सरकारों के गौपालन बोर्ड हैं, उनके मंत्री दर्जे वाले अध्यक्ष, उपाध्यक्ष से लेकर सदस्य हैं। गौशालाओ को अनुदान मिलता है, उनके नाम पर सरकारी जमीनो पर कब्जे हैं, इसका कारोबार है। पूरे देश से बार बार कई बार गायों के भूखों मरने की खबरें आती रहती हैं। भैंसो के बारे में ऐसा नहीं है। क्योंकि दरअसल भैंस पालने वाले उन्हें सहेजकर रखते हैं। वे ज्यादा दूध देती हैं, उनकी कीमत गाय से कई गुना ज्यादा होती हैं। कोई भी उन्हें मरने नहीं छोड़ता सड़क पर, 

गायों को छोड़ देते हैं। गौ माँस के सुबहे में इंसानो को मार डालने वाली भीड़ में शामिल लोगों में से कितने? गायों की जान खतरे में डालने उन्हें सड़क पर छोड़ने वालों से उलझते हैं? शायद कोई नहीं। अन्यथा सड़कों पर हजारों गायें न होतीं और न ही वाहनों से कुचली जा रही होतीं।       मप्र की बात करें तो यहाँ गायों की सड़कों पर भीड़ सर्वाधिक नजर आती हैं। यह बीते करीब दो दशक पहले तक नहीं थी, तब सड़क ही न दिखती थीं। जैसै जैसै सड़कों का जाल बढ़ता गया, गायों का काल भी बढ़ता गया। साल 2018 में जब कांग्रेस की कमलनाथ सरकार आई तो कांग्रेस नेता पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सड़क पर गायों के झुंड की फोटो ट्वीट की थी, तत्कालीन सीएम कमलनाथ ने उसी दिन इस मामले पर बैठक की लेकिन हल कुछ न निकला। निकलता भी कैसै? इसकी जड़ तो खुद दिग्विजय सरकार ने रोपी थी। बतौर मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने गावों की चरनोई भूमि 5 से घटाकर दो फीसदी कर दी थी, चरनोई की 3 फीसदी भूमि दलित एजेंडे पर अमल के तहत भूमिहीन दलितों को पट्टे में खेती के लिए दे दी गई थी। लेकिन ज्यादातर गाँवो में यह पट्टे की जमीन दलितों के बजाए कथित रसूखदारों या दबंगो के कब्जे में है। गाँव की चरनोई की भूमि स्थाई रूप से सिकुड़ गई, गोठान खत्म हो गए सो सड़क पर आ गए। गो भक्ति का नारा लगाने, गौशालाओ का शोर मचाने वालों से लेकर गाय के नाम पर सियासत चमकाने वालों तक किसी को सड़क पर खड़ी, बैठी और कुचली जा रही गायों की फिक्र नहीं है, होती तो जैसै सड़कों पर भैंस नजर नहीं आती, गाय भी न दिखती। वह भी भैंस की तरह ससम्मान घर में रखी जाती, उसकी भी सेवा होती। दिल पर हाथ रखिए और कहिए की हम गौ भक्त, गोसेवक नहीं, भैंस सेवक समाज हैं।


