बुधवार, 19 अगस्त 2009

जो कर रहे थे, यही चाहते थे जसवंत......

अटल सरकार में विदेश और वित्त मंत्री रहे जसवंत, कंधार कांड के खास पात्र रहे जसवंत हाल ही में दूसरे राज्य से जीते जसवंत, राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत के बाद दूसरे क्रम के नेता रहे जसवंत, जिन्ना की तरफदारी के चलते भाजपा के घर से बाहर धकेल दिए गए। लेकिन क्या वे केवल जिन्ना प्रेम की बलि चढ़ गए, अगर ऐसा है तो फिर आडवाणी क्यों पीएम इन वेटिंग बना दिए गए। जसवंत ने तो किताब लिखी, आडवाणी तो जिन्ना की मजार की जियारत कर आए थे और उन्हें सेक्युलरिज्म का मसीहा बता आए थे। दरअसल जिन्ना पर किताब चिंतन बैठक के ऐन पहले आने की वजह से सतह पर कारण की तरह तैर रही है। किसी भी मुददे को चलताऊ ढंग से मचा देने में माहिर मीडिया भी ऐसा ही प्रचारित कर रहा है। लेकिन असल में जसवंत का निष्कासन जिन्ना पर किताब की वजह से नहीं है बल्कि इसके पहले पार्टी की हार पर बुनियादी सवाल उठाने की हिमाकत की वजह से है। हालांकि यशवंत सिन्हा भी ऐसा ही रुख दिखा चुके हैं। पार्टी विद डिफरेंस का भ्रम पालने भाजपा में भी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कहने को हिमाकत ही माना जाता है। हालांकि भाजपा इसी रवैये को लेकर कांग्रेस की आलोचना करती रही है, करती है और करती भी रहेगी। अन्य दलों में भी कमोबेश यही आलम है, भले धुर दक्षिण पंथी शिवसेना हो धुर वामपंथी भाकपा, माकपा हों या व्यक्तिपंथी डीएमके, एआईडीएमके, तेलगुदेशम हो या फिर बाल्यकाल वाले टीआरएस या प्रजाराज्यम जैसे दल। विरोध के सुर को दबा दिया जाता है। भले कोई नया नेता हो या फिर जसवंत सिंह जैसा वरिष्इ और पुराना नेता हो। लेकिन इतना तय है कि वसुंधरा राजे मामले से ठीक से नहीं निपट पा रहे भाजपा नेतृत्व ने जसवंत को निष्कासित कर फिलहाल दादागिरी भले दिखा दी हो, उसे इसका भी खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा। हाल ही में लोकसभा चुनाव में मुहं की खा चुकी भाजपा ने मप्र में उमा भारती के साथ भी यही किया और गुजरात में नरेंद्र भाई की दादागिरी का समर्थन कर केशुभाई के साथ भी यही किया। नतीजे में भाजपा को राजस्थान में तो पटखनी खाना ही पड़ी, मप्र में भी उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है। भाजपा के लगभी सभी निष्कासन प्रकरणों को देखकर लगता है, भाजपा में एक किस्म का असंतोष नेताओं के लेबल पर पिछले एक दशक में धीरे धीरे पनपता, उभरता और दिखता रहा है। उसका इलाज जिस ढंग से किया गया, वह असल में इलाज नहीं बल्कि मर्ज को बिगाडऩे की ही तरह नतीजे वाला रहा। लोकसभा चुनाव के हार का ठीकरा फोडऩे के लिए भाजपा को सर नहीं मिलने के संकट के चलते अब एक दूसरे के सरों का इस्तेमाल करने की हिकमत अमली आजमाई जा रही है। देखना ये है कि शीर्ष पर चल रहे इस प्रहसन को कार्यकर्ता और समर्थक अर्थात वोटर किस तरह से लेते हैं, क्योंकि लोकसभा, विधानसभा चुनाव के अलावा स्थानीय स्तर के चुनावों मेंं भी बिखराब का रंग दिखता है। गुजरात में जूनागढ़ में मोदी की भद पिटने, लोकसभा चुनाव में मप्र में शिवराज का असर बिखरने और राजस्थान में विपक्ष में बैठने के बाद गृह कलह चरम पर आने का असर इन राज्यों में फिर स्थानीय चुनावों में देखने को मिल सकता है। संघ पुत्री भाजपा को अपने बुजुर्ग नेताओं को निष्कासित करने के बजाय उनके लिए नई भुमिकाएं तलाश कर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम करना चाििहए, संघ प्रमुख मोहन भागवत भी यही कह रहे हें। भाजपा को चिंतन इस पर भी करना चाहिए कि वह डेढ़ दशक पहले जनता की जितनी तेजी से चहेती बन रही थी, उन मुददों को छोडने से उसे कितना नुकसान हुआ और वह नई जनरेशन में वही भाव किन मुद्दों की ताकत पर जगाया जाए।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