इस गौ हत्या के खिलाफ भी बने कानून.....                       हमारे देश में गाय हमेशा धर्म, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी रही है। हम गोपाल क्रष्ण की पूजा करते हैं, गाय की पूजा करते हैं। गौ हत्या निषेध कानून बनवाने के लिए कितने बलिदानी आंदोलन हुए हैं, दिल्ली की सड़कों का खून बहा है। उन घटनाओं की तस्वीरो का अब भी उपयोग किया जाता है, लेकिन आज की  आज की हालत की असल तस्वीर से हम और हमारे हुक्मरां मुँह कैसै मोड़ लेते हैं? वे भी इन्हीं सड़कों से ही गुजरते हैं न। देश के कई राज्यों में जिनमें मप्र भी शामिल है, गौवंश वध निषेध लागू है। इस अपराध के लिए गंभीर और कड़ी सजा के प्रावधान हैं। लेकिन क्या सड़कों पर गायों को यूँ मरने छोड़ने वालों के लिए भी सजा का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए?                                                     हर गाँव में आरक्षित हो गोठान भूमि, बने सायेदार पक्के गोठान........                                                            अगर हम और हमारी सरकारें वाकई गाय को महत्व देते हैं तो हर गाँव में खासकर सड़क किनारे के गाँव में गोठान की भूमि आरक्षित कर उन पर पक्के छायादार निमार्ण करने होंगे। ताकि मौसम और दुर्घटना की मार से गायों को बचाया जा सके। इस काम में राजनीतिक श्रेय और स्वार्थ परे रखना चाहिए। जहाँ जहाँ गोठान की भूमि सरकारी दस्तावेजों में है, उसे बेजा कब्जे से मुक्त कराकर पशुओं को उनका देने की मुहिम की दरकार है। इस तरह  गायों को भी बचाया जा सकता है और सड़कों पर यातायात भी सुगम किया जा सकेगा।

गुरुवार, 3 जून 2021

एक शब्द ' भावई' और कोरोना महामारी

....                    सतीश एलिया                                                               मेरा  मन सदैव देसज शब्दोँ की रम्यता और उनके देसज बनने  की यात्रा को जानने को उत्सुक रहता है बचपने से ही। पिताजी की ग्राम्य पृष्ठभूमि और मेरा जन्म कस्बे में होने से सदा देसज बोली, शब्द मन में रचे बसे रहते हैं। आज इस शब्द भावई की बात। बचपन से गाँव में, कस्बे में हर किसी से यह शब्द सुनता आया हूँ। पिताजी, ताऊजी जिन्हें हम सब दादा कहते थे, यह शब्द बोलते थे खासकर किसी मुसीबत के आ टपकने पर। इस शब्द की देसज उत्पत्ति की कथा अब उदघाटित हुई कोरोनाकाल में। पिताजी इन दिनों करीब करीब रोज ही यह कथा सुनाते हैं, आँखो देखी और भोगी हुई। उन्हीं की जुबानी- 'संवत 2013 (ई. सन 1956 ) में आषाढ़-सावन-भादों (जून-जुलाई-अगस्त) में ऐसी बीमारी फैली की देश भर में लाखों लोग मर गए थे। एक तो इलाज, डाक्टर, अस्पताल थे ही नहीं, कोसों एकाध छोटी सरकारी अस्पताल थी भी तो सुविधाएं न थी, फिर बीमारी ने मौका भी न दिया। लोग झाड़ फूंक के भरोसे भगवान के सहारे बचने का प्रयास करते। हमारे गाँव बरबाई (तहसील कुरवाई, जिला विदिशा- मप्र) की आबादी तब 500 से कम ही थी, तीन दर्जन से अधिक मौतें हुई थी। लोग मौत से आतंकित थे, इसे नाम दिया भावई मने भयावह। पिताजी दूसरे गाँव में थे, दोनों बड़े भाई दो अलग अलग गाँवो में भागवत कथा कह रहे थे। भावई पड़ी तो हर गाँव में मौत ही मौत। तीनों गाँवो के बाहर झोपड़ी बनाकर रहे और तीन माह घर नहीं लौटे। यहाँ हम करीब 17-18 साल के और 8- 9 साल उम्र के छोटे भाई। भाई की आँखो में बीमारी हो गई, आँखे चिपक गई। देसी घरेलू इलाज जारी था। घर के बाहर गुरसी में कंडे की आग में गुड डालकर लगातार धूनी देते रहते थे। हमारा घर गाँव के चंद सौभाग्यशाली घरों में था, जहाँ इस भावई में सब सुरक्षित रह पाए। घर के सामने ' बंगला' में कष्ट निवारण के लिए संकीर्तन चल रहा था, उन लोगों में से एक तो बीमार होकल ऊपर से लुडके और खतम हो गए। तीन लघुशंका को गए और वहीं गिरकर मर गए। उधर एक घर में कोई दामाद अपनी पत्नी को लिवाने आए थे, सास ससुर पत्नी और वे खुद एक ही दिन में चटपट हो गए..छोटा सा बेटा ही जीवित रहा। गाँव में महामायी के चबूतरे पर बैठा पंडा लोगों को भावई से मुक्त करने नीम के झौरे से झाड़नी दे रहा था, आसपास के गाँव से आई जातरू यानी भीड़ लगी थी, भीड़ में से तीन चार चक्कर खाकर गिरे और मर गए। पंडा चबूतरे पर से गिरा और मरा तो भगदड मच गई। भादों के महीने में भारी।और लगातार बारिश...कैसै अंतिम संस्कार हो, नाले में लाशे बहाने के अलावा कोई चारा नहीं। कुछ दिन बाद स्वास्थ्य कर्मियों की टीम जिसमें तीन लोग थे, आई तो लोग उन्हे भगा देते..उसमें से भी एक की मौत हो गई। वैसै महामारी फिर कभी नहीं देखी, अब 65 साल फि, मौतें लेकिन यह भावई से फिर कम है, इलाज तो मिल पा रहा है, फिर भी कोरोना भावई सा ही है। '  पिताजी की इस भावई व्यथा कथा को अगर सरकारी रिकार्ड रिपोर्ट्स में देखें तो 1956- 57 के एशियन फ्लू में भारत में मौतों की अधिक्रत संख्या 10 लाख थी, प्रधानमंत्री थे पंडित जवाहरलाल नेहरू। सरकार कोई भी हो जनता को पक्का यकीन है कि संख्या दो गुनी से ज्यादा होती है कम नहीं। नेहरू इसके सात साल बाद तक आजीवन प्रधानमंत्री रहे। भावई का पूरा सच शायद कभी पता ही न चले। आज मीडिया, सोशल, अनसोशल तमाम तरह  का मीडिया है, स्वतंत्र, गुलाम सर्वे, जाँच एजेंसियां हैं, श्मशानघाट, कब्रिस्तानो को गूगल मैप से लेकर कई तरीके से देखा निगरानी में रखा जा सकता है। कोरोना से मौतों का सरकारी आकड़ा करीब तीन लाख हो चुका है...यानी भावई मने एशियन फ्लू का करीव 30-35 प्रतिशत..। तीसरी लहर की आशंका....वैरियंट्स की कतार...साइड इफेक्ट्स...भावई तो है... उस भावई से बचने का वक्त और बचाव, इलाज न था, इस भावई से बचने के उपाय, वक्त, इलाज सब मौजूद है,, बच सकते हैं....खुद बचिए, दूसरों को सचेत कीजिए...बचाइए। मास्क लगाइए, फिजिकल डिस्टेंस रखिए, सेनेटाइज कीजिए...बारी आने पर वैक्सीन लीजिए...भावई मत बनिए।