अमेरिका में कोई आपको जानता है, पूछना खराब लगा शाहरूख को

फिल्म एक्टर शाहरूख खान को अमेरिकी हवाई अडडे पर डेढ घंटे तक रोके रखा जाना बिल्कुल बुरा नहीं लगा, उन्हें बुरा लगा तो सिर्फ ये कि उनसे यह पूछा गया कि क्या अमेरिका में कोई है जो उनकी शिनाख्त कर सके। शाहरूख ने अमेरिका से लौटने के बाद डेढ घंटे चली प्रेस कान्फरेंस में तीन दिन से से इसी खबर को मचाए हुए और बार बार एक ही तरह के सवाल कर रहे पत्रकारों को बार बार बताया कि अमेरिका ने मुझे बुलाया नहीं था, मुझे काम था इसलिए गया, जब भी काम होगा फिर जाउंगा, कोशिश होगी कम जाउं, यह भी कहा कि पूरे दुनिया में जाति धर्म और रंग के आधार पर भेदभाव होता है यहां तक कि हमारे देश में भी होता है, यह कोई मुददा नहीं है क्योंकि हमने दुनिया ऐसी ही बना ली है तो ऐसी ही दुनिया में रहना होगा। यह भी कहा कि कलाम साहब के साथ जो भी हुआ वह बडा मामला है, न मैं बडा हूं और न ही मेरे साथ जो वह बडा है। उन्होंने बार बार दावा किया कि वे घटिया कमेंट नहीं करते, न करना चाहते हैं और पूरे वाकये को भुलाकर भविष्य की ओर देखते हैं। लेकिन मीडिया के घुमा फिराकर दोहराए गए सवालों से विचलित न होने का अभिनय करने के बावजूद वे विचलित भी हुए और ऐसी टिप्पणियां भी कीं जिसके लिए वे कुख्यात हो चुके हैं। मसलन उन्होंने मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह की टिप्पणियों के बारे में जवाब देते वक्त घटिया, शोहदे और टुच्चे जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह भी कहा कि वे सिली ब्लाॅग्स की भी परवाह नहीं करते। वे खुद को बेहद सामान्य आदमी बता जरूर रहे थे, लेकिन उन्हें अमेरिका में चुभी यही बात की उनसे यह पूछा गया कि कोई अमेरिका में उनकी शिनाख्त कर सकता है क्या? असल में शाहरूख को अमेरिका में अपमान झेलना पडा और उसकी उन्होंने ना ना करते हुए अभिव्यक्ति भी की। लेकिन वे फिर अमेरिका जाएंगे, यह उनकी और उन जैसे कलाकार, नेता, व्यवसायी, एनआरआई बनने के ख्वाहिशमंदों की मजबूरी है। वे भरपूर धन कमाना चाहते हैं, धन के आगे अपमान भला क्या चीज है? शाहरूख खान की जो फिल्में धनवर्षा करने वाली साबित हुई हैं, वे अमेरिका में चलने के कारण ही कमाउ साबित हुई हैं। असल में करण जौहर टाइप सिनेमा भारत में चलेगा यह ध्यान में रखकर नहीं बल्कि ओवरसीज अर्थात अमेरिका में कितना चलेगा, यह सोचकर बनाया जाता है। भारत को भुलाकर अमेरिका की राह पकडने में अपमानित होना पड रहा है, जैसे आस्ट्रेलिया और अन्य मुल्कों में भारतीय मूल के लोगों की पिटाई हो रही, यह उसका बदला हुआ रूप ही है। अपने देश को जुबान से महान कहते जरूर हैं लेकिन मानते महान उन मुल्कों को हैं जिनकी मुद्रा भारतीय मुद्रा से कई गुना कीमती है। कहावत है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, असल में जिसकी मुद्रा ताकतवर भैंस उसी की है। अमेरिका हो, आस्ट्रेलिया हो, इंग्लैंड हो, या कोई और ताकतवर और संपन्न मुल्क, वहां आपके साथ ऐसा ही व्यवहार होगा। भले आप आम भारतीय हों या फिर फिल्म एक्टर। आप वहां दोयम दर्जे के आदमी हैं, वहां रहने लगे हैं तो दोयम दर्जे के नागरिक हैं। वहां जाने, बसने या वहां से लौटने पर यहां के लोगों पर भले रौब गांठिए लेकिन सच्चाई ये है कि आप दोयम दर्जे का व्यवहार पाते हैं। मीडिया शाहरूख के मामले जो चिल्ल पों मचाई, उनके लिए वह उस दिन की नौकरी थी। कोई और मसला आ जाता तो शाहरूख की खबर दब jati .