रविवार, 24 जनवरी 2021

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

मंडी के बाहर एमएसपी से कम पर फसल न बिकने देने की गारंटी क्यों नहीं दे रही सरकार

                                                          - सतीश एलिया                                                     

लोकसभा में भारी हंगामे और एनडीए कुनबे के प्रमुख और सबसे पुराने दल के विरोध के बावजूद कृषि संबंधी तीनों बिल पास होने के बाद इस मामले पर सियासत और विराेध की आखिर क्या प्रमुख वजह है? खेती घाटे का धंघा और लगातार किसानों की आत्महत्याओं के करीब ढाई तीन दशक के जारी दौर के बीच खेती से किसानों की आय को दाेगुना करने के दावे वाले तीनों अध्यादेशों के विधेयकों का विरोध सियासी कारणों से तो ही रहा है लेकिन इसको किसानों के संगठनों का समर्थन और किसानों के मन में आशंका का प्रमुख कारण उन्हें हर हाल में समर्थन मूल्य से कम पर खरीदी नहीं होने की स्पष्ट गारंटी नहीं मिल रही है। सरकार की मंशा किसानों को अपनी फसल बेचने के अधिक अवसर और नकदी पाने की सुनिश्चितता के भले हों लेकिन मल्टी नेशनल कंपनियों को लेकर किसानों के अब तक के अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। यही वजह है कि इन विधेयकों को विरोध हो रहा है। सरकार को किसानों की आशंकाओं का निवारण और सियासी कारणों का खुलासा भी स्पष्ट रूप से कराना होगा और यह भी जरूरी है कि किसानों को फसल बेचने के बाद के संभावित विवादों से निपटने की सरकार की तरफ से गारंटी भी मिले। देखना यह है कि उच्च सदन यानी राज्य सभा में इन विधेयकों को लेकर हंगामा किस रंग में नजर आएगा। यह भी देखना होगा कि क्या इन विधेयकों को लेकर उठे सवाल और चिंताओं को लेकर सरकार सियासी विरोध को सीएए, जम्मू कश्मीर से 370 हटाने और तीन तलाक को गैर कानूनी बनाने की तरह दरकिनार कर पाएगी। यह तो तय है कि सरकार किसी भी सूरत में किसानों की नाराजी को अपने खिलाफ हथियार नहीं बनने देगी। किसानों की आशंकाएं दूर करने मंडियों के बाहर भी एमएसपी बनाए रखने पर  सरकार को जोर देना होगा।                                  कोरोनाकाल में लाए गए थे अध्यादेश इसलिए असर पर प्रतिक्रिया नहीं मिली.....  
लोकसभा में पास तीनों  विधेयकों को उन अध्यादेशोंं के जगह लाया गया है जो कोरोनाकाल के लॉकडाउन वाले काम में लाए गए थे। इसलिए सरकार उन पर किसानों, सियासी दलाें, राज्य सरकारोें की प्रतिक्रिया को भांप नहीं पाई। कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सुविधाएं विधेयक 2020, मूल्य के आश्वासन पर किसान बंदोबस्ती और सुरक्षा समझाैता विधेयक 2020 तथा कृषि सेवा विधेयक 2020 को लेकर सरकार का दावा है कि इनसे किसानों की आय लागत से दो गुनी करने का लक्ष्य वर्ष 2022 तक हासिल किया जा सकेगा। विधेयकोें को लेकर एनडीए के सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल का सरकार से अलग होने जैसे सख्त विरोध के बावजूद सरकार अपने कदम के फलीभूत होने को लेकर आश्वस्त दिख रही है। हर सिमरत कौर बादल का इस्तीफा मंजूर किए जाने से यह स्पष्ट है कि भाजपा इस मामले में एनडीए की भी परवाह नहीं कर रही है।   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कई शक्तियां किसानों को भ्रमित करने में लगी हैं। विधेयक किसानों और बिचौलियों और अन्य अवरोधों से मुक्त करेंगे।  उन्हें उपज बेचने के नए अवसर मिलेंगे। सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की जाने वाली सरकारी खरीद जारी रखने का आश्वासन दिया है। यानी किसान के पास मंडी और समर्थन मूल्य पर  उपज खरीदी के लिए बनाए जाने वाले खरीदी केंद्रों पर अपनी उपज बेचने का अधिकार बना रहेगा। लेकिन मंडियों और खरीदी केंद्रों से बाहर खरीदी के लिए एमएसपी की अनिवार्यता के बारे में न विधेयक में और न ही सरकार के वक्तव्य में ठोस वादा है।                                                                                                                               अकाली दल और अन्य दलों की क्या हैं दलीलें......  