शनिवार, 15 अगस्त 2009

62 सालों में हमने सर्वाधिक प्रगति भ्रष्टाचार में की...

अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति की 62 वीं सालगिरह पर उन सबको मुबारकवाद जो देश से प्यार करते हैं और किसी भी किस्म का कोई भ्रष्टाचार नहीं करते, जिनकी आबादी देश की आबादी का 95 फीसद है, और जो किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार से पीडित हैं। बिना पैसा दिए अपनी ही जमीन की नपती नहीं होती, नामांतरण नहीं होते, पात्रों को भी योजनाओं का फायदा बिना कमीशन दिए नहीं होते, बिना कमीशन सडक नहीं बनती, कोई निर्माण कार्य नहीं होते। पोस्टिंग में रिश्वत, तबादले में रिश्वत, खबर छपने, रूकने, दिखाने, नहीं दिखाने में लेनदेन, खेलों में घोटाले, टिकिट वितरण में खेल, मंत्री बनने नहीं बनने देने में खेल, दवाओं मंे मिलावट, दूध में मिलावट, किसी कोई चीज नहीं जिसमें मिलावट जमकर न होती हो। कालाबाजारी, बेईमानी, मक्कारी सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में इस कदर समाई है कि ईमानदारी को एक तरह से बेवकूफी की श्रेणी में रखने की हिमाकत अब सामान्य बात है। मैं यह सब इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आप भी देख रहे हैं और मैं भी यह सब देख रहा हूं। मैंने उस सेवा के लोगों को अपने मातहतों के जरिए खुलेआम पैसे लेते देखा है जिनके बारे में कुछ लिखना भी मानहानि के दायरे में आ जाता है। पूरे देश ने देश की सबसे बडी पंचायत में प्रश्न पूछने नहीं पूछने वोट देने नहीं देने में रिश्वत का खुला खेल सीधे प्रसारण के जरिए उजागर होते देखा है। ऐसा नहीं है कि बस यही पक्ष है और देश ने प्रगति नहीं की है। देश ने निःसंदेह 62 सालों मंें बेहतर प्रगति भी की है, आवागमन, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर अन्य सभी जरूरतों में सहूलियतें काफी बढी हैं लेकिन भ्रष्टाचार कैंसर की तरह हर क्षेत्र में समा गया है। हमारा लोकतंत्र परिपक्व हुआ है अब लोग नारों के आधार पर प्रचार से प्रभावित होकर मतदान नहीं करते, वे वादे पूरे नहीं करने वाली सरकारों को बदल डालते हैं। लेकिन अब धर्म और जाति के नाम पर टिकिट तय होना और वोट डाले जाना ज्यादा हो गया है। न जनता भ्रष्टाचार को मुददा मानती है और न ही सरकार की प्राथमिकता उसे खत्म करने की है। बातें जरूर सब पारदर्शिता की करते हैं। डा. मनमोहन सिंह ने आज लाल किले की प्राचीर से यही कहा और भोपाल के लाल परेड मैदान पर मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान भी यही बोले । लेकिन सही मायने में हमारे लोकतंत्र को भ्रष्टाचार से लडने की जरूरत है। सरकारों के स्तर पर भी और जनता के स्तर पर भी इससे लडना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए। अन्यथा शातिर, चालाक, बेईमान और भ्रष्ट लोगों का राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता से लेकर हर सार्वजनिक पेशे में दबदबा कायम होने का सिलसिला थमेगा नहीं और हमारे देश को विश्व शक्ति बनाने का हमारा सपना पूरा हो गा नहीं। आप सबको आजादी की सालगिरह की मुबारकबाद, जय हिंद।

रविवार, 9 अगस्त 2009

मुझको यारो माफ करना मैंने दाल खाई ......

मित्रों आज बरोज रविवार मैंने दोपहर तीन बजे अरहर की दाल खाई। पूरे मुल्क से डा. मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल बाला से लेकर मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वित्त मंत्री राघवजी से लेकर उन तमाम लोगों से क्षमायाचाना करते हुए यह कन्फेस करता हूं कि 90 रुपए किलो होने के बावजूद मैंने दाल खाई है। औकात नहीं होने के बावजूद दाल खाना मेरे तई जुर्म की श्रेणी में आता है। यकीन मानिए दाल खाने के बाद पेट इस कदर भर गया है कि लगता है कई दिन खाना न भी मिले तो चल सकता है। दरअसल मुझे अपने एक निकट रिश्तेदार ने दोपहर करीब एक बजे अचानक फोन किया कि दाल बाफले बन रहे हैं, आप सादर आमंत्रित हैं। तो जनाब मुझे दाल मयस्सर हो गई। मैंने मेजबान के घर पहुंचते ही कहा - धन्य हैं आप जो मुझे दाल खाने के लिए आमंत्रित किया। मेरे तईं आप रईसों की श्रेणी में आ गए हैं। वो जमाने लद चुके हैं जब कहा जाता था दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ। अब तो दाल लग्जरी आयटम है। जैसे एनडीए के जमाने में एक दफा प्याज लग्जरी हो गई थी। वैसे मनमोहनजी के दूसरे कार्यकाल में दाल हो गई है। इन दिनों रिश्ते के लिए आने वालों को खास तौर पर दाल और उससे बने व्यंजन परोसना रईसी की बात हो गई है। इसमें भी जितनी गाढी दाल उतने ज्यादा रईस। हमारे एक ईमानदार पत्रकार मित्र ने बताया कि उनके यहां दाल बनी है तो मैंने उन्हें शक की निगाह से देखा, वे बोले यह तो पुराने रेट की बची हुई दाल थी। उसमें भी पत्नी ने कहा कि एक भी दाना छोड़ा तो तुम जानना, आगे से दाल बनेगी ही नहीं। घरों में चर्चा का विषय है तो दाल। अब तो मुहावरे भी कुछ इस तरह बनने चाहिए , मैं दाल हराम नहीं हूं, सरदार मैंने आपकी दाल खाई है। फिल्मों के नाम भी कुछ इस तरह हो सकते हैं- दाल का कर्ज, दाल हलाल, दाल हराम, दाल की जंग, दाल वाला और दालवाली। मप्र की सरकार दाल पर लायसेंस प्रणाली लागू करने पर प्रारंभिक तौर पर विचार कर रही है। इसका व्व्यापारी वर्ग ने विरोध जताया है। वैसे शक्कर पर कंट्रोल लागू करने से उसके दाम भी नहीं गिरे तो दाल के भला कैसे गिर सकते हैं। तो मित्रों मुझे माफ करना, मैंने दाल खाई है।

बुधवार, 5 अगस्त 2009

आया है मुझे फिर याद वो जालिम.......