भाजपा और एनडीए के प्रमुख सहयोग शिरोमणि अकाली दल के मुखिया सांसद सुखबीर सिंह बादल ने इन विधेयकों को लेकर आशंका जताई है कि इससे प्रभावी और जमी जमाई किसान हितैषी मंडी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। यही आशंका कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस आदि दल और किसान संगठन भी जता रहे हैं। केंद्र सरकार को क्षेत्रीय दलों, राज्य सरकारों की आशंकाओं को दूर करना चाहिए। किसान और खेती इस देश की अर्थ व्यवस्था और सियासत दोनों का केंद्र बिंदु है। देखना ये है कि एनडीए कुनबे के जद-यू जैसे दलों की इस मामले में क्या प्रतिक्रिया सामने आती है। क्योंकि बिहार चुनाव सामने है। मप्र में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव सामने और उसके नतीजे राज्य सरकार का भविष्य तय करेंगे। इन उपचुनाव में किसानों के मामले पहले से ही चुनावी मुद्दा बने हुए, ऐसे में ये विधेयक कांग्रेस के हाथ में एक और मामला लगने जैसा है। हालांकि 2018 में कर्ज माफी वादा कर सत्ता में आई कांग्रेस अपने दल में टूट होने से सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस पर भाजपा वादा खिलाफी का आरोप लगा रही है तो कांग्रेस वादा पूरा करने करने के साथ ही भाजपा पर किसान विरोधी होने का आरोप लगा रही है।                                                  राज्य सरकारों की आय का बढ़ा स्त्राेत हैं मंडियां....                                                     देश के कृषि कारोबार में कृषि उपज मंडियों की प्रमुख भूमिका है। पंजाब, हरियाणा, मप्र, उप्र, राजस्थान समेत लगभग सभी प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में अनाज मंडियां सरकारी क्षेत्र में हैं। सभी सरकारों की आय का बढ़ा जरिया मंडी टैक्स है। यह दो से आठ फीसदी तक वसूला जाता है। कई राज्यों में यह प्रमुख राजस्व स्त्रोत है। पंजाब में यह साढ़े चार फीसदी है। मप्र समेत कई राज्यों में तो मंडियों की सुप्रीम संस्था मंडी बोर्ड जो सरकारी उपक्रम ही है, राज्य पर आर्थिक संकट के वक्त कर्मचारियों के वेतन बांटने के लिए रकम पाने का साधन बनते रहे हैं। मंडी टैक्स से होने वाली आय ग्रामीण क्षेत्रों में सडक इत्यादि तथा अन्य विकास कार्यों और गौधन सेवा जैसे कामों में भी उपयोग में लाई जाती रही है। ऐसे  में मंडी टैक्स में कमी की चपत को लेकर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें भले ही खुले तौर पर कुछ न बोलें लेकिन यह मामला भी जीएसटी की ही तरह केंद्र राज्य तनातनी का कारण बन सकता है। केंद्र सरकार को मंडी के बाहर बिना टैक्स के ही कृषि उपज कंपनियों और व्यापारियों को बेचने का इंतजाम करने को लेकर राज्योें की सहमति लेनी चाहिए थी और इसके लिए राज्य सरकारों को जीएसटी लागू होने से होने वाले नुकसान की भरपाई की ही तरह कोई फार्मूला भी खोजना चाहिए।                                                                               मप्र में हुआ था इसी तरह का प्रावधान और भारी  विरोध......                            करीब दो दशक पहले मप्र में भी सरकारी कृषि उपज मंडियों से बाहर किसानों से अनाज खरीदी का प्रावधान किया गया था। तब मल्टी नेशनल कंपनी आईटीसी ने प्रदेश में कई जगह अपनी अनाज खरीदी मंडी खोली थीं। विदिशा और विदिशा समेत कई जगह यह आईटीसी चौपाल अब भी काम कर रहे हैं, जहां किसान के लिए सुपर मार्केट भी बने हैं। किसानों और राजनीतिक दलों न तब प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन और मंडी बंद आंदोलन किए थे। लेकिन मप्र में अब भी सरकारी मंडी और समर्थन मूल्य पर खरीदी के केंद्र ही प्रभावी बने हुए हैं।