मुकेश जी का गाया ये गीत इस पूरे महीने से मेरे जेहन में गूंज रहा है। आया है मुझे फिर याद वो जालिम गुजरा जमाना बचपन का.......। इस बार सावन करीब करीब सूखा बीता है लेकिन फिर भी उसका असर तो है ही, यह महीना, यह गाना हमें सावन के महीने और राखी के त्योहार की सुखद स्म्रतियों में ले जाता है। जब हम छोटे थे और घर में, मोहल्ले में और पूरे शहर में त्योहार का माहौल फिजां से लेकर हमारे दिलों तक पर पूरी शिददत से अपना साम्राज्य कर लेता था। लडकियां मेंहदी की झाडियों से पत्ते खुद चुनकर लाती थीं और सहेलियां या बहनें मिलकर उसे पीसती थीं, घर के लडके भी उनका हाथ बंटाते थे। मेरी तो पांच में से तीन बहनें बडी हैं और इकलौते भाई का जलवा किसी राजकुमार से कम न था। पूरे मोहल्ले में सबसे ज्यादा राखी बंधवाने वाले चंद सुपर स्टार्स में हम भी थे। हाथ कंधे तक भर जाता था। फिर पिताजी को राखी बांधने के समय बुआजी भी हमें राखी बांधती थीं। हम तो जगत भैया थे, पिताजी अम्मा भी मोहल्ले वाले भी और घर के किरायेदार भी सभी के भैया। दोस्तों की संख्या इतनी की अब याद करते हैं तो लगता है, क्या बेहतरीन दिन थे। सावन के महीने में भौंरे यानी लकडी के लटटू जिन्हें डोरी मढकर फिर उसे खींचकर जमीन पर नचाया जाता था। पूरे मोहल्ले के लडके रंग बिरंगे लटटू लेकर कौन कितना भौंरा घुमाता है, जमीन से भौंरे को घूमते हुए ही हथेली पर लेने में महारथ हासिल करने वाला इस प्रदर्शन में प्रिंस की तरह सम्मान पाता था। हमने भी भारी प्रेक्टिस के बाद यह गुर सीख ही लिया था। चकरी, जिसमें धागा या तांत की डोरी होती थी, उसे उंगली में फंसाकर घंटो फिराते रहते थे लडकों के हुजूम। लडकियां झूला झूलने और चपेटे खेलने में मग्न रहती थीं। हम जैसे ठसियल लडके चपेटे खेलने में भी पीछे नहीं रहते थे। बेचारी बहनें अपनी सहेलियों के साथ चपेटे खेलने में अपने प्रिय भाई के ठसने से खूब नाराज होतीं थी लेकिन रोने के सिवाय कुछ कर नहीं पाती थीं। सभी बहनों और भाईयों के बीच इस किस्म के झगडे लगे रहते थे। लडकियों का एक डायलाॅग लडकों को मूलतः लडकियों के माने जाने वाले खेलों से भगाने के लिए रामबाण का काम करता था। वे समवेत स्वर में कहती थीं- मोडियों में मोडा खेले वाको बाप चपेटा खेले। लेकिन जब वे चपेटे के खेल में ऐसा कहती थीं तो ढीट बनते हुए लडके कहते बाप नहीं हम खुद ही खेल रहे हैं चपेटे, लो हम चपेटे ही फेंके देते हैं। लडकियांे में चीख पुकार गुहार मच जाती है- ये भैया चपेटे फेकियो मत। चपेटे लाख के मिलते थे बाजार में लेकिन लडकियां पत्थरों को चोकोर घिसकर खुद बनाने में ज्यादा यकीन करती थीं। हमारे मोहल्ले में झूले डालते थे हम लोग लेकिन बहनें ज्यादा झूलती थीं, हम लोगों का मूड हुआ तो लडकियांे को फिर हटना ही पडता था, उन बिचारियों को घरों में मांओं के साथ पकवान बनाने की तैयारी भी करना पडती थी। मेंहदी लडके भी हाथों में रचवाते थे बहनों से। जिन लडकियों को खूब रचती वे कहती भैया खूब चाहता है हमें इसलिए रचती है, और भाई कहते हमारी बहनें खूब चाहती हैं इसलिए देखो खूब सुर्ख रची है मेंहदी। जिनको न रचती तो उनसे कहते अच्छी नहीं थी मेंहदी, अब हाथ में चूना लगा लो फिर तेल मल लेना, मेंहदी का रंग गहरा हो जाएगा। अनगिनत यादें हैं, अनगिनत अनुभव हैं सावन और राखी त्योहार के। दोस्तों के भाई बहनों के खेल खिलौनों के मेंहदी के झूले के राखी के चकरी के भौंरों के चपेटों के। बहनें अब भी हैं, राखी अब भी बंधती है, दोस्त अब भी मिलते हैं, लेकिन न अब वो झूले हैं, न वो चकरी भौंेरे हैं, न मेहंदी की पत्तियां तोडना पीसना रचाना है, न घर में वैसे पकवान बनते हैं और न ही राखी के दूसरे दिन की भुजरिया यानी कजलियों का उत्सव है। लगता है अब सब कुछ मशीनी या औपचारिकता होता जा रहा है, न बच्चों में उस शिददत वाला उत्साह दिखता है। लेकिन बाजारों मंे बसों में रेलों में भीड हैं लोगों को त्योहार मनाने की दिलचस्पी बरकरार है। सब बहनों को सब भाईयों को राखी का पर्व शुभ हो यही कामना है।

शनिवार, 1 अगस्त 2009

भाभी जी की तबियत अब कैसी है!

यह सवाल शुक्रवार को मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से उनके चैंबर में आधा दर्जन संवाददाताओं ने समवेत स्वर में पूछा, इनमें से ज्यादातर टीवी पत्रकार थे। मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वस्त किया कि चिंता की कोई बात नहीं है मिसिज चीफ मिनिस्टर अब बेहतर हैं। दरअसल श्री चौहान दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नक्शे कदम पर चलते हुए केवल बाइट देने टीवी न्यूज चैनल के नुमाइंदों को अचानक बुलवा लेते हैं। जिन अखबारी संवाददाताओं की बीट अर्थात रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मंत्रालय, कैबिनेट मीटिंग, मुख्यमंत्री या भाजपा है, उन्हें बिन बुलाए ही दौडते हांफते बाइटकरण में दो काॅलम खबर बीनना पडती है। हालांकि हर बार जब तक वे पहुंचते हैं, पर्याप्त बाइटीकरण हो चुकता है, मुख्यमंत्री मामले को खत्म कर चाय डयू रही कह रहे होते हैं। प्रिंट वालों को चैनल वालों और पीआरओ से पूछ पाछकर काम चलाना पडता है। खैर मेरा मकसद यहां खानों मंे बंटे मीडिया जगत पर तपसरा करना या मीडिया को खानों में बांटने की कोशिश का नहीं है। मेरा सवाल है प्रदेश में पांच मेडिकल काॅलेजों के अस्पताल हैं, इसके अलावा इंदौर में बांबे हास्पिटल, अपोलो अस्पताल, चोइथराम अस्पताल के अलावा राजधानी भोपाल में दर्जनों निजी और सुविधायुक्त अस्पताल हैं तो फिर क्यों मुख्यमंत्री की पत्नी को इलाज के लिए मुंबई ले जाना पडता है। मुख्यमंत्री को भी जब कभी वायरल होता है तो वे क्यों भोपाल में ही जिला अस्पताल, मेडिकल काॅलेज के अस्पताल के बजाय निजी अस्पताल में भर्ती होते हैं। पिछले दिनों एक प्रिंट पत्रकार ने उनसे यह सवाल पूछ भी लिया था कि आप हमीदिया में क्यों भर्ती नहीं हुए जबकि आपके ही मुताबिक वहां सब स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं। मुख्यमंत्री इस सवाल पर असहज तो हुए ही उन्होंने उचित उत्तर भी नहीं दिया था। इस पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती साधना सिंह की तबियत खराब हुई और उनके परीक्षण भोपाल में निजी लैब में कराने के बाद मुंबई इलाज के लिए ले जाया गया, मुख्यमंत्री के मुताबिक अब वे बेहतर हैं। हालांकि एक दिन पहले ही सरकारी विज्ञप्ति में उनके सफल आपरेशन की बकायदा विज्ञप्ति जारी कर दी गई थी, जो सभी अखबारों में प्रकाशित भी हुई। लेकिन इसके बावजूद मिजाजपुर्सी के लिए मुख्यमंत्री से सवाल किया गया। संकोची स्वभाव के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने तत्काल कैमरे बंद हैं न यह पूछा और बताया कि श्रीमती चौहान को तकलीफ कई दिनों से थी, कभी बताया नहीं। ज्यादा हुई तकलीफ तो मुंबई ले जाकर इलाजा कराना पडा। मुख्यमंत्री का यह नितांत व्यक्तिगत मामला था लेकिन उसे प्रचारित किया गया, मीडिया ने इसे सदभावना प्रश्न के रूप में पूछा और मुख्यमंत्री ने उसी सहजता से उत्तर भी दिया। लेकिन सवाल ये है हर साल स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होने के दावों के बावजूद क्यों हमें अपने प्रियजनों को प्रदेश के बाहर इलाज के लिए ले जाना पडता हैं, लेकिन जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, वे क्या करें? इसका जवाब ये हो सकता है वे अपने प्रियजनों को सरकारी अस्पतालों की मर्जी पर छोड दें और फिर जो भी हो उसे ईश्वर की मर्जी मान कर स्वीकार कर लें। पिछले दिनों गांधी मेडिकल काॅलेज से संबद्ध सुल्तानिया जनाना अस्पताल में 16 घंटे में छह प्रसूताओं की मौत हो गई। मामला विधानसभा में भी उठा लेकिन डाक्टरों को क्लीन चिट दे दी गई। जिनकी मौत हुई वे भी किसी की पत्नी, बहन या बेटी थीं। क्या उनकी असमय मौत के लिए हम ईश्वर को जिम्मेदार मानें? क्योंकि डाक्टरों को तो सरकार ने क्लीन चिट दे दी। सुल्तानिया अस्पताल में जो महानुभाव कभी नहीं गए उनसे निवेदन है कि एक बार वहां जाकर देखें जरूर, तो उन्हें पता लगेगा कि नरक क्या होता है और दुव्र्यवहार किसे कहते हैं? मैं यह बात अनुभव से कह रहा हूं। जिसका कोई अपना असमय मरता है, तकलीफ वही समझ सकता है। पिछले साल जुलाई में ही मेरी अपनी बहन को उसके घर के लोग पता नहीं किस डॉक्टर की सलाह पर आधी रात को सुल्तानिया अस्पताल लेकर पहुंचे थे। उसने स्वस्थ्य बेटे को जन्म दिया था डॉक्टर और स्टाफ की लापरवाही के चलते, बेटे को निजी अस्पाल में दो दिन इंक्यूवेटर में रखना पडा और अंततः चल बसा। मेरी बहन, उसके बच्चों और हम सबको को जो सदमा पहुंचा था, वह एक साल बाद भी ताजा है। हर शख्स ने यहां तक कि सुल्तानिया अस्पताल में ही परिचित निकल आए कुछ कर्मचारियों तक ने बाद में यह कहा कि किसी प्रायवेट अस्पताल में ले जाते तो बच्चा खोना नहीं पडता। यह दर्द किसी एक परिवार का नहीं सैकडों परिवारों का होगा। शिवराज सिंह चौहान खुद को मुख्यमंत्री बाद में और किसान का बेटा, मजदूरों का साथी और प्रदेश की महिलाओं का भैया पहले मानते हैं। मेरा कहना है भैया छह बहनों की मौत क्यों हो जाती है एक ही सरकारी अस्पताल में वह भी 24 घंटे में? भाभी की चिंता भी करो भैया और बहनों की भी चिंता करो। आपकी संवेदनशीलता और जमीन से जुडे होने को लेकर कोई संशय न मुझे है और न ही किसी और को होगा। लेकिन बदलाव हो नहीं रहा है शिवराजजी, बदलावा दिखना चाहिए। कम से कम अस्पताल तो सुधारिए। इस पूरे सिस्टम में भ्रष्टों को बचाने वालों को मत बचने दीजिए। उम्मीद की जाना चाहिए कि ऐसा हो पाएगा। मुख्यमंत्री से सवाल पूछा कर कटसी कम और चेहरा दिखाकर मिजाजपुर्सी करने वाले मेरे पत्रकार भाईयों आप भी क्रपा करके सामान्य वर्ग के लोगों के संदर्भ में सवाल करेंगे तो इस प्रदेश का कुछ तो भला हो ही सकता है।